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शनिवार, 18 जून 2016

एकल परिवार बनाम संयुक्त परिवार


विषय बहुत ही सुन्दर एवं प्रासंगिक है। भारत ग्राम-प्रधान देश रहा है और संयुक्त परिवार की अवधारणा प्रचीन काल से चली आ रही है। किन्तु आज का युग इच्छा-अनिच्छा से एकल परिवार का है। शहरी तो शहरी, यहाँ तक कि ग्रामीण वातावरण में भी संयुक्त परिवार विघटन के दौर से गुज़र रहा है। ऐसे में इनके गुणों एवं अवगुणों को देखने की आवश्यकता नज़र आती है। सर्वप्रथम हम एकल परिवार के गुणों को देखें और सकारात्मक सोच के साथ देखें, तो ये गुण हमारी दृष्टि में आते हैं - 


1.    यह इंसान को स्वावलंबी बनाता है।
2.    परिवार में अत्यन्त घनिष्ठता का बीज बोता है, जिसके कारण माता-पिता एवं बच्चों में भाव-बंधन बहुत गहरा होता है।
3.    यह बच्चों को भी स्वावलंबी बनने का अवसर प्रदान करता है।
4.    मुखिया को उत्तरदायित्व का भान जीवन के प्रारंभिक चरण में हो जाता है।
5.    विचारों की स्वतंत्रता रहती है और जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का अवसर मिलता है।
6.    जीवन को व्यवस्थित करने का सुअवसर होता है।
7.    चुनौतियों को सामना करने के अवसर से व्यक्ति में जीवन के प्रति आत्म-विश्वास आता है।
8.    दूसरों पर निर्भरता कम होती है।
9.    पति-पत्नी के बीच में संबंध गहरा होता है और एक-दूसरे के प्रति समझ का अधिक अवसर रहता है। दोनों में एकजुटता से परिवार चलाने का अवसर होता है। छोटी-छोटी ख़ुशियों से आपस में गहरा संबंध बनने का अवसर रहता है।
10.    जीवन को देखने के दृष्टिकोण में बहुत बड़ा परिवर्तन आता है।


अब हम संयुक्त परिवार के लाभों की गणना करें, तो निश्चय ही हमें बहुत सारे गुणों को देखने को मिलता है।


1.    यह टीम भावना को जागृत करने का सुन्दर अवसर प्रदान करता है।
2.    आपसी मेल से चुनौतियों का सामना सरलता से संभव है।
3.    एक-दूसरे का बल और संरक्षण रहता है।
4.    बच्चों को अच्छे संस्कार मिलने के अधिक अवसर होते हैं।
5.    कभी एकाकी होने का अवसर नहीं होते, तो मानसिक रूप से बाधा आने के अवसर भी कम रहते हैं।
6.    अनुभवी वृद्धों से जीवन के अनुभवों को प्रारंभ से जाना-समझा जा सकता है।
7.    बच्चों का लालन-पालन सरल एवं सहज हो जाता है। उन पर दृष्टि रखने वाले अनेक लोगों के होने से उनके बिगड़ने का ख़तरा कम रहता है।
8.    एक-दूसरे से, परिवार के सदस्यों से, समाज आदि से सहयोग की भावना का विकास होता है।
9.    जीवन को सरलता से जीने का अवसर रहता है। एक-दूसरे के सहयोगी की आशा रहती है। कठिनाइयों को सहयोग से सामना करने का भरोसा रहता है।
10.    अनुभवों की सीखों से जीवन सरल हो जाता है।


आज के इस युग में एकल परिवार का सबसे बुरा प्रभाव माता-पिता पर पड़ता है। वे एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिये शापित हो जाते हैं। बेटा और उनका परिवार जीविका की तलाश में दूर कहीं चले जाते हैं और ये उनके साथ नये माहौल में रह नहीं पाते। दुःखद है, किन्तु युग की सच्चाई भी है।
एकल परिवार के कुछ अवगुणों की ओर चलना चाहता हूँ। बहुत हैं, किन्तु कुछ को रेखांकित करने का प्रयास करता हूँ।


1.    कठिनाइयों में एकाकीपन का बोझ गहरा होता है। कोई विचार साझा करने वाला भी नहीं होता। देखने वाले तो नहीं ही होते हैं।
2.    बच्चों की देखभाल में कमी रह जाती है। जैसा कि ऊपर भी बताया गया है, अतः इस अधिक कुछ नहीं कहूँगा।
3.    घर की सुरक्षा में छेद हो जाते हैं। हमें कभी भी पूरा घर बंदकर जाना पड़ता है। कोई रहने वाला नहीं होता।
4.    व्यक्ति सीमित और स्वार्थी हो जाता है। अपने परिवार के अलावा उसे कुछ नहीं सूझता है।
5.    सामाजिक जीवन न के बराबर रह जाता है। सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
6.    बच्चों के बिगड़ने का भय बढ़ जाता है। उनकी देखभाल प्रभावित होती है।
7.    अनेक कार्य अनुभव की कमी के कारण अधूरे अथवा उचित तरीके से पूरे नहीं हो पाते हैं।
8.    सहायक हाथों की कमी से जीवन में कठिनता आती है। शिथिलता आती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
9.    पति-पत्नी यदि समझदारी से काम न लें, तो कलह को जन्म देते हैं और आपसी मतभेद बच्चों पर बुरा असर करते हैं।
10.    स्वतंत्रता, स्वच्छंता में परिवर्तित होते हैं और जीवन को अनुचित दिशा में ले जाते हैं।


एकल परिवार में लाख बुराइयाँ हों, किन्तु यदि वह आज की आवश्यकता अथवा विवशता है, तो उसे सकारात्मक लेने में ही भलाई है। भारतीय बहिर्मुखी होता है और वह सहजता से मित्रता कर लेता है। ये मित्र ही संयुक्त परिवार की भूमिका निभा सकते हैं और निभाते भी हैं। आवश्यकता है, परिस्थिति के अनुसार हमें ढल जाने की।


विश्वजीत 'सपन'

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