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शनिवार, 8 अगस्त 2015

प्रेम


‘‘प्रेम’’ एक साधारण शब्द है, किन्तु इसका प्रभाव मानव-जीवन में अत्यधिक है। प्रेम क्या है, इसे समझना आम मानव के वश की बात नहीं है, क्योंकि यह बहुत कुछ है और मानव जीवन के अंग-अंग में इसकी भूमिका रहती है। अनेक भावनायें हैं, जो इससे जुड़ी होती हैं। प्रेम का जीवन में कितना महत्त्व है, इस पर कहते-कहते जीवन बीत जायेगा। यही साध्य है और यही साधक भी। मानवीय एवं सांसारिक प्रेम से उठकर ईश्वरीय प्रेम तक का जीवन ही अपेक्षित है, किन्तु क्या यह संभव है? है तो कैसे? 

सर्वप्रथम तो जानने का प्रयास होगा कि प्रेम क्या है? यह मन में उपजा एक भाव है, जो समस्त प्राणियों के लिये होता है। इसमें ममता, स्नेह, दया आदि का मिश्रण स्वयमेव हो जाता है। इस प्रेम की कोई एक परिभाषा संभव नहीं। हर व्यक्ति इसे अपने ढंग से देखता है और समझता है। यह सुन्दर मानवीय गुणों में से एक माना जाता है, जिस पर सुखमय संसार की नींव टिकी होती है। इस प्रेम की व्याख्या सहज ही कठिन है, किन्तु समस्त साहित्य इसके संदर्भ में पटा पड़ा है।


आसक्तिगत प्रेम पर चर्चा की जाये, तो यह सच्चाई है कि चाहे कोई भी प्रेम हो, उसमें चाहना, कोई इच्छा अवश्य होती है। निःस्वार्थ प्रेम तो कुछ होता ही नहीं। ईश्वर से प्रेम में भी मुक्ति की आशा छुपी होती है। बात यही है कि साध्य क्या है? क्या वह सत्य-मार्ग स्थापित जन अथवा स्व-कल्याण है? क्या उससे किसी की कोई हानि तो नहीं हो रही है? यदि नहीं तो वह साध्य श्रेयस्कर है।


जीवन में और प्रकृति में प्रेम की महत्ता सर्वविदित है। पशु-पक्षी सभी प्रेम के भूखे होते हैं। आजकल का प्रेम नहीं, बल्कि वह प्रेम जो आदर्श है। वैसे आदर्श प्रेम भी एक कहन मात्र ही है। आदर्शता छुई नहीं जा सकती, उसके निकट पहुँचने का आग्रह अवश्य किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार आदर्श प्रेम का भी आग्रह अवश्य होना चाहिये। उसके निकट रहने और पहुँचने का प्रयास अवश्य करना चाहिये। समस्त प्राणियों को एक समान जानकर और मानकर यदि इस प्रेम का प्रदर्शन हो, तो यही आदर्श प्रेम की सीढ़ी है और उसके निकट जाने का सरल उपाय है। वह भी दिल से, बाह्यतः नहीं। कौन कितना लक्ष्य हासिल कर पाता है, यह व्यक्तिगत है, किन्तु प्रयास सभी को करना चाहिये। यही आज अपेक्षित है, इस समाज में, पूरे विश्व-समुदाय में। 

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विश्वजीत ‘सपन’