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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

एकाग्रचित्त

एको देवः केशवो वा शिवो वा,
एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।।नी.श.72।।

अर्थात् एक ही देवता हो, केशव चाहे शिव हो। एक ही मित्र, चाहे वह राजा हो या संन्यासी। एक ही निवास हो, चाहे वह नगर में या वन में। एक ही नारी हो, चाहे वह सुन्दरी हो अथवा कुरूप।

तात्पर्य यह कि व्यक्ति को स्थिर चित्त होना चाहिए और एक में ही मन को रमाना चाहिए। मन को कभी भटकने नहीं देना चाहिए। किसी एक ही देवता में मन रमाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। मित्रता स्थाई होनी चाहिए तब चाहे वह किसी सम्पन्न के साथ हो अथवा नहीं। साथ ही व्यक्ति को निवास का एक स्थान निश्चित करना चाहिए और एक ही स्त्री से सम्पर्क करना चाहिए। वस्तुतः यही चित्त की एकाग्रता है और मानव के लिये यही उचित माना गया है। भटकाव के अनेक साधन हैं, किन्तु प्रयास कर इन भटकावों से दूरी बनानी चाहिए।
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सादर नमन

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