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बुधवार, 4 मार्च 2015

संयम




संयम

संयम अर्थात् स्व-नियंत्रण, हम सभी ने यह शब्द सुना है, किन्तु इसका अभाव अनेक लोगों में देखा जाता है। संयम खोने की स्थिति में ये पाँच प्रश्न हमारी सहायता कर सकते हैंः-

1.         क्या मैं क्रोधवश ऐसा कर रहा हूँ या किसी स्वाथ के वशीभूत अथवा किसी दवाब में?

2.         क्या मेरा निर्णय उचित एवं विधि-सम्मत है?

3.         क्या मेरे सगे-संबंधी इस कार्य से शर्मिन्दा होंगे?

4.         क्या मैं स्वयं को आइने में देखने के योग्य हूँ?

5.         आज से 20-30 वर्ष बाद मुझे पछतावा तो नहीं होगा?

संयम और आवेशित होना परस्पर विरोधी हैं। क्रोध संभावित संकट की प्रतिक्रिया ही है। यह बहुधा व्यक्ति की अपनी कुण्ठा के कारण होना संभावित है। यह कुण्ठा व्यक्तिगत प्रवृत्ति के कारण हो सकती है अथवा समाजगत, संस्थागत आदि कारणों से। व्यक्तिगत प्रकृति की कुण्ठा पुनः दो प्रकार की हो सकती है - स्व-घातक और पर-घातक।

इन कुण्ठाओं के अनेक कारक होते हैंः- अवेगशीलता, सामाजीकरण का अभाव, पूर्व में गाली-गलौच एवं आवेग का इतिहास, स्व-नियंत्रण का अभाव और बिखरे हुए सम्बन्ध आदि। अनेक विद्वानों ने और भी कारण बताये हैं और सच्चाई यही है कि ये सभी कारण हो सकते हैं, जैसे पावर, अहम्, दवाब, अभिवृत्ति, आत्म-सम्मान, चिंता, समस्या आदि।

स्व-नियंत्रण को उचित मात्रा में प्राप्त करने के लिये अनेक उपाय विद्वानों ने सुझाये हैं, परन्तु हम कुछ महत्त्वपूर्ण तकनीकों पर विचार कर सकते हैं।

1.         ध्यान-केन्द्रित करना - यह उपाय अत्यधिक सहायक सिद्ध होता है। यह मस्तिष्क को आराम देता है और शान्त करता है। शान्त मन स्वयंमेव स्व-नियंत्रण की ओर अग्रसर हो जाता है।

2.         अहम् का त्याग - अहम् मानव-व्यक्तित्व को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिसका त्याग स्व-नियंत्रण का एक सुन्दर मार्ग है।

3.         स्व-ज्ञान - स्वयं को अच्छी तरह से जानना। यह कठिन है, किन्तु सहायक है।

4.         नींद का ध्यान रखें - बहुधा हम कम नींद के शिकार होते हैं और यह हमारे व्यवहार को बदलने में सक्षम होता है।

5.         नियमित व्यायाम करें - व्यायाम से तन-मन दोनों की शुद्धि होती है और यह बहुत सहायक होता है।

6.         शौक़ या हॉबी - कुछ भी शौक़ हो, उसे न भूलें और अपना मन लगायें, जैसे गाना सुनना, लिखना-पढ़ना, बाग़वानी, खेल देखना-खेलना आदि।

7.         कारण-निदान - उन कारणों को जानना, जिनसे ऐसी परिस्थितियाँ बनती/आती हैं और उनके उपाय करना, स्वयमेव अथवा विशेषज्ञों की सहायता से।

8.         दवाब की परिस्थितियों से दूरी - अनेक बार कुछ विशेष परिस्थितियाँ कारण बनती हैं, तो उनसे यथासंभव दूरी बनाकर रखना।

उपाय भी अनेक हैं और कारण भी अनेक हैं, आवश्यकता है चाह की। जहाँ चाह वहाँ राह की उक्ति इस दिशा में सवोत्तम उपाय के रूप में मानें, तो अत्युत्तम होगा।
विश्वजीत ‘सपन’