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रविवार, 26 जून 2016

अलंकार का साहित्य में महत्त्व


-----------------------------------------विश्वजीत ‘सपन’



‘‘अलंकरोति इति अलंकारः’’ अथवा ‘‘अलंक्रियते अनेन सः अलंकारः’’ अर्थात् अलंकार शोभा बढ़ाने का कार्य करता है अथवा जिसके द्वारा शोभा बढ़ाये जाने का कार्य सम्पादित होता है, वह अलंकार है। ‘‘काव्यादर्श’’ नामक सुप्रसिद्ध काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ के रचयिता आचार्य दण्डी ने अलंकार की परिभाषा देते हुए कहा है - ‘‘काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते’’। कहने का तात्पर्य यह है कि काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म ही अलंकार होते हैं। 
 

काव्य में अलंकारों के महत्त्व को लेकर अत्यधिक चर्चायें हुई हैं और मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि इस संदर्भ में आज भी विवाद हो रहे हैं कि अलंकारों का काव्य में क्या स्थान है अथवा इसकी क्या महत्ता है। कुछ विद्वान् इसे काव्य का नित्यधर्म मानते हैं और कुछ अनित्यधर्म। इसको नित्यधर्म मानने वाले भगवान् व्यास देव ने ‘‘अग्निपुराण’’ में कहा - ‘‘अर्थालंकार-रहिता विधवैव सरस्वती।’’ अर्थात् अर्थालंकारों के बिना सरस्वती विधवा के समान है।
 

इस पर आगे चर्चा की जायेगी, किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अलंकार काव्य के लिये यदि अपरिहार्य नहीं हैं, तो भी एक अत्यन्त ही आवश्यक तत्त्व अवश्य ठहरते हैं। जिस प्रकार आभूषण धारण करने से किसी रमणी की शोभा बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार अलंकारों से काव्य की शोभा बढ़ जाती है।
 

काव्य में अलंकारों का उपयुक्त स्थान निर्धारित करने में तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है -
 

(1) अलंकारों का प्रयोग शोभा बढ़ाने का साधन है, साध्य नहीं। तात्पर्य यह कि अलंकारों का प्रयोग करना कवि का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। केवल इस कारण प्रयुक्त अंलकार बोझिल, क्लिष्ट और अस्पष्ट वाणी बन जाते हैं।
(2) अलंकार प्रकृति सौन्दर्य की ही शोभा बढ़ाते हैं। तात्पर्य यह कि यदि काव्य स्वयं काव्यगुण से रहित हों, तो अलंकार उसकी शोभा नहीं बढ़ा सकते। अंग-भंग अथवा शारीरिक सौन्दर्य के अभाव में आभूषण रमणी की शोभा नहीं बढ़ा सकते।
(3) अलंकार का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। कृत्रिम या अस्वाभाविक रूप से प्रयुक्त अलंकार काव्य की शोभा नहीं बढ़ा सकते।
 

तात्पर्य यह है कि काव्य में अलंकारों का महत्त्व उसी सीमा तक है, जब तक अलंकार काव्य के प्रकृत सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक हों। यदि काव्य में अंलकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होता है, तो यह काव्य के सौन्दर्य और प्रभाव में वृद्धि करता है। यह स्वाभाविक क्या है? स्वाभाविक रूप से कहने के तात्पर्य को समझना होगा। यह साधारण स्वाभाविक रूप नहीं है, अपितु काव्य की शैली में स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त के लिये है। जब कोई काव्य रचना करता है, तो कहन की महत्ता होती है, काव्य-गुणों की महत्ता होती है। एक युद्ध की विभीषिका का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण स्वाभाविक होता है और तभी पाठक पर प्रभाव छोड़ता है। प्रिया के मुख की चाँद से उपमा कोमल भावों को उत्पन्न करती है। पाठक के मन को हर्षित करती है यह उपमा। यह स्वाभाविक प्रयोग ही होता है।
 

‘‘हिन्दी रीति साहित्य’’ नामक पुस्तक में जो राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली एवं पटना द्वारा प्रकाशित है, उसमें डॉ भगीरथ मिश्र अच्छी व्याख्या करते हैं और कई बातों को संक्षेप में समेट लेते हैं कि आचार्य दण्डी और आचार्य भामह ने अलंकार को अत्यधिक महत्त्व दिया है। दण्डी का यह कहना कि ‘‘काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते’’ अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले सभी धर्म अलंकार हैं, न केवल उन्होंने उक्ति चमत्कार को बल्कि काव्य के समस्त सौन्दर्य को इसमें समेट लिया है, अतः रसादि भी इसके अन्तर्गत हैं और स्वभावोक्ति भी। गुण और अलंकार का भेद दण्डी ने नहीं किया। इसका भेद स्पष्ट करने वाले आचार्य वामन हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘‘काव्यालंकार सूत्र’’ में लिखा है - ‘‘काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्माः गुणाः। तदतिशय हेतवत्स्वलंकाराः।।’’ तात्पर्य यह कि आचार्य वामन ने गुण और अलंकार में भेद माना कि गुण काव्य शोभा के उत्पादक धर्म होते हैं और अलंकार उसको बढ़ाने वाले होते हैं। यहाँ इसके कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि एक रूपवान् रमणी आभूषण पहनती है तो उसका सौन्दर्य और बढ़ जाता है, जबकि यदि कोई कुरूप या वृद्ध या अंग-भंग वाली रमणी आभूषण पहनती है, तो हँसी का पात्र बनती है। कहने का तात्पर्य यह है कि काव्य गुण से विहीन नहीं हो सकता, चाहे वह अलंकार से विहीन हो जाये। अर्थात् काव्य के लिये उसके गुणों का होना आवश्यक है।
 

कालक्रम से इसके बाद काव्य के गुण एवं अलंकार पर कहने वाले आचार्य दण्डी, आचार्य भामह और आचार्य वामन के बाद एक आचार्य आते हैं - भट्टोद्भट। वैसे इनकी कोई कृति प्राप्त नहीं होती, किन्तु अनेक स्थानों पर इनका उद्धरण मिल जाता है। रुय्यक ने ‘‘अलंकार सर्वस्व’’ में लिखा कि ‘‘उद्भट ने तो गुणों और अलंकारों का प्रायः साम्य ही बतलाया है। केवल विषय की दृष्टि से भेद किया गया है।’’ विश्वनाथ कृत ‘प्रतापरुद्र यशोभूषण’ की रत्नापण टीका में भी उद्भट का मत दिया गया है ‘‘चारुत्व होते हुए भी गुणों और अलंकारों का भी आश्रय भेद से भेद बतलाया जाता है। गुण संघटनारित होते हैं और अलंकार शब्द तथा अर्थ के आश्रित।’’ प्रथमतः तो उद्भट गुणों और अलंकारों में भेद मानते ही नहीं है, किन्तु यदि भेद करना ही अभीष्ट हो तो वे इतना भेद मानते हैं कि अलंकार या तो केवल शब्द के होते हैं या या केवल अर्थ के, जबकि गुण इन दोनों को मिलाकर होते हैं। अलंकारों को आश्रय केवल शब्द और अर्थ है जबकि गुणों का आश्रय संघटना है।
 

गुण और अलंकार के भेद में उद्भट के बाद आनन्दवर्धन का नाम आता है। इन्होंने ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना कर रस को काव्य आलोचना का मेरुदण्ड बना दिया। इन्होंने गुण एवं अलंकार का भेद भी रस की दृष्टि से किया। वे कहते ‘ध्वन्यालोक’’ में हैं -
 

तमर्थमवलम्बते येंऽगिनं ते गुणाः स्मृताः।
अंगाश्रितास्त्वलंकाराः विज्ञेया कटकादिवत्।।
 

अर्थात् गुण वे माने जाते हैं, जो रसरूप उस अंगी का आश्रय लेते हैं और अलंकार कटकादि के समान अंगाश्रित ही माने जाने चाहिए। वे कहते हैं कि गुण सीधे रसाश्रित होते हैं और अलंकार शब्द और अर्थ में सौन्दर्य का आधान कर रसोत्कर्ष में हेतु बनते हैं। इन्होंने गुण को काव्य की शोभा को माना और उसके लिये अलंकार माना।
 

अतः यहाँ आचार्य दण्डी का विरोध दिखाई देता है। विभिन्न सम्प्रदायों के विकास के बाद अलंकार का स्थान गौण हो गया। और आचार्य मम्मट ने तो काव्य की परिभाषा में ही ‘‘तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’’ कह कर काव्य से अलंकार की अनिवार्यता ही हटा दी। बाद में आचार्य मम्मट की इस परिभाषा का विरोध भी हुआ और जयदेव, अप्पय दीक्षित, विद्याधर आदि ने पुनः अलंकार की पुनः प्रतिष्ठा की। जयदेव ने ‘‘चन्द्रालोक’’ में स्पष्ट घोषित किया और अलंकार को काव्य का नित्यधर्म माना है।
 

अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।।
 

अर्थात् जो व्यक्ति काव्य को अलंकार से रहित स्वीकार करता है, वह अग्नि को उष्णतारहित क्यों नहीं कहता। तात्पर्य यह कि अलंकार काव्य का आधारभूत गुण है।
 

जबकि इसके विरोध में आनन्दवर्धन कहते हैं -
 

तमर्थमवलम्बते येंऽगिनं ते गुणाः स्मृताः।
अंगाश्रितास्त्वलंकाराः विज्ञेया कटकादिवत्।।
 

अर्थात् गुण वे माने जाते हैं, जो रसरूप उस अंगी का आश्रय लेते हैं और अलंकार कटकादि के समान अंगाश्रित ही माने जाने चाहिए। वे कहते हैं कि गुण सीधे रसाश्रित होते हैं और अलंकार शब्द और अर्थ में सौन्दर्य का आधान कर रसोत्कर्ष में हेतु बनते हैं।
 

किन्तु जयदेव की अलंकार की इस धारणा को बाद के रीति कवियों ने अपनाया। केशव की धारणा भी अलंकार के विषय में व्यापक थी।
 

उधर आचार्य हेमचन्द्र तथा आचार्य विश्वनाथ दोनों ने ही अलंकार को अंगाश्रित माना है।
 

हेमचन्द्र ने ‘‘अंगारितास्तवलंकाराः’’ कहा है, जबकि विश्वनाथ ने ‘‘शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशयिनः’’ कहकर अलंकार को अस्थिर धर्म बताया है और काव्य के लिये आवश्यक नहीं माना है।
 

इसमें कोई संदेह नहीं कि अलंकारों के काव्य में स्थान को लेकर विवाद होते रहे हैं। अनेक आचार्यों ने काव्यशरीर, उसके नित्यधर्म तथा बहिरंग उपकारक का विचार करते हुए अलंकार के महत्त्व को देखने का प्रयास किया है। अतः गुण, रस, ध्वनि आदि के प्रसंग में विचार किया जाता है। कुछ लोग इसे काव्य के नित्यधर्म के रूप में देखते हैं, तो कुछ लोग अनित्यधर्म के रूप में। विशेषकर रस को काव्य की आत्मा मानने वाले अलंकार को गौण मानते हुए अनित्यधर्म मानते हैं।
 

एक विशेष बात पर गौर करना होगा कि किस प्रकार दण्डी एवं मम्मट के मत में विरोध झलकता है। काव्यप्रकाश का प्रथम सूत्र है - ‘‘तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’’ आचार्य मम्मट के अनुसार यह काव्य का लक्षण है। इसमें सबसे पहली बात यह है कि शब्द और अर्थ दोनों की समष्टि को काव्य कहते हैं। इसमें ‘शब्दार्थौ’’ शब्द के तीन विशेषण लक्षण में प्रस्तुत किये गये हैं - 1. अदोषौ, 2. सगुणौ एवं 3. अलंकृती पुनः क्वापि। अर्थात् पहली बात है कि वे शब्द और अर्थ दोषरहित हों, दूसरी बात है कि वे ‘सगुण’ यानी माधुर्य आदि गुणों सहित हों और तीसरी बात यह कि साधारणतः वे अलंकार सहित हों, किन्तु जब रसादि की प्रतीति हो रही हो तो अलंकार न भी हो, तो काम चल सकता है। यदि इसे दण्डी की अलंकार की परिभाषा के साथ तुलना करें तो दण्डी कहते हैं ‘‘काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते’’ अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले सभी धर्म अलंकार हैं। यहाँ यही अंतर है कि जहाँ दण्डी अलंकार को काव्य का नित्य धर्म मानते हैं और आवश्यक मानते हैं, वहीं मम्मट उसे अनित्य धर्म मानते हैं यानी आवश्यक नहीं।
 

अलंकार के स्थान को लेकर वाद-विवाद पर एक दृष्टि डालें, तो एक ओर दण्डी, व्यास, वामन आदि थे, तो दूसरी ओर मम्मट, रुय्यक, उद्भट आदि। फिर रीतिकालीन कवि आये और ध्वनिवादी भी। इसके बाद भी मुझे यह कहते हुए संदेह नहीं होता कि अलंकार की आवश्यकता काव्य में अनिवार्य ही दिखती है। जब काव्यप्रकाश में आचार्य मम्मट ने एक उदाहरण दिया कि उक्त श्लोक में कोई अलंकार नहीं है, तब आचार्य विश्वनाथ ने उसमें ‘विभावना’ एवं ‘विशेषोक्ति’ अलंकार को खोजने का प्रयास किया। अब यह किसी दुर्भावना से था अथवा नहीं इस पर विवाद किया जा सकता है, किन्तु दर्शनीय बात यह है कि काव्य में अलंकार ढूँढे जा सकते हैं। अलंकारों की संख्या इतनी अधिक है कि कोई न कोई अलंकार लेखन में स्वतः आ जायें, यह संभव है। तब अलंकार का स्थान काव्य में स्वतःसिद्ध हो जाता है। ऐसा भी संभव है कि कहीं कोई अलंकार न हो, किन्तु अलंकार की संभावना ही अधिक दिखती है।
 

अलंकार के प्रेरक क्या होते हैं? इसे समझने के लिये अलंकार के कई अंगों को स्पर्श करना होगा। प्रथमतः अलंकार है क्या? जैसे मानव-शरीर स्वतः सुन्दर होता है, किन्तु उसके सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये आभूषणादि का प्रयोग किया जाता है, ठीक उसी प्रकार काव्य के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये ही अलंकारों का प्रयोग किया जाता है। तब काव्य में शोभा बढ़ाने वाले धर्मों का समावेश होता है या उनका प्रयोग होता है, तो वे कुछ मूल प्रेरणाओं पर आधारित होते हैं। जैसे
 

(1) आन्तरिक उत्साह की अभिव्यक्ति
(2) मनुष्य की चिरकाल से चली आ रही सौन्दर्य-प्रियता की भावना।
(3) एक ही बात को अनेक प्रकार से कहने का ढंग, जिसके द्वारा सुनने वाले के मन में चमत्कार की सृष्टि हो।
 

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि अलंकार काव्य की शोभा है। उचितानुचित का विचार करके काव्य में यदि अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होता है, तो यह काव्य के सौन्दर्य और उसके प्रभाव में  वृद्धि करता है। यदि अस्वाभाविक रूप से अथवा केवल अलंकार देने की मंशा से अलंकार काव्य में ठूसे गये हों, तो वे बोझिल, क्लिष्ट और अस्पष्ट हो जाते हैं। इसे काव्य का अनिवार्यतः आवश्यक तत्त्व कहा जाये अथवा नहीं, इस पर विवाद बना रहेगा, किन्तु इसकी उपयोगिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है।
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विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 18 जून 2016

एकल परिवार बनाम संयुक्त परिवार


विषय बहुत ही सुन्दर एवं प्रासंगिक है। भारत ग्राम-प्रधान देश रहा है और संयुक्त परिवार की अवधारणा प्रचीन काल से चली आ रही है। किन्तु आज का युग इच्छा-अनिच्छा से एकल परिवार का है। शहरी तो शहरी, यहाँ तक कि ग्रामीण वातावरण में भी संयुक्त परिवार विघटन के दौर से गुज़र रहा है। ऐसे में इनके गुणों एवं अवगुणों को देखने की आवश्यकता नज़र आती है। सर्वप्रथम हम एकल परिवार के गुणों को देखें और सकारात्मक सोच के साथ देखें, तो ये गुण हमारी दृष्टि में आते हैं - 


1.    यह इंसान को स्वावलंबी बनाता है।
2.    परिवार में अत्यन्त घनिष्ठता का बीज बोता है, जिसके कारण माता-पिता एवं बच्चों में भाव-बंधन बहुत गहरा होता है।
3.    यह बच्चों को भी स्वावलंबी बनने का अवसर प्रदान करता है।
4.    मुखिया को उत्तरदायित्व का भान जीवन के प्रारंभिक चरण में हो जाता है।
5.    विचारों की स्वतंत्रता रहती है और जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का अवसर मिलता है।
6.    जीवन को व्यवस्थित करने का सुअवसर होता है।
7.    चुनौतियों को सामना करने के अवसर से व्यक्ति में जीवन के प्रति आत्म-विश्वास आता है।
8.    दूसरों पर निर्भरता कम होती है।
9.    पति-पत्नी के बीच में संबंध गहरा होता है और एक-दूसरे के प्रति समझ का अधिक अवसर रहता है। दोनों में एकजुटता से परिवार चलाने का अवसर होता है। छोटी-छोटी ख़ुशियों से आपस में गहरा संबंध बनने का अवसर रहता है।
10.    जीवन को देखने के दृष्टिकोण में बहुत बड़ा परिवर्तन आता है।


अब हम संयुक्त परिवार के लाभों की गणना करें, तो निश्चय ही हमें बहुत सारे गुणों को देखने को मिलता है।


1.    यह टीम भावना को जागृत करने का सुन्दर अवसर प्रदान करता है।
2.    आपसी मेल से चुनौतियों का सामना सरलता से संभव है।
3.    एक-दूसरे का बल और संरक्षण रहता है।
4.    बच्चों को अच्छे संस्कार मिलने के अधिक अवसर होते हैं।
5.    कभी एकाकी होने का अवसर नहीं होते, तो मानसिक रूप से बाधा आने के अवसर भी कम रहते हैं।
6.    अनुभवी वृद्धों से जीवन के अनुभवों को प्रारंभ से जाना-समझा जा सकता है।
7.    बच्चों का लालन-पालन सरल एवं सहज हो जाता है। उन पर दृष्टि रखने वाले अनेक लोगों के होने से उनके बिगड़ने का ख़तरा कम रहता है।
8.    एक-दूसरे से, परिवार के सदस्यों से, समाज आदि से सहयोग की भावना का विकास होता है।
9.    जीवन को सरलता से जीने का अवसर रहता है। एक-दूसरे के सहयोगी की आशा रहती है। कठिनाइयों को सहयोग से सामना करने का भरोसा रहता है।
10.    अनुभवों की सीखों से जीवन सरल हो जाता है।


आज के इस युग में एकल परिवार का सबसे बुरा प्रभाव माता-पिता पर पड़ता है। वे एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिये शापित हो जाते हैं। बेटा और उनका परिवार जीविका की तलाश में दूर कहीं चले जाते हैं और ये उनके साथ नये माहौल में रह नहीं पाते। दुःखद है, किन्तु युग की सच्चाई भी है।
एकल परिवार के कुछ अवगुणों की ओर चलना चाहता हूँ। बहुत हैं, किन्तु कुछ को रेखांकित करने का प्रयास करता हूँ।


1.    कठिनाइयों में एकाकीपन का बोझ गहरा होता है। कोई विचार साझा करने वाला भी नहीं होता। देखने वाले तो नहीं ही होते हैं।
2.    बच्चों की देखभाल में कमी रह जाती है। जैसा कि ऊपर भी बताया गया है, अतः इस अधिक कुछ नहीं कहूँगा।
3.    घर की सुरक्षा में छेद हो जाते हैं। हमें कभी भी पूरा घर बंदकर जाना पड़ता है। कोई रहने वाला नहीं होता।
4.    व्यक्ति सीमित और स्वार्थी हो जाता है। अपने परिवार के अलावा उसे कुछ नहीं सूझता है।
5.    सामाजिक जीवन न के बराबर रह जाता है। सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
6.    बच्चों के बिगड़ने का भय बढ़ जाता है। उनकी देखभाल प्रभावित होती है।
7.    अनेक कार्य अनुभव की कमी के कारण अधूरे अथवा उचित तरीके से पूरे नहीं हो पाते हैं।
8.    सहायक हाथों की कमी से जीवन में कठिनता आती है। शिथिलता आती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
9.    पति-पत्नी यदि समझदारी से काम न लें, तो कलह को जन्म देते हैं और आपसी मतभेद बच्चों पर बुरा असर करते हैं।
10.    स्वतंत्रता, स्वच्छंता में परिवर्तित होते हैं और जीवन को अनुचित दिशा में ले जाते हैं।


एकल परिवार में लाख बुराइयाँ हों, किन्तु यदि वह आज की आवश्यकता अथवा विवशता है, तो उसे सकारात्मक लेने में ही भलाई है। भारतीय बहिर्मुखी होता है और वह सहजता से मित्रता कर लेता है। ये मित्र ही संयुक्त परिवार की भूमिका निभा सकते हैं और निभाते भी हैं। आवश्यकता है, परिस्थिति के अनुसार हमें ढल जाने की।


विश्वजीत 'सपन'