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रविवार, 9 नवंबर 2014

राजभाषा हिन्दी




26 जनवरी, 1950 में लागू भरतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार संघ सरकार की राजभाषा हिन्दी होगी एवं इसकी लिपि देवनागरी होगी। असल में संविधान सभा में हिन्दी की स्थिति पर चर्चा का आरंभ 12 सितम्बर 1949 को हुआ था और उसके दो दिनों के बाद अर्थात् 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को ‘राष्ट्र भाषा’ के रूप में स्वीकृति प्रदान की गयी थी। तभी से 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाये जाने की प्रथा का प्रारंभ हुआ है, जो आज भी निरंतर चल रही है। 

संविधान के लागू होते ही हिन्दी को देश की आधिकारिक भाषा का दर्जा तो मिल गया, किन्तु तब यह तय किया गया था कि आगामी 15 वर्षों तक हिन्दी एवं अंग्रेज़ी, दोनों भाषायें कामकाज में बनी रहेंगी और उसके बाद हिन्दी को पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया जायेगा। परन्तु, 1965 में यह अवधि पूरी होने के पहले ही तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक जैसे राज्यों में हिन्दी विरोधी प्रदर्शन प्रारंभ हो गये, जो कहीं-कहीं हिंसक भी हो गये। परिस्थितियाँ जब विकट हो गयीं तो इस पर पुनर्विचार हुआ। परिणामतः राजभाषा अधिनियम, 1963 में संशोधन कर यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक कि संसद के दोनों सदन और देश के सभी राज्य अपनी विधानसभाओं में एक प्रस्ताव पारित कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार नहीं करते, तब तक अंग्रेज़ी भी सरकारी कामकाज में प्रयुक्त होती रहेगी।

  
हिन्दी अधिकांश भारतीयों की भाषा है और आधे से भी अधिक भारतीयों के द्वारा बोली जाती है। साथ ही लगभग तीन चौथाई भारतीयों के द्वारा समझी जाती है। अरुणाचल प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली में हिन्दी को राजकीय भाषा का सम्मान प्राप्त है। 


यह विदेशो में भी बोली और समझी जाती है। हिन्दी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसे अमेरिका, ब्रिटेन, मलेशिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, न्यज़ीलैण्ड सहित अनेक देशों में बोला जाता है। आज हिन्दी का प्रचार-प्रसार द्रुतगति से हो रहा है और कई देशों ने हिन्दी के विश्वविद्यालय खोले हैं और भारत के निकट आने के प्रयास में हिन्दी से जुड़ रहे हैं। दुर्भाग्य यह है हमारे देश में हिन्दी भाषा उपेक्षित महसूस करती है क्योंकि कुछ राज्यों को छोड़कर शेष भारत में अभी भी हिन्दी के बजाय अंग्रेज़ी को अधिक सम्मान दिया जाता है। केन्द्रीय भारत सरकार के अधिकतर कार्य भी अंग्रेज़ी भाषा में ही किये जाते हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों कि स्थिति तो यह है कि यदि उनसे हिन्दी में पत्राचार किया जाता है, तो वे लिखते हैं कि उनसे अंग्रेज़ी में ही पत्राचार किया जाये।


इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विश्व के सभी प्रमुख विकसित एवं विकासशील देश अपनी-अपनी भाषाओं में ही सरकारी काम-काज करके समृद्ध और उन्नत हुए हैं। भारत में राजभाषा विभाग प्रतिवर्ष अनेक क़दम उठाता रहा है ताकि सरकारी उद्यमों में अधिकाधिक हिन्दी भाषा के प्रयोग बढ़ावा मिल सके। देश में एकता एवं अखण्डता के लिए भी एक भाषा का अपना ही महत्त्व होता है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी राजभाषा पर गर्व करें और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ही साथ राष्ट्रभाषा का भी उचित सम्मान करें।


विश्वजीत ‘सपन’

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

चक्रवाती तूफ़ान ‘हुदहुद’

चक्रवाती तूफ़ान ‘हुदहुद’ के नामकरण से जुड़े तथ्य



12 अक्टूबर 2014 को ‘हुदहुद’ नामक चक्रवाती तूफ़ान ने आन्ध्र प्रदेश राज्य के एक शहर विशाखपट्टनम् में बहुत तबाही मचायी और यह तूफ़ान आगे बढ़कर उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक जा पहुँचा। इस तूफ़ान और इससे पहले आये तूफ़ानों के न-नोक, मदी, लहर, हेलेन आदि नामकरण क्यों हुए? कहने का तात्पर्य यह कि ये नाम इन चक्रवाती तूफ़ानों के क्यों और कैसे पड़े? यदि हम इस विषय पर विचार करें तो बहुत ही मनोरंजक एवं सुन्दर जानकारी हमें प्राप्त होती है। 

पहली हरिकेन चेतावनी की व्यवस्था का प्रारंभ सन् 1870 में क्यूबा में किया गया था। 1947 तक इन सभी प्रकार के तूफ़ानों के नाम संख्या आदि संकेत के द्वारा किये गये। 1950 में मियामी हरिकेन केन्द्र ने तब तक आये सभी प्रकार के तूफ़ानों की सूची आदि बनानी प्रारंभ की और इनकी व्यवस्था का कमान संभाल लिया। इसी क्रम में 1953 में इन तूफ़ानों के नाम मानवीय नामों के आधार पर किये जाने का निर्णय लिया गया। उसके पूर्व इनके नाम अधिकतर तकनीकी अथवा संख्या वाले होते थे, जिन्हें कुछ तकनीकी विशेषज्ञ ही समझ पाते थे। अतः निर्णय लिया गया कि इनके नाम ऐसे हों, जो लोगों को आसनी से समझ आयें। यह भी आवश्यक समझा गया कि इन तूफ़ानों के बारे में पूर्व-चेतावनी देने के लिये उसके नाम होने आवश्यक हैं। इसे वर्षों के नाम से भी जाना जाता था - जैसे तूफ़ान 1950 ए, 1950 बी आदि। यह भी सुविधाजनक नहीं था। 1953 में अमेरिका के ‘राष्ट्रीय हरिकेन केन्द्र’ ने अलांटिक में आने वाले तूफ़ानों के नामों की एक सूची बना ली और उस सूची के अनुसार ही वे उनके नाम देने लग गये, जैसे हरिकेन बार्बरा, हरिकेन फ्लोरेंस, कैरोल आदि। यह भी मनोरंजक है कि 1953 से 1978 तक इन तूफ़ानों के नाम स्त्रीलिंग रखे गये और 1979 के बाद से अब पुल्लिंग नाम रखे जाने लगे। यह भी ग़ौरतलब है कि स्त्रीलिंग नाम वाले तूफ़ान अधिक घातक साबित हुए। संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक संस्था विश्व मौसम संघ (डब्ल्यू.एम.ओ), जिसका मुख्यालय जेनेवा में था, ने 1977 में हरिकेन के नामों को रखने की सूची का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।  


इधर उत्तरी हिन्द महासागर के चक्रवातों के नाम नहीं होते थे और इससे बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ऐसा माना जाता है कि जातीय एवं सामाजिक विभिन्नताओं के कारण वे किसी नाम को नहीं रखना चाहते थे, ताकि किसी प्रकार का विवाद न हो। संभव था कि उनके नाम देने से किसी जाति अथवा सम्प्रदाय-विशेष को ठेस पहुँच सकती थी। यह स्थिति वर्ष 2004 तक ऐसे ही चलती रही। 2004 में हिन्द महासागर के आस-पास के आठ देशों अर्थात् बंगलादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका एवं थाइलैण्ड ने एक साथ मिलकर इनके नामकरण करने का निर्णय लिया और इनके नामों की सूची बनायी। सभी देशों ने आठ-आठ नाम सुझाये और 64 नामों की सूची तैयार कर ली गयी। तब से देशों के वर्णक्रम के अनुसार आने वाले तूफ़ानों के लिये उनके सुझाये नामों से एक नाम दिया जाने लगा है। यह कार्य भारतीय मौसम विभाग करता है। भारतीस मौसम विभाग ही हिन्द महासागर के इन देशों के लिए समुद्री चक्रवाती तूफ़ानों के संदर्भ में चेतावनी देती है और इसी सूची से नामकरण करती है। उदाहरण के तौर पर इससे पहले जो नाम आये हैं, वे थे हेलेन (बंगलादेश), लहर (भारत), मदी (मालदीव) न-नौक (म्यांतार) और आने वाले भविष्य के तूफ़ानों केनाम होंगे - नीलोफर (पाकिस्तान), अशोबा (श्रीलंका), कोमेन (थाइलैण्ड) आदि। इस सूची के अनुसार इस बार ओमान द्वारा दिये गये नाम की बारी थी, जिसने इसका नाम हुदहुद दिया था। यह अरबी भाषा का शब्द है और हूपु नाम की चिड़िया को कहा जाता है। यह एक छोटी चिड़िया है, जो भारतीय कठफोड़वा से मिलती-जुलती है।


इन सभी आठ देशों द्वारा दिये गये नामों की सूची इस प्रकार हैं -
बंगलादेश - ओनिल, ओग्नि, निशा, गिरि, हेलेन, छोपोला, आक्खी, फोनी
भारत - अग्नि, आकाश, बिजली, जल, लहर, मेघ, सागर, वायु
मलदीव - हिबरू, गोनू, एैला, कैला, मदी, रुआनु, मेकुनु, हिका
म्यांमार - प्यार, ये-मयिन, फ्यान, थाने, न-नौक, क्यांत, दये, क्यार
ओमान - बाज़, सिद्र, वर्द, मरजान, हुदहुद, न’नदा, ल’लुबन, म’मह
पाकिस्तान - फनूस, नरगिस, लैला, निलम, निलोफर, वर्दा, तितली, बुलबुल
श्रीलंका - माला, रश्मि, बंदु, वियारु, अशोबा, मारुथा, गज, पवन
थाइलैण्ड - मुकदर, कैमुक, पेट, फेलिन, कोमेन, मोरा, पे-ति, अमपन


विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

Pustak Sameeksha



(मित्रों, निकट भविष्य में आने वाले मेरे कहानी-संग्रह पर प्रिय श्री आनंदवर्धन ओझा जी की भूमिका - उनका हृदय के गहन तल से आभार)
श्रीविश्वजीत सपन की पंद्रह कहानियों का अनूठा संग्रह है--'आदि-अनंत'। लेखक की ये कहानियाँ किसी स्वप्न-जगत से नहीं उपजतीं,बल्कि जीवन और जगत के खट्टे-मीठे अनुभवों से आकार पाती हैं। प्रवाहमयी भाषा में लिखी हुई इन कहानियों में आज के युग का सत्य मुखरित हुआ है--जिसका केंद्रीय पात्र मूलतः मनुष्य है। मनुष्य के मनःलोक की जटिलताएं, कुंठाएँ, व्यग्रता, विवशता, संत्रास और समस्याएँ इन कहानियों में मूर्त्त हुई हैं।
कथा-लेखक अपनी कथा-रचना के लिए भूमि तलाशता अथवा उस भूमि को उर्वर बनाने की सायास चेष्टा करता नहीं दीखता, वह सामान्य जीवन के किसी एक पक्ष को कथा का सूत्र बनाता है और कथा-क्रम को अपनी लेखनी की सहज धारा में बहा ले चलता है। लेखक की कहानियाँ सीधी राह चलती हैं, उसमें अवांतर कथायें सम्मिलित नहीं होतीं। लेखक के मूल कथन में कोई भटकाव या बिखराव नहीं होता। वह कथा के समानांतर नहीं चलता, बल्कि कथा के साथ-साथ चलता है और पाठकों को भी उसी कथा-सूत्र में बाँधे रखता है।
संग्रह की अलग-अलग कहानियों में नए-नए चित्र उभरते हैं, जीवनानुभूतियों के अनेक वातायन खुलते हैं, पात्रों के साथ परिवेश बदलते हैं और एक नयी कथा, नया परिधान पहनकर पाठकों के सम्मुख आती है।
संग्रह की पहली कहानी 'कालचक्र' पीढ़ियों के टकराव और उनके चिंतन-वैषम्य को प्रकट करती है। यह कहानी बुढ़ापे की लाठी के टूटने की पीड़ा को अभियक्त करती है और हार-थककर वृद्धाश्रम की राह जानेवाले जीवन की कारुणिक व्याख्या करती है--"वाणी की चोट ह्रदय में बड़ी गहराई तक धँस जाती है। शब्दों के कलेवर उसे असह्य बना देते हैं। इस 'अहंकार' शब्द के धारदार नश्तर ने हरिचरण बाबू के दिल में अनगिनत छेद बना दिए। कोई और कहता तो शायद इतनी नहीं चुभती। अपना बेटा, अपना खून कह रहा था।..." संग्रह की तमाम कहानियों में ऐसे उद्धरणों की कमी नहीं है, जो ह्रदय-विदारक, मारक तो हैं ही, प्रेरक भी हैं।
'खंड-खंड जीवन' नामक कहानी समानांतर नारी चरित्रों को सामने लाती है और प्रताड़ना की चरम दशा में वेदना साकार हो उठती है। 'अपना पता' एक मार्मिक कहानी है, जो नई बुनावट में रची गई है। यह बेघरों की बेबसी और रंगीन सपनों की अनूठी दास्तान है, जिसमें सपने कांच के गिलास के तरह क्षण-भर में चकनाचूर हो जाते हैं और संघर्षों का तपता रेगिस्तान फिर सामने आ खड़ा होता है। 'नयी शुरूआत' पारस्परिक संबंधों में सामंजस्य स्थापित करती हुई, समस्याओं का सहज और ठोस समाधान ढूँढती जीवन-कथा है, जिसमें पारिवारिक छोटे-छोटे विवाद कैसे विघटन की सुरसा को सम्मुख ला खड़ा करते हैं और स्नेह का हल्का-सा स्पर्श कैसे जीवन-सरोवर में नए रंग भर देता है--यही दिखाया गया है। यह सुख-शान्ति का मार्ग तलाशती एक प्रेरक कथा है। कच्ची उम्र की प्रेम-कुंठा और विश्वासघात की वेधशाला में पकते मैत्री-संबंधों की करुण कथा पाठकों के सामने रखती है कहानी--'शेफाली वेड्स...'! इस कहानी में तीन पात्रों के माध्यम से लेखक ने युवाओं के बीच बदलते समीकरणों और तुर्श होते संबंधों का रोचक वर्णन किया है।
'प्रेम का बंधन' नामक कहानी में कथाकार ने बड़ी कुशलता से असफल प्रेम की मनोवेदना  को लोक-कल्याण की मंगल-कामना का स्वरूप दिया है, जागतिक प्रेम को स्वार्थ से ऊपर उठाकर उसे ईश्वर-प्रेम के तल पर प्रतिष्ठित कर दिया है। 'कलाकार' नामक कहानी सपनों की मौत का बड़ा भयावह और मर्मान्तक चित्र प्रस्तुत करती है, जिसमें प्रतिभा कैसे कुंठित होकर महानगरों में पिस जाती है और उत्साह-उमंगों से भरे हसीन सपने कैसे दम तोड़ देते हैं--इसे लेखक ने बड़ी कुशलता से उकेरा है...!
संग्रह 'आदि-अनंत' की अन्य सभी कहानियों में ऐसे ही  वास्तविक से लगानेवाले पात्र परिदृश्यों, घटनाओं और स्थितियों की संरचना करते हैं तथा लेखक के अभीष्ट को साकार करने में सफल होते हैं।
नए प्रतीक और नव्य विधान से रची गई 'नयी कहानियों' की पारिभाषिक सीमा-रेखा में श्रीसपन की कहानियाँ बंधी हुई नहीं हैं, न लेखक इस व्यामोह में पड़ा दीखता है। ये कहानियाँ कथानक को नयापन देने, प्रतीकों-बिम्बों से सजाने और नव्य प्रयोगों की हठधर्मिता से सर्वथा मुक्त हैं। कथा के माध्यम से, जो मूल कथ्य है, उसे यथारूप सम्प्रेषित कर और भावोद्वेलन की पराकाष्ठा पर पाठकों को पहुँचाकर लेखक कथा का समापन करता है। कथा-लेखन की यही विशेषता इन कहानियों को विशिष्ट बनाती है।

--आनंदवर्धन ओझा.

शनिवार, 20 सितंबर 2014

दूषित अहं ही अहंकार है


स्थितप्रज्ञ की परिभाषा बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो न हीन-ग्रंथि (Inferiority Complex) से पीड़ित हो और न स्व को अतिशय समझने में भाव-ग्रंथि (Superiority Complex) से उद्भ्रांत हो, वही स्थितप्रज्ञ है। इस प्रकार जो मन:प्रसादयुक्त, शांत, धीर, कर्तव्यनिष्ठ, विनम्र, सब का शुभेच्छु, सत्कर्म करने वाला पुरुष है वही कर्मयोगी है। असल में अहं का शुद्ध बोध अध्यात्म है, जबकि अहंकार भौतिक वस्तुओं के अपच का परिणाम है। अहंकार रुग्न मानसिकता का जनक है। अहं को ईश्वरार्पित करके एवं अहंकार का निरसन करके व्यक्ति अपना एवं समाज दोनों का ही परम हित कर सकता है। आज के इस भौतिक युग में अहंकार का बोलबाला है, जिससे हमें बचना चाहिए एवं ईश्वर में रमना चाहिए। यही श्री कृष्ण का उपदेश है और यही उनकी वाणी है।

न त्वहं कामये राज्यं न च भोगं न जीवितम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।। (महाभारत)


अर्थात् दूषित अहं ही अहंकार है। यह अहंकार भौतिक वस्तुओं पर अनाधिकार गर्व करने और इतराने के कारण होता है। मनुष्य को इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि अन्न हेय नहीं है और न ही उसका ग्रहण करना त्याज्य है। अनुचित तो है उसका अपच होना। ठीक उसी प्रकार भौतिक सम्पदाएँ, मान-प्रतिष्ठा, अधिकार, सत्ता आदि हेय नहीं है अपितु हेय है उसका न पच पाना। उपलब्धियों पर असंतुलित हो जाना ही इस अपच का लक्षण है।

कृष्ण वासुदेवाय नमः।
कृष्ण वासुदेवाय नमः।
कृष्ण वासुदेवाय नमः।


विश्वजीत 'सपन'

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

सत्सङ्गति कथय किं न करोति पुंसाम्


"सत्सङ्गति कथय किं न करोति पुंसाम्।" - यह एक प्राचीन उक्ति जो आज अधिक प्रासंगिक है। महाकवि भर्तृहरि ने कभी कहा था -

जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं,
मानोन्नति दिशति पापमपाकरोति    ।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्सङ्गति कथय किं न करोति पुंसाम्।।

 
सज्जनों की संगति से व्यक्ति का केवल उपकार ही होता है, इसी कथ्य को कवि ने बड़ी सुन्दरता से इस श्लोक में बताया है। सत्संगति से बुद्धि की जड़ता और अज्ञानता दूर होती है, सज्जनों के साथ रहने से वाणी सदैव सत्य भाषण ही करती है। इसी से समाज में उसे सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उसके कारण वह उन्नति करता है।
यह तर्क पद्धति के द्वारा सत्संगति की सुन्दर व्याख्या है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि यदि मनुष्य सज्जन व्यक्ति के साथ रहता है, उसके साथ उठता-बैठता है तो उसके गुण-व्यवहार भी सीखता है। इससे स्पष्ट है कि वह किसी भी प्रकार की अनीति एवं पापकर्म से भी दूर रहता है। अनुचित कार्य न करने एवं उचित एवं अच्छे कार्य करने से उसे जो प्रशंसा मिलती है, उससे वह प्रसन्न रहता है और उसके कार्यों की प्रशंसा से उसका यश चारों दिशाओं में फैलता है।


आज इस युग में जहाँ मानव के पास भटकावे के अनेक साधन हैं और उसके पास इतना समय नहीं कि वह विचार कर सके कि क्या उचित है अथवा अनुचित, तब यह उक्ति और भी सार्थक बन जाती है।
वैसे तो सज्जन के बारे में अनेक बातें हैं किन्तु कुछ गुणों की बात आपसे साझा करता हूँ जो शास्त्रों में कहा गया है। एक श्लोक है -


वांछा सज्जनसङ्गे परगुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता,
विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद् भयम्।
भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले,
एते येषु वसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः।।


सज्जनों से संगति की इच्छा, दूसरों के गुणों से प्रेम, बड़ों के प्रति नम्रता, विद्या में आसक्ति, अपनी पत्नी में प्रेम, लोक-निदा से भय, ईश्वर के प्रति भक्ति, आत्मसंयम में सामर्थ्य, दुर्जन संगति का त्याग, ऐसे गुण जिनमें होते हैं उन्हें नमस्कार है। तात्पर्य यह कि वे ही सज्जन जाने गए हैं। इसके अलावा भी अनेक गुण कहे गए हैं, जैसे - विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाणी की निपुणता, युद्ध में पराक्रम, शास्त्रों में रुचि, मुख में सत्यवाणी, दान का स्वभाव, हृदय में स्वस्थ आचरण, लोभ न करना, सभी प्राणियों पर दया आदि अनेक गुण हैं जो सज्जन की परिभाषा बताते हैं।


अब प्रश्न उठता है कि सज्जन ये हैं तो दुर्जन कौन हैं? तो दुर्जन के संदर्भ में भी अनेक बातें हैं और सबसे सरल तो यह है कि जो सज्जन के गुण हैं उनके विपरीत गुण रखने वाले ही दुर्जन कहे गए हैं, फिर भी उनके बारे में भी अनेक बातें शास्त्रों में कहे गए हैं, जैसे यह श्लोक है -


जाड्यं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ केतवं,
शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियलापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे,
तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्जनैर्नाङ्कितः।।


अर्थात् दुर्जनों का वह स्वभाव होता है कि वे सज्जनों के गुणों को भी अवगुण के रूप में देखते हैं। लज्जा में मूर्खता, व्रत की रुचि में पाखंड, पवित्रता में धूर्तता, शौर्य में निर्दयता, चुप रहने में बुद्धिहीनता, प्रिय बोलने में दीनता, तेजस्विता में अभिमान, वर्क्तृत्व में वाचालता, शांति में निर्बलता समझते हैं। साथ ही अकारण झगड़ा, दूसरी स्त्री में इच्छा, सहनशीलता का अभाव, चुगलखोरी करना, लोभ करना, मन में खोट रखना, दूसरे की बुराई करना, धन की लालसा करना आदि दुर्जन के गुण कहे गए हैं।

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विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 30 अगस्त 2014

उचित और अनुचित कुछ नहीं होता


हम किसी घटना को किस प्रकार से देखते हैं, वह उचित एवं अनुचित का बोध कराता है। एक घटना को उचित अथवा अनुचित दृष्टि से देखना हमारी अपनी मानसिकता एवं परिस्थितियों पर निर्भर करता है। एक सामान्य सी घटना से इसे समझने का प्रयास करते हैं - एक व्यक्ति गंदी नाली की सफाई कर रहा था। उसके पास से अनेक प्रकार के मनुष्य आ-जा रहे थे। एक संभ्रान्त व्यक्ति बोला - "कितना अभागा इंसान है। मैं तो यह कार्य कभी नहीं करता।" वहीं से एक ऐसा व्यक्ति गुजरा, जिसके पास कोई काम नहीं था और पेट भरने के लिये पैसे भी नहीं थे। उसने कहा - "अरे, कितना भाग्यशाली व्यक्ति है। इसे यह काम मिल गया और मुझे कोई काम नहीं मिलता।"

सत्य यही है कि उचित अथवा अनुचित कुछ भी नहीं होता है। वस्तुतः जो भी होता है, वह उचित होता है। ईश्वर ने उसे उचित जानकर ही होने दिया है। यह तो हम मनुष्य में दोष है कि यदि वह हमारे भले के लिए नहीं होता तो हम उसे अनुचित मान लेते हैं। अनुचित कुछ भी नहीं होता है। वह अनुचित हमें प्रतीत होता है क्योंकि हमारे मन-मुताबिक नहीं होता है। हमारा नजरिया ठीक होना चाहिए, तब हमें अनुचित कुछ भी नहीं लगता। शीर्षासन करते समय जगत को उल्टा देख लेने से जगत उल्टा नहीं होता बल्कि हमें वैसा दिखाई देता है।

हमें सत्य समझने का प्रयास करना चाहिए। यही ईश्वर की इच्छा है। यही उचित है। ईश्वर कभी अनुचित कार्य नहीं करता है और न ही होने देता है। असल में जो होता है, वही होना था, अतः वह होता है। इसमें चाहे हमारे अपने कर्म के दोष हों अथवा मन के, निर्णय परमपिता करता है। यहाँ कुछ व्यक्ति विवाद करते हैं कि तब तो अनुचित कार्य भी उचित ही होना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं है। किसी को हानि पहुँचाना, किसी की निंदा करना आदि कार्य अनुचित अवश्य होते हैं, अतः इसे भ्रम के रूप में उचित सोच लेना पुनः हमारी अपनी मानसिकता का ही परिचायक है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी घटना अथवा कर्म अथवा कार्य को सकारात्मक एवं शुद्ध दृष्टि से देखना ही ईश्वर की इच्छा है। यही जीवन को सही ढंग से जीने का असली माध्यम है।


                                                                                  विश्वजीत ‘सपन’

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

ईद उल-फ़ित्र


इस त्योहार के बारे में जानने से पहले इस्लाम का वह संदेश जो नबी (हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा) ने अपने अंतिम हज के बाद दिया था - ‘आज अहदे जाहीलियत (अज्ञानता काल) के तमाम दस्तूर और तौर-तरीक़े ख़त्म कर दिए गए। ख़ुदा एक है और तमाम इंसान आदम की औलाद हैं और वे सब बराबर हैं। अरबी को अजमी (ग़ैर-अरबी) पर और अजमी को अरबी परए काले को गोरे पर और गोरे को काले पर कोई फ़ज़ीलत (श्रेष्ठता) नहीं। अगर किसी को बड़ाई है तो नेक काम की वजह से है। तमाम ईमानवाले भाई-भाई हैं।’

    कहते हैं कि पहला ईद उल-फ़ित्र का त्योहार मुहम्मद साहब ने 624 ईसवीं में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था। इस्लाम में दो प्रकार की ईद मनाये जाने की प्रथा है - ईद उल फ़ित्र और ईद उल जुहा। इस्लामी कैलेण्डर चाँद के हिसाब से चलता है और हिजरी के नौवें महीने में रमज़ान मनाने की प्रथा है। ‘रमज़ान’ शब्द ‘रमज़’ धातु से बना है, जिसका भावार्थ है - तपिश, गरमी। ऐसा अनुमान है कि जब महीनों के नाम निश्चित किए गए होंगे तो यह महीना सख़्त गरमी का रहा होगा।

    नियम के अनुसार इस महीने सभी मुसलमानों को पूरे महीने रोज़ा (व्रत) रखना अनिवार्य है और यह उसका फ़र्ज है। महीने में दिनभर उपवास रखा जाता है। इस महीने का उल्लेख कुरआन में कई जगह आया है। यह वही महीना है, जिसमें कुरआन का अवतरण हुआ था। इसी रमज़ान के महीने के बाद दसवें महीने के पहले दिन ईद उल फ़ित्र मनाया जाता है। अंतिम रात को जब चाँद डूबता है और ईद के चाँद का अवतरण होता है तो ईद मनायी जाती है। यह एक ऐसी रात मानी गई है जो हज़ारों रातों से उत्तम और श्रेष्ठ है।

    रोज़ा का अर्थ व्रत है। कुरआन में इसके लिए ‘सियाम’ शब्द आया है, जिसका मौलिक अर्थ रुक जाना होता है। इस प्रकार रोज़ा रखने का अर्थ हुआ कि आदमी सुबह पौ फटने से लेकर सूर्यास्त तक खाने-पीने और काम-वासना की पूर्ति से रुका रहता है। ऐसा माना गया है कि आत्मा की शुद्धता और आत्मिक विकास के लिए रोज़ा रखना आवश्यक है। इस व्रत से व्यक्ति में संयम उत्पन्न होता है और वह ईशपरायण बन जाता है। उसका विश्वास अल्लाह में हो जाता है और बढ़ जाता है। इस दौरान मुसलमानों का फ़र्ज है कि वे इस दौरान कोई ग़लत काम न करें और जितना संभव हो दूसरों की मदद करें। यदि कभी कोई नेक काम करने का अवसर मिले तो उस अवसर को जाने न दे। 

    पूरे विश्व में यह ईद हर्षोल्लास से मनाई जाती है और इसे भाईचारा बढ़ाने वाले त्योहार के रूप में देखा जाता है। इस त्योहार में सभी मुसलमान ख़ुदा से सुख-शांति और बरकत की दुआ माँगते हैं। साथ ही ख़ुदा का शुक्रिया भी अदा करते हैं कि उन्होंने एक महीने उपवास रखने की शक्ति दी। इस दिन नये कपड़े पहने जाते हैं और मस्जिद में जाकर इबादत (पूजा) करते हैं। इस दिन मुसलमानों के लिए ज़कात उल फ़ित्र यानी दान देना भी फ़र्ज है। यह दान ग़रीबों में बाँट दिया जाता है। कहते हैं कि कम से कम दो किलो का दान करना ही चाहिये। इस महीने आपसी मतभेद एवं झगड़ों को भी निपटाया जाता है। इस पवित्र महीने में मन में कोई पाप भी नहीं आना चाहिए ऐसा आदेश है। सभी लोग परिवार एवं दोस्तों के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान भी करते हैं और नमाज़ (सलात) के बाद एक-दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। इस दिन सिवैयाँ इस त्योहार का एक विशेष खाद्य पदार्थ है।
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विश्वजीत 'सपन'