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रविवार, 3 दिसंबर 2017

धैर्य की महत्ता

श्रीमद्भगवद् गीता में धीर, धैर्य और धृति शब्द अनेक बार आये हैं। इससे ही इसकी महत्ता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। सोलहवें अध्याय में धृति को दैवीय सम्पदा कहा गया है -

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।। गी.16.3।।


जिस प्रकार आकाश में उठने वाले आड़े-तेढ़े धूम्र-वलयों को वायु का एक झोंका निगल जाता है, उसी प्रकार आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक इन तीनों प्रकार के तापों की पीड़ा को पचाकर, साथ ही चित्तक्षोभ होने पर भी जिस गुण के कारण एक मनुष्य तटस्थ बना रहता है, उसे धृति कहते हैं। ब्राह्मणत्व की प्राप्ति और एक सात्त्विक कर्त्ता बनने में इस गुण के विशेष महत्त्व को गीता में प्रतिपादित किया गया है। 


मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षणों में धृति को अग्रस्थान दिया गया है।


धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयः शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।मनु.6.92।।


आधुनिक एवं प्राचीन कवियों ने धैर्य गुण को अत्यधिक महत्ता प्रदान की है। यहाँ तक कहा गया है कि मनुष्य एवं इतर प्रणियों की सीमारेखा धैर्य के सद्गुण से खिंची है। जिस प्रकार बुद्धि के बिना मानव को मानव नहीं, बल्कि पशु कहा गया है, ठीक उसी प्रकार धीर को मनुष्य और अधीर को पशु समान माना गया है। 


नीचे की ओर बहना जल का सहज धर्म है। ठीक उसी प्रकार अवगुणों की ओर फिसलना मानव का एक स्वाभाविक गुण है। यदि जल को ऊपर की ओर चढ़ाना हो, तो कोई न कोई युक्ति से उसको विपरीत गमन करवाना होता है, ठीक उसी प्रकार शरीर, मन, बुद्धि और चित्त की शक्ति का उपयोग कर मानव जीवन को उन्नत बनाना होता है, और इस कार्य में निरन्तर प्रयासरत रहना ही सात्त्विक धैर्य कहा गया है। अतः धैर्य मानव एवं उसकी मानवीयता का मूलाधार स्थापित होता है। राजसी और तामसी धैर्य भी जीवन को किसी न किसी प्रकार में प्रभावित करते रहते हैं। उससे बचकर रहना ही मानव का कर्तव्य होता है।


प्रभु श्रीराम का वन-गमन। सीता माता का अपहरण। एक अपरिचित प्रदेश में सैनिक जुटाकर प्रबल रावण का नाश करना और सीता माता को सुरक्षित लाना, उनके धैर्य का ही प्रतीक है। समस्त परिवार का बलिदान हो जाने पर भी गुरु गोविन्द सिंह जी शान्तिपूर्वक कार्य करते रहे, यही धैर्य है। धैर्य के कारण ही शिवाजी महाराज मृत्यु के मुख से भी बाहर निकल आये। 


आज हम मानव-जीवन में दुःख और असफलता अधिक देखतें हैं, क्योंकि आज सभी यश और कीर्ति आदि पाना चाहते हैं, किन्तु अति शीघ्रता में बिना किसी परिश्रम के। यही धैर्य की कमी कही गयी है। जितने भी आविष्कार हुए, वे मात्र इसी कारण हुए कि आविष्कारक ने अपना धैर्य नहीं खोया और वह निरन्तर प्रयास करता रहा। यातायात के जाम में फँसने में हम अधीरता का परिचय देते हैं। इस पर एक कहानी बनती है। कथा कुछ इस प्रकार है - एक व्यक्ति अपने स्कूटर से कार्यालय जाना चाहता था। उसे विलम्ब हो रहा था। उसने स्कूटर चलाने का प्रयास किया, तो वह नहीं चला। उसे बस से यात्रा करनी पड़ी और एक घण्टे विलम्ब से कार्यालय पहुँचा। पता चला कि उसके बैठने के स्थान में बिजली की खराबी के कारण आग लग गयी थी और बड़ी मुश्किल से आग पर काबू पाया गया। वह व्यक्ति मंदिर में गया और ईश्वर से बोला कि भगवान् यह क्या हो रहा है, तुम इतने क्रूर कैसे हो सकते हो। पहले मेरा स्कूटर खराब कर दिया, फिर मेरे सीट में आग लगा दी। भगवान् ने कहा कि बेटे, तुम्हारा स्कूटर मैंने ही खराब किया था, क्योंकि आज तुम्हारे साथ दुर्घटना होने वाली थी। तुम्हें देर हो इसलिये कि कार्यालय में ऐसा घटित होने वाला था। हम जिसे अधीरता कह देते हैं, वह ईश्वर की इच्छानुसार होता है। हो सकता है कि यातायात में किसी का फँसना उसके किसी अच्छाई के लिये हो रहा हो। अतः किसी भी परिस्थिति में धैर्य को नहीं खोना चाहिये।


कोई यह भी कह सकता है कि शिशुपाल वध में श्रीकृष्ण ने अपना धैर्य खो दिया था। तब इस कथा को जानना आवश्यक है। अन्यथा भ्रम की स्थिति बनी रहेगी। एक बार सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार नामक ऋषि बैकुण्ठ भगवान् विष्णु से मिलने गये। उनके दो द्वारपाल थे - जय और विजय। उन्होंने उन ऋषियों को अन्दर नहीं जाने दिया, तो सनकादि ऋषियों ने उन्हें पाप योनि में फल भुगतने का शाप दिया। ये दोनों ही पहले जन्म में हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा तीसरे जन्म में कंस और शिशुपाल बने। इन्हें भगवान् विष्णु के हाथों परमगति मिलनी थी। अतः शिशुपाल वध में श्रीकृष्ण के अधैर्य का यहाँ कोई अर्थ नहीं होता। हाँ उन्होंने यह अवश्य कहा था कि वे शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करेंगे, और जब उसने एक सौ एकवीं पर अपराध किया, तो श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। यह होना ही था। यह विधि का विधान था। 


ठीक उसी प्रकार प्रभु श्रीराम का समुद्र से विनती के समय क्रोध करना अधैर्य नहीं है। इसे सात्त्विक क्रोध कहा जाता है। वे उन पर क्रोध करते हैं, जो दीन-दुखियों पर अत्याचार करते हैं अथवा उनके सहायक बनते हैं। जब समुद्र ने श्रीराम की विनम्रता को उनकी कायरता समझा, तब श्रीराम ने अपना क्रोध दिखाया। यह सात्त्विक क्रोध जब किसी अच्छे कार्य के लिये होता है, तो इसे अधीरता नहीं कहते हैं। यह कर्तव्य पालन है। अंततः इस क्रोध के समक्ष समुद्र को झुकना पड़ा था। इसके बारे में गीता को समझने का प्रयास करना होगा।


धृत्या यया धरयते मनः प्राणेन्द्रिय क्रिया।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।


अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन जिस अव्यभिचारिणी अर्थात् स्थिर धारणा-शक्ति से मनुष्य ध्यानयोग के द्वारा मन, प्राण एवं इन्द्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करता है, वह धृति सात्त्विकी है। 


यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी।।


हे अर्जुन, फलासक्त व्यक्ति जिस धारणा के द्वारा अत्यन्त आसक्तिपूर्ण धर्म, अर्थ और काम को धारण करता है, वह धृति राजसी होती है।


यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्ति दुमेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।


हे पार्थ, जिस धृति द्वारा दुबुर्द्धियुक्त दुष्ट मनुष्य निद्रा, भय चिंता, दुःख तथा उन्मत्तता को धारण किये रहता है, वह धृति तामसी है।


धृति वह धारणा है, जो व्यक्ति को अपने धर्म मार्ग से डिगने नहीं देता है। धैर्य बंद मुट्ठी की तरह है, जिसे मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार खोल और बंद कर सकता है। इसके लिये सबसे बड़ी आवश्यकता आत्म-विश्वास की होती है। आत्म-विश्वास का अर्थ स्वयं की क्षमता की यथार्थ जानकारी। यदि यह जानकारी झूठी है अथवा अर्द्ध-सत्य है, तब मनुष्य अभिमानी, घमण्डी और अहंकारी बन जाता है, उसमें धैर्य की अत्यधिक कमी हो जाती है। ‘‘धियां रमती स धीरः’’ जो अपनी बुद्धि में रमता है, वही धीर है। 


जीवन को और उसके उपादानों को समझना आवश्यक होता है। जैसे-जैसे संसार में नकारात्मक घटनाओं में वृद्धि होती जायेगी, वैसे-वैसे ही हमारे धैर्य, सहनशीलता, दया, करुणा आदि की आवश्यकता भी बढ़ती जायेगी। जीवन के सार को समझना आवश्यक होगा कि जीवन को किस वस्तु की अधिक आवश्यकता है और किसकी नहीं।


प्रतिदिन हम आम जीवन में धैर्य की बातें करते दिखाई देते हैं, किन्तु उसे ग्रहण नहीं करते। व्यक्ति असफल हो जाता है और पिता कहते हैं - ‘‘धीरज रखो अगली बार सफलता मिलेगी।’’ बच्चा लड्डू माँगता है, तो माता कहती है - ‘‘थोड़ा धैर्य रखो। पूरा बन जाने दो, तुम्हें भी मिलेगा।’’ एक स्त्री के बारे में कहा जाता है कि पति की मृत्यु हो गयी, किन्तु उसने अपना धीरज न खोया और अपना एवं अपने बच्चों का लालन-पालन किया। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे जीवन में धैर्य का पाठ पढ़ाते जाते हैं, यह तो हम पर निर्भर है कि हम कितना ग्रहण कर पाते हैं। 


इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव के जीवन में धैर्य की अत्यधिक महत्ता है और हमें अपने चित्त पर विजय पाकर धैर्य को अपनाना चाहिये, ताकि अपना जीवन मात्र अपने लिये न होकर समस्त प्राणी संसार के लिये हो। उस परमपिता परमेश्वर के लिये हो।


विश्वजीत ‘सपन’
 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

बड़ी ख़ुशी या छोटी-छोटी ख़ुशियाँ

कहते हैं कि मानव-जीवन एक बार ही मिलता है। इस जीवन को सुखमय जीना ही मानव का लक्ष्य होना चाहिये। अतः जीवन में सुख बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। यह जीवन वैसे तो देखने में बड़ा लम्बा प्रतीत होता है, किन्तु अंतिम समय अनुभव होता है कि जीवन कितना छोटा था। इस छोटे-से जीवन को ख़ुशियों के साथ जीने में कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, किन्तु ऐसा नहीं हो पाता है। सभी एक समय ऐसा अनुभव करते हैं कि उनका जीवन सुख से बीत न सका और तब वे अपने भाग्य को कोसते रहते हैं या फिर अपने किये पर पछताते रहते हैं। इसका एक प्रत्यक्ष कारण जो स्पष्ट दिखाई देता है, वह है कि हम एक बड़ी ख़ुशी को प्राप्त करने के प्रयास सभी छोटी-छोटी ख़ुशियों का त्याग कर देते हैं। जब वह बड़ी ख़ुशी भी न मिल पाती है, तो जीवन दुःखों का पहाड़-सा दिखाई पड़ता है।

जीवन को सुखमय जीने का मूलमंत्र होता है कि जीवन को सरलता से जीना चाहिये। सरल जीवन में प्रत्येक स्थल पर अनेक प्रकार की छोटी-छोटी ख़ुशियाँ प्राप्त होती रहती हैं और उन्हें अपना कर अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिये। बहुधा होता है कि अधिक पाने की चाह में इन छोटी-छोटी ख़ुशियों को हम महत्त्व नहीं देते हैं और जीवन को कठिन बनाते हुए एक या दो बड़ी ख़ुशी की तमन्ना कर बैठते हैं, जिन्हें प्राप्त करने की कोई गारंटी नहीं होती। फिर भी हमारी आशा यही रहती है कि वे प्राप्त हों और तदनुसार हम उपक्रम भी करने लगते हैं। जी-जान लगाकर हम उसे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। कितनी भी परेशानियाँ उठानी पड़े, हम उठाते जाते हैं। सभी सुख त्याग देते हैं और तब हम समस्त प्रकार के सुखों से हम वंचित रह जाते है। कभी किसी को वह बड़ी ख़ुशी मिल भी जाती है, किन्तु बहुधा देखा गया है कि अधिकांश लोग इससे वंचित रह जाते हैं। 


यह अवश्य है कि जो लोग जीवन के मार्ग में सभी छोटी-बड़ी ख़ुशियों को अपनाकर चलते हैं, उनका जीवन हमेशा ही सुखमय रहता है। उन्हें कभी भी कठिनाइयों के अनुभव नहीं होते हैं। अतः हमें विचार करना होगा कि क्या एक बड़ी का प्रत्याशा में जीवन को कठिन बनायें अथवा हर छोटी-बड़ी ख़ुशी को अपनाकर अपने जीवन को सरल बनाकर स्वयं को हमेशा के लिये ख़ुश रखें? यह मात्र संदेश नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका भी है।


    जब हम ख़ुशियों की बात करते हैं, तब हमें यह भी सोचना होगा कि यह ख़ुशी क्या है? विचारों को समझना और विचारों को समझकर समझना अलग बातें होती हैं। उसी प्रकार ख़ुशी को समझना भी अलग बात होती है। क्या जिसे हम ख़ुशी मान रहे हैं वह ख़ुशी है? पाकिस्तान या भारत जब मैच जीतता है, तो लोग ख़ुशियाँ मनाते हैं, तो क्या यह वास्तविक ख़ुशी है अथवा पुष्पों को देखकर जो मन में आनंद आता है, वह ख़ुशी है। विचार करना आवश्यक होगा। क्षणिक आवेग को ख़ुशी कहना होगा अथवा स्थायी मन के अह्लाद को।


छोटी-बड़ी ख़ुशियों की बातें करना सरल है, किन्तु उत्तर बड़ा कठिन। सभी कहते हैं कि ख़ुशी का कोई पैमाना नहीं होता। यह अलग-अलग व्यक्ति में अलग-अलग प्रकार से अपना घर बनाती है। कोई व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में ख़ुश होता है, जबकि किसी को बड़ी बातों में भी कोई ख़ुशी दृष्टिगत नहीं होती, तो क्या यह व्यक्तिगत है? कुछ हद तब इसका उत्तर हाँ में ही होगा। इस बात से किसी को इंकार न होगा कि ख़ुशी एक भाव है - मन का भाव। मन ही उसका अनुभव करता है और शेष सभी प्रक्रियायें जैसे हाव-भाव, मुस्कान आदि बाह्यतः प्रदर्शित होती हैं। यह अनुभव कुछ करने से, कुछ प्राप्त करने से, कुछ कहने-सुनने आदि से प्राप्त होते रहते हैं। समझना इस बात को है कि क्या प्रत्येक कृत्य में सुख का अंश है? हाँ है, भोजन करते समय भी सुख या दुःख का अनुभव किया जा सकता है। चलते समय भी इसका अनुभव किया जा सकता है। हँसना या रोना तो कार्य है, किन्तु यह कार्य करने की प्रेरणा वे भाव हैं, जो सुख या दुःख अनुभव कराते हैं। प्रत्येक स्थिति में सुख का अनुभव करने वाला ही मानव-जीवन के लक्ष्य को जीता है और उस अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। दुःख का कारण अनेक दिखाई देता है, किन्तु वास्तव में एक ही कारण है, सुख का अनुभव न करना। 


जो मानव जीवन की हर छोटी-बड़ी ख़ुशी को अपनाकर चलता है, वही सुखी रहता है। इस बात से किसी को इंकार न होगा। यह जीवन का एक वास्तविक सच है, जिसे अपनाकर हम स्वयं को सुख का भागी बना सकते हैं। प्रत्येक छोटी-छोटी बात पर हम बुरा मान जाते हैं, क्योंकि हमें अपनी छोटी सोच से बचने का उपाय नहीं आता या हम ऐसा करना नहीं चाहते। जीवन सरिता की भाँति है, जो सतत प्रवाहमान है। उसे मार्ग में पड़ी छोटी-छोटी बाधायें रोकती नहीं, टोकती नहीं। हम स्वयं को रोक देते हैं, टोक देते हैं और इस प्रकार दुःख को अपना लेते हैं। मन की गठरी को खोल यदि जीवन को अपनाया जाये, तो मात्र सुख का अनुभव दूर नहीं, किन्तु हमारा प्रयास दुःख को आलिंगन करने का अधिक होता है, क्योंकि हम छलावे में रहना अधिक पसंद करते हैं। बहुधा देखा गया है कि हम सुख पाने का यत्न अत्यधिक करते हैं और अपना जीवन भी उसमें झोंक देते हैं, किन्तु कभी भी सुख का अनुभव करने का यत्न नहीं करते और इसी कारण सुख से दूरी ज्यों की त्यों बनी रहती है।


आत्मा का स्वभाव है आनन्द की प्राप्ति। यही बात समझ नहीं आती। जिसने समझ लिया, वह लक्ष्य भेद लेता है, अन्यथा जीवन भर दुःख को ढोना ही नियति बन जाती है। 


दुःख का अनुभव हम क्यों करते हैं? कल विदेश में किसी के रिश्तेदार का निधन हो गया। उस व्यक्ति का पता नहीं चला। उसे दुःख का अनुभव नहीं हुआ, किन्तु उसके जीवन में वह दुःख आया अवश्य। फिर आज उसे पता चला, तो उसे दुःख हुआ। जीवन यही है, यदि हम किसी घटना आदि को जानकर दुःख करते हैं, तो हमें सोचना होगा कि उस दुःख के ठीक पहले मेरी क्या अवस्था थी? क्या तब मैं ख़ुश था या दुःखी? यदि ख़ुश था तो मैं उसी अवस्था में जा सकता हूँ? यदि प्रयास करें, तो हम अवश्य जा सकते हैं। दुःख मानसिक है, दर्द भी मानसिक है। हम देखते हैं कि पेट में दर्द हो रहा है और तभी कोई बड़ा अच्छा मित्र आ जाता है। हम उनसे बातें करने लगते हैं और दर्द कम हो जाता है। हम कुछ ऐसा काम करने लगते हैं, जो बड़ा प्रिय है और दर्द गायब हो जाता है। अनुभव करने पर दुःख होता है, दर्द होता है। 


जीवन को सरलता से जीना जीवन-लक्ष्य है। जितनी कठिनाइयों को हम अपनायेंगे, उतने ही दुःख हमारे पास आयेंगे। सरल और शुद्ध जीवन से न केवल हम समस्त प्रकार के सुखों के अनुभव कर पायेंगे, बल्कि दूसरों के सुख में भी सम्मिलित हो पायेंगे। यदि आधार ऐसा बने तो जीवन-लक्ष्य असंभव नहीं। जीवन का आधार यदि सरलता में हो, तो जीवन निरन्तर सुखमय होगा। 


सुख कहते किसे हैं? क्या किसी से दो पल बातें कर लेना सुख है? कुछ खा-पी लेना सुख है। मौज-मस्ती कर लेना सुख है? कोई सफलता मिल जाना सुख है? यह बात हम सभी को समझना होगा कि सुख क्या है? जिस दिन हमें सुख की परिभाषा मिल जायेगी, उस दिन से सुख की तलाश भी बंद हो जायेगी। सुख एक सकारात्मक स्थिति है, एक अनुभव है, एक मनोदशा है, एक भावना है। यदि हम मन को सकारात्मक रखना सीख गये, तो सुख का अनुभव निरन्तर होता रहता है। अहंकार या नकारात्क सोच इसमें सबसे बड़ी बाधा होती है।
अहंकार, कुछ बनने की इच्छा, कुछ पाने की इच्छा, दूसरे के सुख को देखना, वर्तमान में न जीना, मोह का होना आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो दुःख को बुलावा देते हैं। इनसे बचने के उपाय के साथ एक सकारात्मक सोच को हावी होने देना ही सुख का कारण बन सकता है। 


हर व्यक्ति की अपनी सोच और समझ होती है। हमें वो ग्रहण करना होता है, जो उचित है। यह भी एक बड़ी सीख है, यदि हम अपने जीवन में उतार लें, तो जीवन सरल हो जायेगा और यदि जीवन सरल हुआ, तो वह सुखमय भी हो जायेगा।


विश्वजीत ‘सपन’