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रविवार, 9 नवंबर 2014

राजभाषा हिन्दी




26 जनवरी, 1950 में लागू भरतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार संघ सरकार की राजभाषा हिन्दी होगी एवं इसकी लिपि देवनागरी होगी। असल में संविधान सभा में हिन्दी की स्थिति पर चर्चा का आरंभ 12 सितम्बर 1949 को हुआ था और उसके दो दिनों के बाद अर्थात् 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को ‘राष्ट्र भाषा’ के रूप में स्वीकृति प्रदान की गयी थी। तभी से 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाये जाने की प्रथा का प्रारंभ हुआ है, जो आज भी निरंतर चल रही है। 

संविधान के लागू होते ही हिन्दी को देश की आधिकारिक भाषा का दर्जा तो मिल गया, किन्तु तब यह तय किया गया था कि आगामी 15 वर्षों तक हिन्दी एवं अंग्रेज़ी, दोनों भाषायें कामकाज में बनी रहेंगी और उसके बाद हिन्दी को पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया जायेगा। परन्तु, 1965 में यह अवधि पूरी होने के पहले ही तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक जैसे राज्यों में हिन्दी विरोधी प्रदर्शन प्रारंभ हो गये, जो कहीं-कहीं हिंसक भी हो गये। परिस्थितियाँ जब विकट हो गयीं तो इस पर पुनर्विचार हुआ। परिणामतः राजभाषा अधिनियम, 1963 में संशोधन कर यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक कि संसद के दोनों सदन और देश के सभी राज्य अपनी विधानसभाओं में एक प्रस्ताव पारित कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार नहीं करते, तब तक अंग्रेज़ी भी सरकारी कामकाज में प्रयुक्त होती रहेगी।

  
हिन्दी अधिकांश भारतीयों की भाषा है और आधे से भी अधिक भारतीयों के द्वारा बोली जाती है। साथ ही लगभग तीन चौथाई भारतीयों के द्वारा समझी जाती है। अरुणाचल प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली में हिन्दी को राजकीय भाषा का सम्मान प्राप्त है। 


यह विदेशो में भी बोली और समझी जाती है। हिन्दी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसे अमेरिका, ब्रिटेन, मलेशिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, न्यज़ीलैण्ड सहित अनेक देशों में बोला जाता है। आज हिन्दी का प्रचार-प्रसार द्रुतगति से हो रहा है और कई देशों ने हिन्दी के विश्वविद्यालय खोले हैं और भारत के निकट आने के प्रयास में हिन्दी से जुड़ रहे हैं। दुर्भाग्य यह है हमारे देश में हिन्दी भाषा उपेक्षित महसूस करती है क्योंकि कुछ राज्यों को छोड़कर शेष भारत में अभी भी हिन्दी के बजाय अंग्रेज़ी को अधिक सम्मान दिया जाता है। केन्द्रीय भारत सरकार के अधिकतर कार्य भी अंग्रेज़ी भाषा में ही किये जाते हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों कि स्थिति तो यह है कि यदि उनसे हिन्दी में पत्राचार किया जाता है, तो वे लिखते हैं कि उनसे अंग्रेज़ी में ही पत्राचार किया जाये।


इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विश्व के सभी प्रमुख विकसित एवं विकासशील देश अपनी-अपनी भाषाओं में ही सरकारी काम-काज करके समृद्ध और उन्नत हुए हैं। भारत में राजभाषा विभाग प्रतिवर्ष अनेक क़दम उठाता रहा है ताकि सरकारी उद्यमों में अधिकाधिक हिन्दी भाषा के प्रयोग बढ़ावा मिल सके। देश में एकता एवं अखण्डता के लिए भी एक भाषा का अपना ही महत्त्व होता है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी राजभाषा पर गर्व करें और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ही साथ राष्ट्रभाषा का भी उचित सम्मान करें।


विश्वजीत ‘सपन’