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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

एकाग्रचित्त

एको देवः केशवो वा शिवो वा,
एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।।नी.श.72।।

अर्थात् एक ही देवता हो, केशव चाहे शिव हो। एक ही मित्र, चाहे वह राजा हो या संन्यासी। एक ही निवास हो, चाहे वह नगर में या वन में। एक ही नारी हो, चाहे वह सुन्दरी हो अथवा कुरूप।

तात्पर्य यह कि व्यक्ति को स्थिर चित्त होना चाहिए और एक में ही मन को रमाना चाहिए। मन को कभी भटकने नहीं देना चाहिए। किसी एक ही देवता में मन रमाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। मित्रता स्थाई होनी चाहिए तब चाहे वह किसी सम्पन्न के साथ हो अथवा नहीं। साथ ही व्यक्ति को निवास का एक स्थान निश्चित करना चाहिए और एक ही स्त्री से सम्पर्क करना चाहिए। वस्तुतः यही चित्त की एकाग्रता है और मानव के लिये यही उचित माना गया है। भटकाव के अनेक साधन हैं, किन्तु प्रयास कर इन भटकावों से दूरी बनानी चाहिए।
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सादर नमन

शनिवार, 5 सितंबर 2015

हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व


    त्योहार का शब्दिक अर्थ है, जिस दिन कोई धार्मिक अथवा जातीय उत्सव मनाया जाये। इसके लिये पर्व शब्द का भी प्रयोग होता है। पर्व शब्द का सम्बन्ध शुभ मुहुर्तों, लग्नों अथवा क्षणों के योग से है। एकादशी, चतुर्दशी, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि पर्व कहे गये हैं। ऐसे अवसरों पर नदी स्नान, उपवास, पूजा आदि किये जाते हैं। उत्सव शब्द का अर्थ है ‘‘आनंद का अतिरेक’’। इस समय सामूहिक आनंद का अतिरेक देखा जाता है। तीज शब्द भी त्योहार का द्योतक बन गया है।

आदिकाल से ही भारतवर्ष में त्योहारों का महत्त्व रहा है। नाना प्रकार के त्योहारों से समाज की धार्मिक मान्यताओं का भी पता चलता है। ये त्योहार यूँ ही नहीं मनाये जाते, बल्कि इनके पीछे भी पौराणिक कथाओं की महत्ता रही है। एक समय था, जब ये जीवन का एक हिस्सा होते थे और मनोरंजन के साधन भी, किन्तु आज इस स्थिति में गिरावट की प्रतीति होती है, क्योंकि ढकोसलों, बाह्याडम्बरों ने इन्हें प्रभावित किया है। मानसिकता में भी परिवर्तन आये हैं और आस्था भी अर्थ-प्रधान होती दिखाई देती है। इसके बाद भी आज भी त्योहारों के हमारे जीवन में महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।


भारतवर्ष को त्योहारों का देश कहा जाता है। इसके पीछे दार्शनिक कारण छुपा हुआ है। असल में मानव दुःख अधिक पालता है और सुख के क्षणों को शीघ्र ही भूल जाता है। जब त्योहार आते हैं, तो मानव के जीवन में सुख के क्षण आते हैं। वह इस समय सारे दुःखों को भुलाकर आनंद की ओर उन्मुख होता है, जिस कारण उसके जीवन में सुख और प्रसन्नता का वातावरण आता है। अतः इस वातावरण को उनके जीवन में बारम्बार लाने के लिये ही अनेक त्योहारों की अवधारणा विकसित की गयी है। सभी त्योहार मानव-जीवन से सम्बधित हैं और हमारे जीवन में इनका सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व रहा है।


इन त्योहारों को हम निम्न वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।


1) धार्मिक त्योहार - शिवरात्रि, जन्माष्टमी, दीपावली, दशहरा, ईद, बकरीद आदि
2) सांस्कृतिक त्योहार - बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, होली, भाईदूज आदि
3) राष्ट्रीय त्योहार - स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती, एकता दिवस आदि
4) यादगार त्योहार - गाँधी पुण्यतिथि, राणा प्रताप जयन्ती, नेहरू जयन्ती, वाल्मीकि जयन्ती आदि।


विजयादशमी का दिन आपने काम-क्रोध आदि आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाने का दिन माना जाता है। दीवाली खुशियों का त्योहार है। भारतीय जीवन में नये संवत्सर का प्रारंभ चैत्र महीने से होता है और इसी दिन होली का त्योहार मनाया जाता है। सामाजिक दृष्टि से होली का अर्थ बीत गई बात से है और इसलिए इस आनंद का अनुभव किया जाता है, नयी शुरुआत के साथ। जन्माष्टमी और रामनवमी जैसे त्योहार श्रीकृष्ण और श्रीराम से जुड़े हैं। वहीं बसंत पंचमी में प्रकृति ऋतु को पावन कर सँवारती है। अनेक प्रकार के त्योहार हमारे जीवन में अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

  
ये सभी त्योहार हमारे जीवन का अंग हैं। ये न केवल हमारे जीवन को प्रेरित करते हैं, बल्कि हमें हमारे कर्तव्यों की याद भी दिलाते हैं। हमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देते हैं। साथ ही हमें सुख प्रदान करते हैं। असल में ये हमारी परम्परायें हैं, जो हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को एक दिशा प्रदान करते हैं। इनका संदेश भाईचारा ही है। इनका संदेश ख़ुशी ही है।


विश्वजीत ‘सपन’