Followers

रविवार, 6 अगस्त 2017

आगे बढ़ना महत्त्वपूर्ण है

कंफ्यूसियस ने कहा था - ‘‘आप चाहे कितना भी धीमा चलें, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, जब तक कि आप रुक नहीं जाते।’’ एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण उक्ति है। जीवन के लिये यही चलना या आगे बढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है। रुकना जीवन का अंत है और प्रगति से मुँह मोड़ना है।

मानव-जीवन ईश्वर का उपहार है। इस उपहार की अनेक शर्तें हैं। उन्हें समझना और समझकर तदनुसार कार्य करना मानव का उत्तरदायित्व है। यह जीवन सरल हो, सुखमय हो - कामना यही रहती है, किन्तु कैसे? इसका भान कम मनुष्यों को ही होता है। ईश्वर का संदेश यही है कि मनुष्य को निरन्तर आगे बढ़ने का प्रयास करता रहना चाहिए। इसी में जीवन का आनंद है और जीवन का लक्ष्य निहित है। 


जब भी हम कोई कार्य करना चाहते हैं, तो हमें उसकी ओर चलना होता है। अवस्थायें अवश्य अनेक प्रकार की हो सकती हैं, किन्तु चलने का उपक्रम करना ही होता है। जब लक्ष्य निर्धारित हो जाये, तब सबसे पहली शर्त है आदर्शता की। लक्ष्य हमेशा आदर्श होना चाहिए। उसके बाद हम उस लक्ष्य की कल्पना करते हैं और मन में एक स्वरूप बना लेते हैं। उसके बाद उस लक्ष्य को अपने व्यवहार में लाते हैं और तभी हमें सफलता प्राप्त होती है। तो जीवन में चलना आवश्यक है और उसमें क्रम से चलना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। 


दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के रूप में जीवन को गति मिलती रहती है। यही सत्य है। जीवन चलायमान है, निरन्तर गतिमान है।


शास्त्रों में रुकने को मृत्यु के समान माना गया है। फिर मृत्यु जीवन का रुकना ही है। तब रुकने की बात को समझना होगा। यह अति के रूप में मृत्यु अवश्य है, किन्तु इसका आशय जीवन को दुःखमय बनाने का भी है। यदि हम निरन्तर चलते रहें, चाहे हमारे क़दम धीमे ही क्यों न हो, लक्ष्य तक पहुँचना तय है। कछुआ धीमे से चलकर लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। मानव-जीवन में इसका उदाहरण महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायक है। चलना आवश्यक है। किसी कार्य की सफलता के लिये, किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये, किसी भी सपने को सच करने के लिये, किसी उम्मीद को पूरा करने के लिये, अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिये हमें चलना आवश्यक है।


समस्त प्रकृति को देखें, तो प्रत्येक स्थल पर बढ़ने का ही संकेत दिखाई देता है। पशु-पक्षी अथवा वनस्पति सभी में बढ़ने की प्रवृत्ति ही दिखाई देती है। प्रकृति हमारी माता के समान है और उनके संकेत को समझकर उन्हें जीवन में अपनाकर चलने से ही मानव-जीवन सफल हो सकता है।


जीवन एक निरन्तर गतिमान प्रक्रिया है। बीजारोपण से शिशु का उत्पन्न होना, उसका वृद्धि करना और अंत में पंचतत्त्व में विलीन हो जाना। समस्त प्रक्रिया एक चलने की ही प्रक्रिया है। उसी प्रकार बीजारोपण के बाद पौधे का जन्म लेना, उसका बढ़ना, फल आदि प्रदान करना और फिर मुरझाकर नष्ट हो जाना। सभी आगे बढ़ने की ही प्रक्रिया है। जीवन का यही सत्य है, जिसे प्रत्येक मनुष्य को समझना होगा और तदनुसार अपने स्वयं के आगे बढ़ने को निरन्तर गतिमान रखना होगा।


देखने का दृष्टिकोण होना चाहिए। यह चलने की प्रक्रिया एक सामान्य चलने की प्रक्रिया नहीं है, जिसे अधिकतर मनुष्य समझने का प्रयास करते हैं। यह जीवन का नियम है। प्रकृति का नियम है। यह किसी वस्तु को मात्र पाने की प्रक्रिया के समान नहीं है। यह वह निरन्तरता है, जिसे ईश्वर ने जगत् के चलायमान रहने के लिये बनाई है। बहुधा हम इसे सामान्य चलने का अर्थ लेकर प्रश्न कर बैठते हैं, जो वास्तविकता को न समझने के कारण होता है। हाँ, इतना अवश्य सत्य है कि यदि यही नियम हम सामान्य चलने में अपनाते हैं, तो हमें सफलता अवश्य मिलती है। 
 
विश्वजीत सपन

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

दो नावों पर पैर रखना।

‘‘दो नावों पर पैर रखना’’ यह मुहावरा आज के जीवन के लिये बहुत ही सटीक है। आज प्रतियोगिता का युग है, अर्थ का युग है, आपा-धापी का युग है, अतः कुछ पाने के लिये अत्यधिक प्रयास की आवश्यकता होती है। तब सफलता पाने के लिये कई बार मानव दो नावों पर पैर रखने के लिये विवश होता है। इसी कारण से यह मुहावरा आज के युग में अधिक सार्थक कथन के रूप में देखा जा सकता है।

चाहे यह कथन एक युग-सत्य हो, किन्तु इस कथन को समझना और इसके गुण-दोष की विवेचना अवश्य होनी चाहिए, ताकि एक आम मानव इसे अपने लाभ के लिये प्रयोग कर सके। यह कथन बहुत पुराना है और इसका अर्थ यही लगाया जाता है कि यदि कोई मानव दो नावों पर पैर रखता है, तो उसका गिरना अवश्यंभावी है। अर्थात् यदि हम दो कार्यों को एक साथ करने का प्रयास करते हैं, तो हमें किसी एक में भी सफलता नहीं मिलती है। तात्पर्य यह कि माया मिली न राम। 


अकसर देखा जाता है कि हम सफलता प्राप्त करने की होड़ में अनेक कार्यों को एक साथ अंजाम देने का प्रयास करते हैं। हमारा लक्ष्य होता है कि एक नहीं तो दूसरे में सफलता मिलेगी, या तीसरे में या चौथे में। तब असल में होता क्या है कि हमारी दृष्टि भटक जाती है और हम एक लक्ष्य न बना कर अनेक लक्ष्य बना बैठते हैं। एक लक्ष्य को आसानी से भेदा जा सकता है यदि हमारा निश्चय दृढ़ हो, किन्तु अनेक लक्ष्यों को भेदना कठिन ही नहीं, अपितु दुष्कर भी होता है। तब अनेक तो छूटा होता ही है, वह एक भी छूट जाता है। 


एक प्रसिद्ध श्लोक है -


यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निशेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेवहि।।


अर्थात् जो निश्चत को छोड़कर अनिश्चित की ओर बढ़ता है, उसको अनिश्चित तो नहीं मिल पाता और निश्चित भी छूट जाता है।


अतः दो नावों पर पैर रखना कभी भी और किसी भी युग में उचित नहीं कहा जायेगा। हमें चाहिए कि आज के इस युग में एक लक्ष्य निर्धारित करें, अर्जुन की तरह और हमेशा हमें चिड़िया की आँख ही दिखाई देनी चाहिए। यही सफलता का मूलमंत्र है।


वैसे भी आज का युग विशेषज्ञता का है। ‘‘जैक ऑफ ऑल एण्ड मास्टर ऑफ नन’’ आज के युग में बेमानी है, तब दो नावों पर पैर रखना एक कठिन विकल्प ही माना जायेगा। आज आपको किसी एक स्किल में विशेषज्ञ होना होगा, तब दो नावों पर पैर रखने की बात होनी ही नहीं चाहिए। 


विश्वजीत ‘सपन’

गुरुवार, 1 जून 2017

ईर्ष्या

ईर्ष्या मनुष्य का सबसे बड़ा अधर्मी शत्रु होता है। भारतीय शास्त्रों ने इससे परहेज रखने की सलाह दी है, जो सर्वाधिक उचित मार्ग प्रतीत होता है। यह एक मानसिक रोग है, जो न केवल दूसरों के लिये वरन् स्वयं के लिये भी घातक होता है। 

यह एक प्रकार का भाव है, जो तब उपजता है, जब आप देखते हैं कि आप वह कार्य स्वयं न कर पायें और कोई दूसरा उसे सम्पन्न कर दे। यदि आपमें कोई अपूर्णता है अथवा आपको प्रतीत हो कि उसे वह अधिक मिला जबकि आपको मिलना चाहिये था, तब भी यह भाव उपज जाता है। एक बात अवश्य है कि ईर्ष्या में प्रमुख रूप से अपूर्णता का भाव रहता है। वह किसी भी प्रकार की अपूर्णता हो सकती है - मानसिक, शारीरिक अथवा भौतिक। 


यह इतना घातक रोग है कि मनुष्य को बीमार बना देता है और जब वह चिकित्सक के पास जाकर दवा लेता है, तो भी कुछ असर नहीं होता, क्योंकि ईर्ष्या की कोई दवा है ही नहीं। यह तो मन में उठ रहे भाव होते हैं, जिन पर केवल वह मनुष्य ही नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। 


ईर्ष्या का भाव किसी के भी मन में उठ सकता है। तब चाहे वह कितना ही सम्पन्न क्यों न हो, कितने ही गुणों का मालिक क्यों न हो, चाहे वह कितना भी सुखी क्यों न हो, चाहे वह कितना भी कामयाब क्यों न हो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसकी परिभाषा बड़े ही सरल शब्दों में दी है कि जैसे दूसरे के दुःख को देखकर दुःख होता है, वैसे ही दूसरे के सुख को देखकर भी दुःख होता है, जिसे ईर्ष्या कहते हैं। एक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जब दो बालक खेल रहे होते हैं और दोनों ही एक खिलौने से खेलने का हठ करते हैं, तब एक बालक उस खिलौने को तोड़ देता है। संभव है कि उसके मन में ऐसा भाव रहा हो कि यदि वह न खेल सका तो दूसरा भी न खेल सके। यही भाव ईर्ष्या की प्रथम स्थिति कही जा सकती है।


ईर्ष्या कई प्रकार के भावों का मिश्रण है। यह अजीब पहेली भी है। जैसे यह समाज और आस-पास ही अधिक व्याप्त होता है। मान लीजिये कि एक लेखक है, जो फेसबुक पर लिखता है। यदि उसे पता चले कि ब्रिटेन में किसी लेखक को बहुत बड़ा पुरस्कार मिला है, तो उसे ईर्ष्या नहीं होती। जब उसे पता चलता है कि भारत में किसी को पुरस्कार मिला तो उसे थोड़ी जलन होती है, लेकिन यदि उसे पता चले कि फेसबुक पर किसी अन्य को पुरस्कार मिला तो वह ईर्ष्या से जलने लगता है। यह एक प्रकार का मनोविकार ही है। अन्य की उपलब्धि से भी यह उत्पन्न होती है।


ईर्ष्या का मुख्य कार्य जलाना होता है, किन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह उसी को जलाती है, जिनके मन में ये भाव उठते हैं अथवा रहते हैं। यह एक ऐसा प्रभाव छोड़ती कि मनुष्य की बुद्धि मंद हो जाती है और वह मात्र एक दिशा में अपनी सोच को एकाग्रचित्त कर लेता है और इसी कारण वह दूसरे के गुणों को देख ही नहीं पाता है, बल्कि खोज-खोज कर दूसरों के अवगुणों को निकालने के प्रयास में व्यर्थ श्रम करता हुआ दुःखी बना रहता है। मनुष्य को ईर्ष्या से अवश्य बचना चाहिये। इसका एकमात्र उपाय है, सभी से प्रेमभाव रखना और सभी के गुणों को देखना। स्वयं पर नियंत्रण रखना कि जो उसके पास नहीं है अथवा जो उसे नहीं मिला वह उसके लिये था ही नहीं, क्योंकि स्रष्टा ने उसे उतने का ही हिस्सेदार माना था। 


विश्वजीत 'सपन'

मंगलवार, 28 मार्च 2017

हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व


    ‘त्योहार’ का शाब्दिक अर्थ है, वह दिन जब कोई धार्मिक अथवा जातीय उत्सव मनाया जाये। इसके लिये ‘पर्व’ शब्द का भी प्रयोग होता है। पर्व शब्द का सम्बन्ध शुभ मुहुर्तों, लग्नों अथवा क्षणों के योग से है। एकादशी, चतुर्दशी, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि पर्व कहे गये हैं। ऐसे अवसरों पर नदी स्नान, उपवास, पूजा आदि किये जाते हैं। उत्सव शब्द का अर्थ है ‘‘आनंद का अतिरेक’’। इस समय सामूहिक आनंद का अतिरेक देखा जाता है। अब तीज शब्द भी त्योहार का द्योतक बन गया है।
 
आदिकाल से ही भारतवर्ष में त्योहारों का महत्त्व रहा है। नाना प्रकार के त्योहारों से समाज की धार्मिक मान्यताओं का भी पता चलता है। ये त्योहार यूँ ही नहीं मनाये जाते, बल्कि इनके पीछे भी पौराणिक कथाओं की महत्ता रही है। एक समय था, जब ये जीवन का एक हिस्सा होते थे और मनोरंजन के साधन भी, किन्तु आज स्थिति भिन्न प्रतीत होती है, क्योंकि ढकोसलों, बाह्याडम्बरों ने इन्हें प्रभावित किया है। मानव-जाति की मानसिकता में भी परिवर्तन आये हैं और आस्था भी अर्थ-प्रधान होती दिखाई देती है। इसके बाद भी आज भी त्योहारों के हमारे जीवन में महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।


भारतवर्ष को त्योहारों का देश कहा जाता है। इसके पीछे दार्शनिक कारण छुपा हुआ है। असल में मानव दुःख अधिक पालता है और सुख के क्षणों को शीघ्र ही भूल जाता है। जब त्योहार आते हैं, तो मानव के जीवन में सुख के क्षण आते हैं। वह इस समय सारे दुःखों को भुलाकर आनंद की ओर उन्मुख होता है, जिस कारण उसके जीवन में सुख और प्रसन्नता का वातावरण आता है। अतः इस वातावरण को उनके जीवन में बारम्बार लाने के लिये ही अनेक त्योहारों की अवधारणा विकसित की गयी है। सभी त्योहार मानव-जीवन से सम्बधित हैं और हमारे जीवन में इनका सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व रहा है।


इन त्योहारों को हम निम्न वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।


1) धार्मिक त्योहार - शिवरात्रि, जन्माष्टमी, दीपावली, दशहरा, ईद, बकरीद आदि


2) सांस्कृतिक त्योहार - बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, होली, भाईदूज आदि


3) राष्ट्रीय त्योहार - स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती, एकता दिवस आदि


4) यादगार त्योहार - गाँधी पुण्यतिथि, राणा प्रताप जयन्ती, नेहरू जयन्ती, वाल्मीकि जयन्ती आदि।


जहाँ एक ओर विजयादशमी का दिन आपने काम-क्रोध आदि आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाने का दिन माना जाता है, वहीं दीवाली खुशियों का त्योहार है। भारतीय जीवन में नये संवत्सर का प्रारंभ चैत्र महीने से होता है और इसी दिन होली का त्योहार मनाया जाता है। सामाजिक दृष्टि से होली का अर्थ बीत गई बात से है और इसलिए इस आनंद का अनुभव किया जाता है, नयी शुरुआत के साथ। जन्माष्टमी और रामनवमी जैसे त्योहार श्रीकृष्ण और श्रीराम से जुड़े हैं। वहीं बसंत पंचमी में प्रकृति ऋतु को पावन कर सँवारती है। अनेक प्रकार के ये त्योहार हमारे जीवन में अलग-अलग महत्त्व रखते हैं। 


ये सभी त्योहार हमारे जीवन का अंग हैं। ये न केवल हमें प्रेरित करते हैं, बल्कि हमें हमारे कर्तव्यों की याद भी दिलाते हैं। हमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देते हैं। साथ ही हमें सुख प्रदान करते हैं। असल में ये हमारी परम्परायें हैं, जो हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को एक दिशा प्रदान करते हैं। इनका एक बहुत बड़ा संदेश भाईचारा ही है। इनका संदेश ख़ुश होने से है, ख़ुशियाँ बाँटने से है, मिलकर ख़ुशी मनाने से है।


विश्वजीत ‘सपन’

गुरुवार, 2 मार्च 2017

कविता क्या है?

कविता क्या है? यह प्रश्न आज के इस युग में बहुत प्रासंगिक हो गया है। सोशल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता के इस युग में आज कवियों की भीड़ यकायक ही बढ़ गयी है। ऐसे में यह आवश्यक है कविता की मौलिकता बनी रहे। वह काव्य ही हो, कुछ अन्य नहीं। बहुत समय पहले सन् 1909 में प्रेमचन्द युगीन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने सरस्वती पत्रिका में एक निबंध लिखा था और वह आज तक का सर्वाधिक उपयुक्त निबंध माना जाता है। यह प्रयास कुछ वैसा ही है, किन्तु यह मात्र निबंध नहीं, बल्कि कविता की समस्त रूप-रेखा को जानने एवं समझने का प्रयास है ताकि कविवर्ग सहित पाठक भी एक समुचित विचार-बुद्धि से कविता अथवा काव्य का समुचित आकलन कर सके। 

सच तो यह है कि यह प्रश्न जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। काव्यशास्त्र का अनुसरण करना भी आसान नहीं है क्योंकि वह एक बहुत ही वृहद् विषय की ओर जाना होगा। आज जब काव्य के क्षेत्र में अनेकानेक प्रयोग किये जा रहे हैं, तो कविता को भली-भाँति जानना आवश्यक हो जाता है। इस विषय पर एक समग्र दृष्टि डालने एवं पाठकों को समझ आये, ऐसी युक्ति से सरल शब्दों में कविता के आवश्यक अंगों आदि का वर्णन किया जा रहा है, ताकि एक आम सहृदय पाठक से लेकर काव्य सृजन में तल्लीन कविगण भी लाभान्वित हो सकें। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ क्या यह है कि हम कुछ भी कह लें और उसे कविता का नाम दे दें? अतः सर्वप्रथम हम कविता की कुछ जग प्रसिद्ध परिभाषाओं पर एक दृष्टि डालते हैं और समझने का प्रयत्न करते हैं कि कविता अथवा काव्य है क्या?


संस्कृत विद्वान भरत मुनि के अनुसार सुन्दर कोमल पद, गूढ़ शब्दों से रहित सरल एवं युक्तियुक्त रस ही काव्य है। 


आचार्य दण्डी ने कहा कि चमत्कारपूर्ण अर्थ से युक्त सरस एवं मनोहर पदावली ही काव्य है। 


आचार्य भामह कहते हैं - "शब्दार्थौ सहितो काव्यम्" अर्थात् शब्द एवं उसके उचित अर्थ का मेल ही कविता है। 


आचार्य विश्वनाथ ने काव्य की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी - "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" अर्थात् रसात्मक वाक्य काव्य है। 


पंडित जगन्नाथ ने कहा - "रमणीयार्थप्रतिपादकः काव्यम्" अर्थात् सुन्दर अर्थ को प्रकट करने वाला शब्द ही काव्य है।


इसी प्रकार मम्मट, रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन, पंडित अम्बिकादत्त व्यास आदि ने भी अपनी-अपनी परिभाषायें दी हैं।


    इनके अलावा हिन्दी साहित्यकारों ने भी कविता की परिभाषायें दी हैं। 


आचार्य देव ने कहा कि ऐसे सार्थक शब्द जिनमें छंद, भाव, रस एवं अलंकार हो उसे कविता कहते हैं। 


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में जीवन की अनुभूति ही कविता है।
जयशंकर प्रसाद ने सत्य की अनुभूति को कविता माना है।


महादेवी वर्मा कहती हैं - कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण ही कविता है। 


सुमित्रा नंदन पंत ने कविता को परिपूर्ण क्षणों की वाणी माना है।


    इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वानों ने भी इसकी परिभाषायें दी हैं। इनमें से कुछ हैं - 




Aristotle - Poem is an imitation of nature by means of words.

Thomas Hardy – Poetry is emotion put into measure. 

William Wordsworth - Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings. It takes its origin from emotions recollected in tranquillity.

Shelly - Poetry is the record of the best and happiest moments of the happiest and best minds. 

Mathew Arnold - Poetry is, at bottom, a criticism of life.

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि कविता की कोई एक परिभाषा नहीं है। इसके बाद भी कुछ समानतायें देखी जा सकती हैं। जैसे शब्द, अर्थ, भाव, अलंकार, रस, आलोचना आदि। मित्रों, ये कुछ ही परिभाषायें हैं और अनेक और भी साहित्य जगत में विद्यमान हैं। अतः आगे हम समझने का प्रयास करेंगे कि कविता क्या है? किसे कविता कहा जाना चाहिये और क्यों?

इन सभी परिभाषाओं एवं ऐसी अनेक अन्य परिभाषाओं के देखने पर एक अनुभूति यह होती है कि कविता की परिभाषा उसके गुणों के आधार पर की गयी हैं और इसलिये कोई एक सर्वमान्य परिभाषा संभव नहीं हो सकी है। मेरे विचार से कविता की परिभाषा है - "रस एवं अलंकार से युक्त सुन्दर शब्दार्थ सहित उचित एवं सहज प्राकृतिक एवं अन्य अनुभूत भावाभिव्यक्ति ही कविता है।"

किन्तु क्या मात्र अनुभूतियों की भावाभिव्यक्ति को कविता कहा जाना उचित होगा? एक बड़ा प्रश्न है। आइये इस पर विचार करते हैं, क्योंकि तभी हम कविता के वास्तविक स्वरूप को जान पायेंगे।

कविता के दो पक्ष निर्धारित किये गये हैं - भाव पक्ष एवं कला पक्ष। आंतरिक पक्ष ही भाव पक्ष है, जबकि बाह्य पक्ष को कला पक्ष कहा जाता है।

कला पक्ष 

पहले कला पक्ष पर विचार करते हैं। कला पक्ष इसलिये महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह बाह्य सौन्दर्य को निखारता है और इसी कारण से पाठक सहज ही आकर्षित होते हैं। छंद, तुक, अलंकार, रस, शब्द शक्ति, भाषा आदि सभी कला पक्ष का द्योतन करते हैं। लय, यति-गति सभी कविता को अलौकिक सौन्दर्य प्रदान करते हैं। इसी कारण से वह पाठक के हृदय को झंकृत करने का सामर्थ्य रखती है। अतः कला पक्ष के बिना कविता का सौन्दर्य स्थापित नहीं किया जा सकता है। हम भले ही उसे कविता कह लें, किन्तु साहित्य समाज एवं पाठक उसे नकार ही देगा और ऐसा ही अभी तब होता आया है।

इसी क्रम में कविता में गुण एवं शब्द शक्तियों का विचार आता है। गुण तीन प्रकार के बताये गये हैं - माधुर्य, प्रसाद एवं ओज। 

माधुर्य गुण - माधुर्य गुण वह है, जिसे पढ़कर कोई भी पाठक आनंदातिरेक में डूब जाये, उसका हृदय द्रवित हो जाये। शृंगार एवं करुण रस की रचनाओं में माधुर्य गुण दिखाई देता है। इस उदाहरण को देखें।

सुनि सुंदर बनै सुधारस साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन दे सैन तिन्हें समुझाय कछू मुसकाय चली।। - गोस्वामी तुलसीदास

प्रसाद गुण - प्रसाद गुण का अर्थ है कि रचना सरलता से पाठक के हृदय को प्रभावित करे और उसे बड़ी सरलता से समझ आये। एक उदाहरण देखें, कोई लाग-लपेट नहीं, सहज, सरल एवं सुन्दर अभिव्यक्ति।

माँ! ओ कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आयी थी,
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में, मुझे खिलाने आयी थी।
मैंने पूछा- क्या लायी? बोल उठी माँ काओ,
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा तुमी खाओ। - सुभद्रा कुमारी चौहान

ओज गुण - वीर रस की अभिव्यक्ति में ओज गुण समाहित होता है। वीर रस एवं रौद्र रस में तो इसकी अनुभूति होती ही है, वीभत्स एवं भयानक रस में भी यह गुण उत्कर्ष को प्राप्त करता है। एक उदाहरण को देखते हैं। 

वीरों की गाथाओं से ही, हिलने धरा लगी है आज।
कभी न रुक पायेगी देखो, ऐसी पवन चली है आज।।
आज समंदर भी हारेगा, उफन-उफन कर होगा झाग।
हर सीने में धधक रही है, देखो ये कैसी है आग।। - विश्वजीत ‘सपन’

इसी क्रम में शब्द शक्ति का विचार बहुत आवश्यक हो जाता है। इसके बारे में जानना बहुत आवश्यक है क्योंकि मेरा ऐसा अनुभव है कि लोग बिना इनके अर्थ जाने ही इस संबंध में कह जाते हैं। यह एक वृहद् विषय है, किन्तु इस पर संक्षिप्त विचार रखना चाहता हूँ।

शब्द शक्ति - शब्द के अर्थबोधक व्यापार के मूल कारण को शब्द शक्ति कहते हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं - अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना।

अभिधा - शब्द की जिस शक्ति के कारण किसी शब्द के मूल अर्थ को समझा जाता है, उसे अभिधा शब्द शक्ति कहते हैं। 

लक्षणा - मुख्यार्थ की बाधा होने पर, रूढ़ि अथवा प्रयोजन के कारण जिस शक्ति के द्वारा मुख्यार्थ से सम्बद्ध अन्य अर्थ प्रकट होता है, उसे लक्षणा शब्द शक्ति कहते हैं। इसके कई प्रकार होते हैं - प्रयोजनवती लक्षणा, गौणी लक्षणा, शुद्धा लक्षणा और रूढ़ा लक्षणा।

व्यंजना - कभी-कभी अभिधा और लक्षणा से वाक्य का अभिप्रेत अर्थ नहीं मिल पाता है। ऐसी दशा में जिस शब्द शक्ति से अभिप्रेत अर्थ तक पहुँचा जा सकता है, उसे व्यंजना कहते हैं। इससे प्राप्त अर्थ को व्यंग्यार्थ कहते हैं। इसके भी कई भेद हैं, जैसे शाब्दी व्यंजना, आर्थी व्यंजना, वस्तु व्यंजना, अलंकार व्यंजना, भाव व्यंजना।

इसी क्रम में रसों के बारे में बताना भी आवश्यक हो जाता है। यही भाव पक्ष है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नौ भाव ही नौ रस हैं। असल में रस काव्य का प्राण कहा जाता है। इसीलिये ‘वाक्यं रसात्मकमं काव्यम्’ इसकी एक परिभाषा बनी है। जिस चमत्कारपूर्ण असाधारण आनंद की प्राप्ति किसी पाठक को होती है, वही रस है। रस अखण्ड है, स्वप्रकाश है, चिन्मय है, ब्रह्मानंद है। यह अलौकिक आनंद प्रदायक है। भरतमुनि ने कहा है कि विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है। काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में कहा गया है कि सहृदयों के हृदय का स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है, तो रस की निष्पत्ति होती है। 

शिल्प पक्ष या कला पक्ष के बाद कविता के आन्तरिक स्वरूप को देखना आवश्यक है और यही भाव पक्ष भी है। कवि अपनी दृष्टि के जगत के सुख-दुख, क्रोध-घृणा, आचार-व्यवहार आदि को देखता है, यही भाव पक्ष है। 

इसके अलावा उद्देश्य भी रचनाधर्मिता का एक आवश्यक अंग है। यह बात सही है कि हमेशा लोक-कल्याणकारी उद्देश्य नहीं हो सकता, किन्तु कुछ उद्देश्य तो होगा ही, चाहे वह क्षीण रूप में ही क्यों न हो। उद्देश्यविहीन जीवन किस काम का?

तो रचना करते समय भाव पक्ष में विषय चयन, गाम्भीर्य, नवीनता, मौलिकता, वैचारिक सोच, दिशा-बोध आदि का ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है। ठीक उसी प्रकार कला पक्ष में शिल्प, अलंकार, भाषा, शैली, शुद्धता, विराम चिह्न आदि की साज-सज्जा भी आवश्यक हो जाती है।

यही कविता के मूल में होना अपेक्षित है। लेखन के पूर्व इन तथ्यों को जानना, समझना एवं तदनुसार लेखन को उचित मार्ग पर ले चलने की आवश्यकता आज से पूर्व इतनी नहीं थी, क्योंकि आज का शौक़िया लेखन पथभ्रष्ट है। 

एक विवाद हमेशा से ही होता रहा है जिसके कारण स्वच्छंद छंद, मुक्तछंद या अछंद कविताओं का जन्म हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि शिल्प में भावों को अच्छी तरह से पिरोना कठिन है, शिल्प के कारण भाव मृत हो जाते हैं। यह कथन असत्य है, क्योंकि सदियों से कवियों ने सुन्दर-सुन्दर भावों को शिल्प के अनुसार प्रकट किये। समस्त संस्कृत भाषा में छंदोबद्ध रनचायें हुईं। हिन्दी में छंदोबद्ध रचनायें ही अधिक हुईं और प्रचलित भी हुईं। फिर अछंद की बात, यह भाव न हो पाने की बात बेमानी ही है। असल में बाधक शिल्प नहीं है, अपितु भाव, भाषा, शब्द शक्ति, सम्प्रेषण आदि की कमी को भाव प्रकट नहीं कर पाने का बहाना बनाया जाता रहा है। यदि हमें भाषा आदि का समुचित ज्ञान नहीं, तो शिल्प को दोष देना उस मुहावरे के समान है कि नाच न जाने आँगन टेढ़ा।

विश्वजीत ‘सपन’