Followers

रविवार, 6 अगस्त 2017

आगे बढ़ना महत्त्वपूर्ण है

कंफ्यूसियस ने कहा था - ‘‘आप चाहे कितना भी धीमा चलें, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, जब तक कि आप रुक नहीं जाते।’’ एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण उक्ति है। जीवन के लिये यही चलना या आगे बढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है। रुकना जीवन का अंत है और प्रगति से मुँह मोड़ना है।

मानव-जीवन ईश्वर का उपहार है। इस उपहार की अनेक शर्तें हैं। उन्हें समझना और समझकर तदनुसार कार्य करना मानव का उत्तरदायित्व है। यह जीवन सरल हो, सुखमय हो - कामना यही रहती है, किन्तु कैसे? इसका भान कम मनुष्यों को ही होता है। ईश्वर का संदेश यही है कि मनुष्य को निरन्तर आगे बढ़ने का प्रयास करता रहना चाहिए। इसी में जीवन का आनंद है और जीवन का लक्ष्य निहित है। 


जब भी हम कोई कार्य करना चाहते हैं, तो हमें उसकी ओर चलना होता है। अवस्थायें अवश्य अनेक प्रकार की हो सकती हैं, किन्तु चलने का उपक्रम करना ही होता है। जब लक्ष्य निर्धारित हो जाये, तब सबसे पहली शर्त है आदर्शता की। लक्ष्य हमेशा आदर्श होना चाहिए। उसके बाद हम उस लक्ष्य की कल्पना करते हैं और मन में एक स्वरूप बना लेते हैं। उसके बाद उस लक्ष्य को अपने व्यवहार में लाते हैं और तभी हमें सफलता प्राप्त होती है। तो जीवन में चलना आवश्यक है और उसमें क्रम से चलना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। 


दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के रूप में जीवन को गति मिलती रहती है। यही सत्य है। जीवन चलायमान है, निरन्तर गतिमान है।


शास्त्रों में रुकने को मृत्यु के समान माना गया है। फिर मृत्यु जीवन का रुकना ही है। तब रुकने की बात को समझना होगा। यह अति के रूप में मृत्यु अवश्य है, किन्तु इसका आशय जीवन को दुःखमय बनाने का भी है। यदि हम निरन्तर चलते रहें, चाहे हमारे क़दम धीमे ही क्यों न हो, लक्ष्य तक पहुँचना तय है। कछुआ धीमे से चलकर लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। मानव-जीवन में इसका उदाहरण महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायक है। चलना आवश्यक है। किसी कार्य की सफलता के लिये, किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये, किसी भी सपने को सच करने के लिये, किसी उम्मीद को पूरा करने के लिये, अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिये हमें चलना आवश्यक है।


समस्त प्रकृति को देखें, तो प्रत्येक स्थल पर बढ़ने का ही संकेत दिखाई देता है। पशु-पक्षी अथवा वनस्पति सभी में बढ़ने की प्रवृत्ति ही दिखाई देती है। प्रकृति हमारी माता के समान है और उनके संकेत को समझकर उन्हें जीवन में अपनाकर चलने से ही मानव-जीवन सफल हो सकता है।


जीवन एक निरन्तर गतिमान प्रक्रिया है। बीजारोपण से शिशु का उत्पन्न होना, उसका वृद्धि करना और अंत में पंचतत्त्व में विलीन हो जाना। समस्त प्रक्रिया एक चलने की ही प्रक्रिया है। उसी प्रकार बीजारोपण के बाद पौधे का जन्म लेना, उसका बढ़ना, फल आदि प्रदान करना और फिर मुरझाकर नष्ट हो जाना। सभी आगे बढ़ने की ही प्रक्रिया है। जीवन का यही सत्य है, जिसे प्रत्येक मनुष्य को समझना होगा और तदनुसार अपने स्वयं के आगे बढ़ने को निरन्तर गतिमान रखना होगा।


देखने का दृष्टिकोण होना चाहिए। यह चलने की प्रक्रिया एक सामान्य चलने की प्रक्रिया नहीं है, जिसे अधिकतर मनुष्य समझने का प्रयास करते हैं। यह जीवन का नियम है। प्रकृति का नियम है। यह किसी वस्तु को मात्र पाने की प्रक्रिया के समान नहीं है। यह वह निरन्तरता है, जिसे ईश्वर ने जगत् के चलायमान रहने के लिये बनाई है। बहुधा हम इसे सामान्य चलने का अर्थ लेकर प्रश्न कर बैठते हैं, जो वास्तविकता को न समझने के कारण होता है। हाँ, इतना अवश्य सत्य है कि यदि यही नियम हम सामान्य चलने में अपनाते हैं, तो हमें सफलता अवश्य मिलती है। 
 
विश्वजीत सपन