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गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

मन की बात (भाग -१)




मन की बात

कहते हैं कि मनुष्य के स्वभाव को समझ पाना कठिन है । एक कथा याद आती है कि तीन मनुष्य जंगल में भटक रहे थे और तीनों ही अपने-अपने कार्य में स्वयं को श्रेष्ठ समझते थे । वे स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान भी समझते थे और इसलिए तीनों ही एक- दूसरे के बहुत बड़े प्रतिद्वंद्वी थे, किन्तु वे देखने में कुरूप थे । उन्हें एक साधु मिले और उन्होंने उनकी ख़ूब सेवा की । उनकी सेवा से प्रसन्न होकर साधु ने कहा कि तुम तीनों एक-एक वरदान माँग सकते हो । पहले ने कहा कि साधु महाराज मुझे इस जगत का सबसे सुन्दर मनुष्य बना दो । साधु ने एवमस्तु कह दिया और वह एक सुन्दर व्यक्ति बन गया । दूसरे ने जब यह देखा कि पहला व्यक्ति सुन्दर हो गया तो उसने साधु से कहा कि मुझे इससे भी सुन्दर बना दो । साधु ने एवमस्तु कहा और वह और भी सुन्दर बना गया । अब तीसरे की बारी आई तो उसने कुछ सोचकर साधु से कहा कि महाराज आप इन दोनों को फिर से कुरूप बना दो । तब साधु ने पुनः एवमस्तु कह दिया । 

यह कथा हमें सीख देती है कि यदि हम स्वयं अच्छा नहीं कर सकते तो दूसरे के लिए हमें बुरा नहीं करना चाहिए, किन्तु आज का युग शायद यही है । हम यदि कोई प्रतियोगिता नहीं जीत सकते तो हम दूसरे को लंगड़ी मारकर गिराकर जीतना चाहते हैं जो ग़लत है और मानवीयता नहीं है । इसके साथ ही यह भावना भी उचित नहीं है कि यदि हम नहीं जीत सकते तो दूसरे को भी नहीं जीतने देंगे । तो क्या मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्ति का दास है? क्या वह अब भी मानवता को समझने में भूल कर रहा है? अनेक प्रश्न सामने आते हैं और इसके उत्तर हमें अवश्य तलाशने चाहिए ।
                                                                                               सपन   

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