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मंगलवार, 4 जुलाई 2017

दो नावों पर पैर रखना।

‘‘दो नावों पर पैर रखना’’ यह मुहावरा आज के जीवन के लिये बहुत ही सटीक है। आज प्रतियोगिता का युग है, अर्थ का युग है, आपा-धापी का युग है, अतः कुछ पाने के लिये अत्यधिक प्रयास की आवश्यकता होती है। तब सफलता पाने के लिये कई बार मानव दो नावों पर पैर रखने के लिये विवश होता है। इसी कारण से यह मुहावरा आज के युग में अधिक सार्थक कथन के रूप में देखा जा सकता है।

चाहे यह कथन एक युग-सत्य हो, किन्तु इस कथन को समझना और इसके गुण-दोष की विवेचना अवश्य होनी चाहिए, ताकि एक आम मानव इसे अपने लाभ के लिये प्रयोग कर सके। यह कथन बहुत पुराना है और इसका अर्थ यही लगाया जाता है कि यदि कोई मानव दो नावों पर पैर रखता है, तो उसका गिरना अवश्यंभावी है। अर्थात् यदि हम दो कार्यों को एक साथ करने का प्रयास करते हैं, तो हमें किसी एक में भी सफलता नहीं मिलती है। तात्पर्य यह कि माया मिली न राम। 


अकसर देखा जाता है कि हम सफलता प्राप्त करने की होड़ में अनेक कार्यों को एक साथ अंजाम देने का प्रयास करते हैं। हमारा लक्ष्य होता है कि एक नहीं तो दूसरे में सफलता मिलेगी, या तीसरे में या चौथे में। तब असल में होता क्या है कि हमारी दृष्टि भटक जाती है और हम एक लक्ष्य न बना कर अनेक लक्ष्य बना बैठते हैं। एक लक्ष्य को आसानी से भेदा जा सकता है यदि हमारा निश्चय दृढ़ हो, किन्तु अनेक लक्ष्यों को भेदना कठिन ही नहीं, अपितु दुष्कर भी होता है। तब अनेक तो छूटा होता ही है, वह एक भी छूट जाता है। 


एक प्रसिद्ध श्लोक है -


यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निशेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेवहि।।


अर्थात् जो निश्चत को छोड़कर अनिश्चित की ओर बढ़ता है, उसको अनिश्चित तो नहीं मिल पाता और निश्चित भी छूट जाता है।


अतः दो नावों पर पैर रखना कभी भी और किसी भी युग में उचित नहीं कहा जायेगा। हमें चाहिए कि आज के इस युग में एक लक्ष्य निर्धारित करें, अर्जुन की तरह और हमेशा हमें चिड़िया की आँख ही दिखाई देनी चाहिए। यही सफलता का मूलमंत्र है।


वैसे भी आज का युग विशेषज्ञता का है। ‘‘जैक ऑफ ऑल एण्ड मास्टर ऑफ नन’’ आज के युग में बेमानी है, तब दो नावों पर पैर रखना एक कठिन विकल्प ही माना जायेगा। आज आपको किसी एक स्किल में विशेषज्ञ होना होगा, तब दो नावों पर पैर रखने की बात होनी ही नहीं चाहिए। 


विश्वजीत ‘सपन’