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गुरुवार, 1 जून 2017

ईर्ष्या

ईर्ष्या मनुष्य का सबसे बड़ा अधर्मी शत्रु होता है। भारतीय शास्त्रों ने इससे परहेज रखने की सलाह दी है, जो सर्वाधिक उचित मार्ग प्रतीत होता है। यह एक मानसिक रोग है, जो न केवल दूसरों के लिये वरन् स्वयं के लिये भी घातक होता है। 

यह एक प्रकार का भाव है, जो तब उपजता है, जब आप देखते हैं कि आप वह कार्य स्वयं न कर पायें और कोई दूसरा उसे सम्पन्न कर दे। यदि आपमें कोई अपूर्णता है अथवा आपको प्रतीत हो कि उसे वह अधिक मिला जबकि आपको मिलना चाहिये था, तब भी यह भाव उपज जाता है। एक बात अवश्य है कि ईर्ष्या में प्रमुख रूप से अपूर्णता का भाव रहता है। वह किसी भी प्रकार की अपूर्णता हो सकती है - मानसिक, शारीरिक अथवा भौतिक। 


यह इतना घातक रोग है कि मनुष्य को बीमार बना देता है और जब वह चिकित्सक के पास जाकर दवा लेता है, तो भी कुछ असर नहीं होता, क्योंकि ईर्ष्या की कोई दवा है ही नहीं। यह तो मन में उठ रहे भाव होते हैं, जिन पर केवल वह मनुष्य ही नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। 


ईर्ष्या का भाव किसी के भी मन में उठ सकता है। तब चाहे वह कितना ही सम्पन्न क्यों न हो, कितने ही गुणों का मालिक क्यों न हो, चाहे वह कितना भी सुखी क्यों न हो, चाहे वह कितना भी कामयाब क्यों न हो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसकी परिभाषा बड़े ही सरल शब्दों में दी है कि जैसे दूसरे के दुःख को देखकर दुःख होता है, वैसे ही दूसरे के सुख को देखकर भी दुःख होता है, जिसे ईर्ष्या कहते हैं। एक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जब दो बालक खेल रहे होते हैं और दोनों ही एक खिलौने से खेलने का हठ करते हैं, तब एक बालक उस खिलौने को तोड़ देता है। संभव है कि उसके मन में ऐसा भाव रहा हो कि यदि वह न खेल सका तो दूसरा भी न खेल सके। यही भाव ईर्ष्या की प्रथम स्थिति कही जा सकती है।


ईर्ष्या कई प्रकार के भावों का मिश्रण है। यह अजीब पहेली भी है। जैसे यह समाज और आस-पास ही अधिक व्याप्त होता है। मान लीजिये कि एक लेखक है, जो फेसबुक पर लिखता है। यदि उसे पता चले कि ब्रिटेन में किसी लेखक को बहुत बड़ा पुरस्कार मिला है, तो उसे ईर्ष्या नहीं होती। जब उसे पता चलता है कि भारत में किसी को पुरस्कार मिला तो उसे थोड़ी जलन होती है, लेकिन यदि उसे पता चले कि फेसबुक पर किसी अन्य को पुरस्कार मिला तो वह ईर्ष्या से जलने लगता है। यह एक प्रकार का मनोविकार ही है। अन्य की उपलब्धि से भी यह उत्पन्न होती है।


ईर्ष्या का मुख्य कार्य जलाना होता है, किन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह उसी को जलाती है, जिनके मन में ये भाव उठते हैं अथवा रहते हैं। यह एक ऐसा प्रभाव छोड़ती कि मनुष्य की बुद्धि मंद हो जाती है और वह मात्र एक दिशा में अपनी सोच को एकाग्रचित्त कर लेता है और इसी कारण वह दूसरे के गुणों को देख ही नहीं पाता है, बल्कि खोज-खोज कर दूसरों के अवगुणों को निकालने के प्रयास में व्यर्थ श्रम करता हुआ दुःखी बना रहता है। मनुष्य को ईर्ष्या से अवश्य बचना चाहिये। इसका एकमात्र उपाय है, सभी से प्रेमभाव रखना और सभी के गुणों को देखना। स्वयं पर नियंत्रण रखना कि जो उसके पास नहीं है अथवा जो उसे नहीं मिला वह उसके लिये था ही नहीं, क्योंकि स्रष्टा ने उसे उतने का ही हिस्सेदार माना था। 


विश्वजीत 'सपन'

मंगलवार, 28 मार्च 2017

हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व


    ‘त्योहार’ का शाब्दिक अर्थ है, वह दिन जब कोई धार्मिक अथवा जातीय उत्सव मनाया जाये। इसके लिये ‘पर्व’ शब्द का भी प्रयोग होता है। पर्व शब्द का सम्बन्ध शुभ मुहुर्तों, लग्नों अथवा क्षणों के योग से है। एकादशी, चतुर्दशी, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि पर्व कहे गये हैं। ऐसे अवसरों पर नदी स्नान, उपवास, पूजा आदि किये जाते हैं। उत्सव शब्द का अर्थ है ‘‘आनंद का अतिरेक’’। इस समय सामूहिक आनंद का अतिरेक देखा जाता है। अब तीज शब्द भी त्योहार का द्योतक बन गया है।
 
आदिकाल से ही भारतवर्ष में त्योहारों का महत्त्व रहा है। नाना प्रकार के त्योहारों से समाज की धार्मिक मान्यताओं का भी पता चलता है। ये त्योहार यूँ ही नहीं मनाये जाते, बल्कि इनके पीछे भी पौराणिक कथाओं की महत्ता रही है। एक समय था, जब ये जीवन का एक हिस्सा होते थे और मनोरंजन के साधन भी, किन्तु आज स्थिति भिन्न प्रतीत होती है, क्योंकि ढकोसलों, बाह्याडम्बरों ने इन्हें प्रभावित किया है। मानव-जाति की मानसिकता में भी परिवर्तन आये हैं और आस्था भी अर्थ-प्रधान होती दिखाई देती है। इसके बाद भी आज भी त्योहारों के हमारे जीवन में महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।


भारतवर्ष को त्योहारों का देश कहा जाता है। इसके पीछे दार्शनिक कारण छुपा हुआ है। असल में मानव दुःख अधिक पालता है और सुख के क्षणों को शीघ्र ही भूल जाता है। जब त्योहार आते हैं, तो मानव के जीवन में सुख के क्षण आते हैं। वह इस समय सारे दुःखों को भुलाकर आनंद की ओर उन्मुख होता है, जिस कारण उसके जीवन में सुख और प्रसन्नता का वातावरण आता है। अतः इस वातावरण को उनके जीवन में बारम्बार लाने के लिये ही अनेक त्योहारों की अवधारणा विकसित की गयी है। सभी त्योहार मानव-जीवन से सम्बधित हैं और हमारे जीवन में इनका सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व रहा है।


इन त्योहारों को हम निम्न वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।


1) धार्मिक त्योहार - शिवरात्रि, जन्माष्टमी, दीपावली, दशहरा, ईद, बकरीद आदि


2) सांस्कृतिक त्योहार - बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, होली, भाईदूज आदि


3) राष्ट्रीय त्योहार - स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती, एकता दिवस आदि


4) यादगार त्योहार - गाँधी पुण्यतिथि, राणा प्रताप जयन्ती, नेहरू जयन्ती, वाल्मीकि जयन्ती आदि।


जहाँ एक ओर विजयादशमी का दिन आपने काम-क्रोध आदि आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाने का दिन माना जाता है, वहीं दीवाली खुशियों का त्योहार है। भारतीय जीवन में नये संवत्सर का प्रारंभ चैत्र महीने से होता है और इसी दिन होली का त्योहार मनाया जाता है। सामाजिक दृष्टि से होली का अर्थ बीत गई बात से है और इसलिए इस आनंद का अनुभव किया जाता है, नयी शुरुआत के साथ। जन्माष्टमी और रामनवमी जैसे त्योहार श्रीकृष्ण और श्रीराम से जुड़े हैं। वहीं बसंत पंचमी में प्रकृति ऋतु को पावन कर सँवारती है। अनेक प्रकार के ये त्योहार हमारे जीवन में अलग-अलग महत्त्व रखते हैं। 


ये सभी त्योहार हमारे जीवन का अंग हैं। ये न केवल हमें प्रेरित करते हैं, बल्कि हमें हमारे कर्तव्यों की याद भी दिलाते हैं। हमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देते हैं। साथ ही हमें सुख प्रदान करते हैं। असल में ये हमारी परम्परायें हैं, जो हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को एक दिशा प्रदान करते हैं। इनका एक बहुत बड़ा संदेश भाईचारा ही है। इनका संदेश ख़ुश होने से है, ख़ुशियाँ बाँटने से है, मिलकर ख़ुशी मनाने से है।


विश्वजीत ‘सपन’