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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

शिवलिंग



ॐ नमः शिवाय
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           शिवलिंग का अर्थ है भगवान् शिव का आदि-अनादि स्वरुप। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्माण्ड एवं निराकार परमपुरुष होने के कारण ही इसे लिंग कहा गया है। इसका आकार वस्तुतः ब्रह्माण्ड में घूम रही हमारी आकाशगंगा के सदृश है और यह शिवलिंग ब्रह्माण्ड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है।


          वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में जिसमें सृष्टि लीन हो जाती है और पुनः सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे ही लिंग कहते हैं। इस विश्व की समूर्ण ऊर्जा ही लिंग का प्रतीक है। वस्तुतः यह सम्पूर्ण विश्व ही बिंदु-नाद स्वरुप है जहाँ बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही शक्ति एवं शिव का संयुक्त रूप शिवलिंग है। स्कंद पुराण के अनुसार स्वयं आकाश ही लिंग है और धरती उसका पीठ है अथवा आधार। सब-कुछ अनंत शून्य से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन होता है इसी कारण इसे लिंग कहा गया है।

          शिव पुराण में कहा गया है कि भगवान् शिव ही पूर्ण पुरुष और निराकार ब्रह्म हैं। ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता के विवाद को समाप्त करने के लिए भगवान् शिव ने एक दिव्य लिंग को प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूँढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरुप का ज्ञान हुआ था। इसी समय से शिव को परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक के रूप में लिंग की पूजा प्रारंभ हुई।

          लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और सबसे ऊपर शिव स्थित हैं। अतः शिवलिंग की पूजा मात्र से ही समस्त देवी-देवताओं की पूजा हो जाती है। जय शिव शंकर
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विश्वजीत 'सपन'

रविवार, 20 अप्रैल 2014

प्रेरक प्रसंग - 2



चित्रकार

मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। उसे हमेशा ही चिंतन करना चाहिए और स्व-विवेक का प्रयोग करना चाहिए। एक पुरातन कथा है। एक राजा था, जिसकी एक आँख ख़राब थी। वह अपना एक चित्र बनवाना चाहता था। महल में एक याद के तौर पर लगवाना चाहता था। उसने अपने और अगल-बगल के राज्य के सभी चित्रकारों में यह घोषणा करवाई कि जो उसका सबसे उपयुक्त चित्र बनाएगा उसे धन-धान्य से पुरस्कृत कर राजमहल का स्थाई चित्रकार नियुक्त करेगा।

सर्वश्रेष्ठ तीन चित्रकारों को राजमहल में चित्र बनाने के लिए उपयुक्त पाया गया और उन्हें आमंत्रित किया गया। तीनों चित्रकारों ने अपने-अपने विवेक से और अपनी कला को प्रदर्शित करते हुए आपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ चित्र बनाया। प्रथम चित्रकार ने सौन्दर्य को मानक बनाया और राजा का बहुत ही सुन्दर चित्र बनाया जिसमें उनकी दोनों ही आँखें ठीक थीं। राजा ने उस चित्र को नकार दिया। दूसरे चित्रकार ने यथार्थ को मानक बनाया और एक ऐसा चित्र बनाया जिसमें राजा का वास्तविक स्वरूप नज़र आया। राजा ने उस चित्र को भी नकार दिया। तीसरे चित्रकार ने अपने विवेका का प्रयोग कर ऐसा चित्र बनाया जिसमें राजा को आसमान की ओर तीर चलाते दिखाया गया और उनके स्वस्थ शरीर का हिस्सा ही दिख रहा था। राजा ने उस चित्रकार को सम्मानित भी किया और अपने राजमहल का चित्रकार भी नियुक्त किया।
जीवन में कड़ुआ यथार्थ और असत्य दोनों से ही मनुष्य को बचना चाहिए। यथार्थ भी यदि विवेकशील तरीक़े से समाज के सम्मुख रखा जाए तो बहुत उपयोगी होता है।
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सपन

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रेरक प्रसंग – १



माया क्या है
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एक बार किसी ने बालक गदाय से पूछा कि माया क्या होती है। बालक गदाय ने कहा था – "अरे, इसे समझना तो बहुत सरल है। तुमने राम, लक्ष्मण और सीता के वन भ्रमण का चित्र देखा है? घना जंगल होने के कारण प्रभु श्री राम आगे, बीच में सीता मैया और पीछे लक्ष्मण भैया चलते हैं। लक्ष्मण भैया को श्री राम का मुख देखे बिना रहा नहीं जाता था जबकि बीच में सीता मैया के होने से अवरोध उत्पन्न होता था। जब उनका मन नहीं मानता था तो वे सीता माता के चरणों की ओर देखकर विनम्र निवेदन करते थे कि माता क्या आप थोड़ा सरकेंगीं भैया नहीं दिख रहे हैं। सीता माता को यह बात पता थी तो वे मुस्कुराकर एक ओर सरक जाती थीं और लक्ष्मण प्रभु श्री राम को जीभर देख लेते थे। यहाँ भगवान् श्री राम हैं और लक्ष्मण भक्त, किन्तु सीता माता के बीच में होने से भगवान् को देखने में अवरोध पैदा होता है। इसलिए मान सकते हैं कि भगवान् को देखने में आने वाली यही रुकावट ही "माया" है। लेकिन फिर हम यह भी तो जानते हैं कि राम और सीता जगत् के माता-पिता हैं तो पिता को देखने में माता कैसे बाधा बन सकती हैं? वैसे भी माँ नहीं तो पिता नहीं और पिता नहीं तो माता का अस्तित्व कैसे? अतः हम यदि पिता को देखने की तीव्र इच्छा में माता से प्रार्थना करेंगे तो रुकावट हट जायेगी। आई बात समझ में?"

एक साधारण किन्तु सशक्त उदाहरण देकर गदाय ने अपने बालक-मंडली को बहुत ही सुन्दरता से माया और उसके कारण उत्पन्न रुकावट को समझाया। यह विलक्षण प्रतिभा सभी में नहीं होती। बहुत ही कम लोगों को यह पता है कि श्री रामकृष्ण परमहंस का बचपन का नाम गदाधर था और उन्हें प्यार से लोग गदाय कहकर पुकारा करते थे  गदाय बचपन से ही बहुत मेधावी थे और संसार एक मूल तत्त्वों को भली-भाँति जानते समझते थे।

विश्वजीत 'सपन'

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

मन की बात (भाग – २ )



न्याय और पक्षपात
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न्याय और पक्षपात में बहुत कम का अंतर होता है
। यदि हम ध्यान से देखें तो ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । जब हम बिना दूसरे का पक्ष सुने या उसे जाने ही निर्णय देते हैं तो यह पक्षपात होता है क्योंकि तब हम सिक्के के एक ही पहलू पर गौर करते हैं । वस्तुतः हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम दूसरा पहलू भी जानें और उसके बाद ही निर्णय लें कि सत्य क्या है । कई बार ऐसा होता है कि जब हम बिना किसी प्रमाण के ही एक व्यक्ति की बात को स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि हम उससे भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं । यह अवश्यम्भावी है क्योंकि हम सभी मानवीय कमियों से विवश हैं, किन्तु क्या यह उचित है ? यदि हम न्याय-प्रणाली को समझें तो वहाँ यही प्रथा है कि निर्णय से पूर्व दोनों पक्षों की बातें सुनी जाती हैं और उसके उपरान्त ही निर्णय लिया जाता है । यह आवश्यक है कि जब हम न्याय की कुर्सी पर बैठते हैं तो हमें भावनाओं में बहने का अधिकार नहीं होता है । हमें बारीक़ी से सच का आकलन करना चाहिए ताकि सच गुमनामी के अंधेरे में छुप न जाए । कहने का तात्पर्य यह है कि न्याय तभी संभव है जब दोनों पक्षों को सुनकर, जानकर और समझकर निर्णय किया जाए
 
पक्षपात एक ऐसा गहरा घाव है जो मानव को हमेशा के लिए तोड़ सकता है । उसे अमानवीय भी बना सकता है और इसलिए न्याय की ओर ही हमें क़दम उठाना चाहिए । यह कदापि हल्के में लेने का विषय नहीं है । यह एक गंभीर विषय है और इस पर हम सभी को अवश्य ध्यान देना चाहिए । एक तरह से देखा जाए तो यह आदत की बात होनी चाहिए । तात्पर्य यह कि बिना विशेष श्रम के ही हमें दूसरे की बात सुनने की ओर उद्यत हो जाना चाहिए और इसके लिए प्रारंभ में सश्रम प्रयास होने चाहिए । जब हम घर में भी एक बच्चे की बात यूँ ही मान लेते हैं और दूसरे की बात सुनते भी नहीं तो हम पक्षपाती निर्णय के दोषी होते हैं । इससे बचने के लिए हमें प्रयास कर दूसरे की बात सुनने की आदत डालनी चाहिए ।

पक्षपात असत्य का ढकोसला होता है वहीं न्याय सत्य का सुनहरा आँगन
यह हम मानव जाति पर निर्भर है कि हम आवेग में असत्य की ओर चलें अथवा संयत मन से सत्य की ओर यह बात भी एक कड़ुवा सत्य है कि पुकार-पुकार कर कहने अथवा रोने-धोने अथवा चीखने-चिल्लाने से सत्य नहीं मिटता है हाँ असमय में आप उसका गला घोंट अवश्य सकते हैं, किन्तु सत्य सत्य ही रहता है वह अडिग है इसलिए सत्य की खोज में, न्याय की ओर चलने का हमारा प्रयास हम सभी के जीवन को हमेशा के लिए सुखमय बना सकता है । एक निश्चयपूर्वक किया गया ऐसा श्रम ही मानव को मानव की श्रेणी में रखता है और आज मानव और मानवीयता के संरक्षण की महती आवश्यकता है ।

======================================== सपन

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

मन की बात (भाग -१)




मन की बात

कहते हैं कि मनुष्य के स्वभाव को समझ पाना कठिन है । एक कथा याद आती है कि तीन मनुष्य जंगल में भटक रहे थे और तीनों ही अपने-अपने कार्य में स्वयं को श्रेष्ठ समझते थे । वे स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान भी समझते थे और इसलिए तीनों ही एक- दूसरे के बहुत बड़े प्रतिद्वंद्वी थे, किन्तु वे देखने में कुरूप थे । उन्हें एक साधु मिले और उन्होंने उनकी ख़ूब सेवा की । उनकी सेवा से प्रसन्न होकर साधु ने कहा कि तुम तीनों एक-एक वरदान माँग सकते हो । पहले ने कहा कि साधु महाराज मुझे इस जगत का सबसे सुन्दर मनुष्य बना दो । साधु ने एवमस्तु कह दिया और वह एक सुन्दर व्यक्ति बन गया । दूसरे ने जब यह देखा कि पहला व्यक्ति सुन्दर हो गया तो उसने साधु से कहा कि मुझे इससे भी सुन्दर बना दो । साधु ने एवमस्तु कहा और वह और भी सुन्दर बना गया । अब तीसरे की बारी आई तो उसने कुछ सोचकर साधु से कहा कि महाराज आप इन दोनों को फिर से कुरूप बना दो । तब साधु ने पुनः एवमस्तु कह दिया । 

यह कथा हमें सीख देती है कि यदि हम स्वयं अच्छा नहीं कर सकते तो दूसरे के लिए हमें बुरा नहीं करना चाहिए, किन्तु आज का युग शायद यही है । हम यदि कोई प्रतियोगिता नहीं जीत सकते तो हम दूसरे को लंगड़ी मारकर गिराकर जीतना चाहते हैं जो ग़लत है और मानवीयता नहीं है । इसके साथ ही यह भावना भी उचित नहीं है कि यदि हम नहीं जीत सकते तो दूसरे को भी नहीं जीतने देंगे । तो क्या मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्ति का दास है? क्या वह अब भी मानवता को समझने में भूल कर रहा है? अनेक प्रश्न सामने आते हैं और इसके उत्तर हमें अवश्य तलाशने चाहिए ।
                                                                                               सपन