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बुधवार, 19 मार्च 2014

काशी मरणान्मुक्ति (पुस्तक समीक्षा)




काशी मरणान्मुक्तिएक ऐसी पुस्तक है जो गहन अध्ययन एवं सुन्दर कल्पना का संगम है। असल में इस संसार रूपी मायाजाल को समझना एक कठिन कार्य है और कण-कण में शिव तथा कण-कण शिव है, इस तथ्य को सहज अनुभूत करना तो एक सामान्य मनुष्य के लिए अति-दुष्कर ही है। इस जीवन-दर्शन को समाज के सामने रखना एक उत्तम कार्य है जिसे लेखक द्वय ने बड़ी सुघड़ता से किया है। इस हेतु लेखक द्वय श्री मनोज ठक्कर एवं सुश्री रश्मि छाजेड़ बधाई के पात्र हैं।

जीवन में अलौकिकता का अपना ही महत्त्व होता है। यह मानव के ईश्वर-समर्पण भाव को जागृत करता है और यह विश्वास दिलाने का कार्य करता है कि उस परम शक्ति का अस्तित्व है। वही शक्ति है, वही परम है और एकमात्र विश्व है। वही शिव है, वही विष्णु है और वही आराध्य है। इस विश्वास को पाठक के मन में जगा सकने में काशी मरणान्मुक्तिसफल रहा है। यह एक उपन्यास ही नहीं है बल्कि एक जीवन-आख्यान भी है और अत्यधिक प्रेरक भी। एक अदना से व्यक्ति को महानायक के रूप में प्रतिष्ठापित करता यह कथानक समाज के अनेक पहलुओं को छूता हुआ एक सुन्दर यात्रा पर निकल पड़ता है, जिसमें कभी उफान है तो कभी उड़ान, कभी रहस्य है तो कभी रोमांच है, कभी गहन सोच है तो कभी समाज की बनाई कुरीतियों पर चोट, कभी अन्तर्द्वन्द्व है तो कभी ऊहापोह, कभी माँ का प्यार है तो कभी उसके मन की दुविधा, कभी जाति एवं धर्म की दीवार को तोड़ कर सर्वजन हिताय की बीन है तो कभी शिव का मंगल गान। क्या नहीं है इस कथानक में, जो एक के बाद एक रहस्य को खोलता जीवन्त करता चला जाता है।
 
यह कथा विस्तृत अनुभवों को अपने में समेटे हुए है एवं इस कथा में ज्ञान-सरिता निरन्तर प्रवाहित हुई है। यह उपन्यास स्थापित करता है कि प्रत्येक मानव मात्र मानव है। वह किसी जाति, धर्म अथवा सम्प्रदाय का नहीं होता। उसके जातिगत अथवा पीढ़िगत कार्य उसे मानव जाति से विलग नहीं करते। यह सन्देश यहाँ बहुत सुन्दरता से प्रकट हुआ है, जो इस कालखण्ड में एक आवश्यक उद्देश्य की पूर्ति के लिए बड़ी सुन्दरता से समर्पित है। 

अद्वैत की पुनर्स्थापना सहज ही दुष्कर कार्य है और इस पर एक सामान्य व्याख्या अति दुर्लभ। इस पर कोई भी प्रयास सराहनीय ही कहा जाएगा। सगुण के माध्यम से निर्गुण ब्रह्म की पहचान ही सरल उपाय है। यह कथ्य भी बहुत सुन्दरता से प्रकट होता है। एक चांडाल के पात्र की कल्पना ही एक समर्थ चिंतना का द्योतक है और फिर उसके माध्यम से मानव जाति के कल्याण की अनुभूति अतुलनीय एवं सच्ची मानव सेवा की भावना का प्रदर्शन है। हिमालय के भ्रमण से लेकर काशी महाश्मशान मणिकर्णिका पर चिता के जलने के वर्णन कई बार रौंगटे खड़े कर देने वाले हैं। एक नायक के दो स्वरूपों ख्यात एवं अज्ञात को निरन्तर वहन करता, उसके मन के द्वन्द्व को पाठक के मन तक लेकर पहुँचता, मानव मन को उद्वेलित करता, शाश्वत सत्य को स्थापित करता और ऐसे ही अनेक उद्देश्यों की पूर्ति करता यह कथानक रोमांच से परिपूर्ण एक अद्भुत कथानक है। काशी का वर्णन बहुत ही उत्तम है। वहाँ के दृश्य सजीव होकर पाठक को काशी भ्रमण करा देने में सक्षम हैं। वहाँ से लेकर लगभग समूचे भारत भूखण्ड की यात्रा एक अनुभव है, जो ज्योतिर्लिंगों एवं अन्य पावन भूमियों के रूप में वर्णित है। 

सच्चे गुरु की खोज और अध्याय के अंत में वाक्य – पर याद रख मैं तेरा गुरु नहीं - पाठक को रहस्य एवं रोमांच में डुबो देता है। यशोदा के रूप में माता के मन में चल रहे भावों को उकेरना, इस्माइल चाचा के माध्यम से आध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को उजागर करना, काशी विश्वनाथ की महिमा, कबीर, सूर, तुलसी से लेकर अनेक संतों की वाणी को सजाना, गुरु की अलौकिकता और दिव्यता को पूर्णतः स्वाभाविक बना देना और ऐसी ही अनेक घटनाओं एवं वर्णनों को शब्दों के माध्यम से जीना एक कुशल कथाकार की निशानी है।
कथा की भाषा थोड़ी क्लिष्ट है और कभी-कभी पाठक पुनरावृत्तियों से भी असहज महसूस कर सकते हैं, किन्तु उन्हें समझना होगा कि यह हमारी शास्त्रगत विशेषताएँ हैं कि जहाँ उद्देश्य पूर्ति हेतु एक ही बात को अनेक प्रकार से कहने की प्रथा रही है ताकि उस उद्देश्य में निहित गूढ़ार्थ को सरलता से ग्रहण किया जा सके। पुस्तक का विशाल आकार भी कुछ बाधाकारक है, जिसे संक्षिप्त किया जाता तो बेहतर होता। घटनाक्रम कई बार उपदेशों के चलते सुस्त होते हैं, किन्तु एक बार इसे पढ़ना प्रारंभ कर लेने के बाद इसमें रुचि उत्पन्न होना बहुत स्वाभाविक है। आध्यात्म एवं मानव कल्याण में विश्वास करने वाले सभी पाठक इसका आनंद स्वाभाविक रूप से ले सकते हैं।


                                              विश्वजीत सपन




प्रकाशक
शिव ऊँ साई प्रकाशन
95/3, वल्लभ नगर
इन्दौर - 452003

उपन्यास (509 पृष्ठ)
मूल्य - 360 रुपये
आईएसबीएन 978-81-910921-2-1
प्रथम संस्करण - सितम्बर 2010
द्वितीय संस्करण - जून 2011
तृतीय संस्करण - अक्टूबर 2011