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बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

चक्रवाती तूफ़ान ‘हुदहुद’

चक्रवाती तूफ़ान ‘हुदहुद’ के नामकरण से जुड़े तथ्य



12 अक्टूबर 2014 को ‘हुदहुद’ नामक चक्रवाती तूफ़ान ने आन्ध्र प्रदेश राज्य के एक शहर विशाखपट्टनम् में बहुत तबाही मचायी और यह तूफ़ान आगे बढ़कर उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक जा पहुँचा। इस तूफ़ान और इससे पहले आये तूफ़ानों के न-नोक, मदी, लहर, हेलेन आदि नामकरण क्यों हुए? कहने का तात्पर्य यह कि ये नाम इन चक्रवाती तूफ़ानों के क्यों और कैसे पड़े? यदि हम इस विषय पर विचार करें तो बहुत ही मनोरंजक एवं सुन्दर जानकारी हमें प्राप्त होती है। 

पहली हरिकेन चेतावनी की व्यवस्था का प्रारंभ सन् 1870 में क्यूबा में किया गया था। 1947 तक इन सभी प्रकार के तूफ़ानों के नाम संख्या आदि संकेत के द्वारा किये गये। 1950 में मियामी हरिकेन केन्द्र ने तब तक आये सभी प्रकार के तूफ़ानों की सूची आदि बनानी प्रारंभ की और इनकी व्यवस्था का कमान संभाल लिया। इसी क्रम में 1953 में इन तूफ़ानों के नाम मानवीय नामों के आधार पर किये जाने का निर्णय लिया गया। उसके पूर्व इनके नाम अधिकतर तकनीकी अथवा संख्या वाले होते थे, जिन्हें कुछ तकनीकी विशेषज्ञ ही समझ पाते थे। अतः निर्णय लिया गया कि इनके नाम ऐसे हों, जो लोगों को आसनी से समझ आयें। यह भी आवश्यक समझा गया कि इन तूफ़ानों के बारे में पूर्व-चेतावनी देने के लिये उसके नाम होने आवश्यक हैं। इसे वर्षों के नाम से भी जाना जाता था - जैसे तूफ़ान 1950 ए, 1950 बी आदि। यह भी सुविधाजनक नहीं था। 1953 में अमेरिका के ‘राष्ट्रीय हरिकेन केन्द्र’ ने अलांटिक में आने वाले तूफ़ानों के नामों की एक सूची बना ली और उस सूची के अनुसार ही वे उनके नाम देने लग गये, जैसे हरिकेन बार्बरा, हरिकेन फ्लोरेंस, कैरोल आदि। यह भी मनोरंजक है कि 1953 से 1978 तक इन तूफ़ानों के नाम स्त्रीलिंग रखे गये और 1979 के बाद से अब पुल्लिंग नाम रखे जाने लगे। यह भी ग़ौरतलब है कि स्त्रीलिंग नाम वाले तूफ़ान अधिक घातक साबित हुए। संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक संस्था विश्व मौसम संघ (डब्ल्यू.एम.ओ), जिसका मुख्यालय जेनेवा में था, ने 1977 में हरिकेन के नामों को रखने की सूची का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।  


इधर उत्तरी हिन्द महासागर के चक्रवातों के नाम नहीं होते थे और इससे बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ऐसा माना जाता है कि जातीय एवं सामाजिक विभिन्नताओं के कारण वे किसी नाम को नहीं रखना चाहते थे, ताकि किसी प्रकार का विवाद न हो। संभव था कि उनके नाम देने से किसी जाति अथवा सम्प्रदाय-विशेष को ठेस पहुँच सकती थी। यह स्थिति वर्ष 2004 तक ऐसे ही चलती रही। 2004 में हिन्द महासागर के आस-पास के आठ देशों अर्थात् बंगलादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका एवं थाइलैण्ड ने एक साथ मिलकर इनके नामकरण करने का निर्णय लिया और इनके नामों की सूची बनायी। सभी देशों ने आठ-आठ नाम सुझाये और 64 नामों की सूची तैयार कर ली गयी। तब से देशों के वर्णक्रम के अनुसार आने वाले तूफ़ानों के लिये उनके सुझाये नामों से एक नाम दिया जाने लगा है। यह कार्य भारतीय मौसम विभाग करता है। भारतीस मौसम विभाग ही हिन्द महासागर के इन देशों के लिए समुद्री चक्रवाती तूफ़ानों के संदर्भ में चेतावनी देती है और इसी सूची से नामकरण करती है। उदाहरण के तौर पर इससे पहले जो नाम आये हैं, वे थे हेलेन (बंगलादेश), लहर (भारत), मदी (मालदीव) न-नौक (म्यांतार) और आने वाले भविष्य के तूफ़ानों केनाम होंगे - नीलोफर (पाकिस्तान), अशोबा (श्रीलंका), कोमेन (थाइलैण्ड) आदि। इस सूची के अनुसार इस बार ओमान द्वारा दिये गये नाम की बारी थी, जिसने इसका नाम हुदहुद दिया था। यह अरबी भाषा का शब्द है और हूपु नाम की चिड़िया को कहा जाता है। यह एक छोटी चिड़िया है, जो भारतीय कठफोड़वा से मिलती-जुलती है।


इन सभी आठ देशों द्वारा दिये गये नामों की सूची इस प्रकार हैं -
बंगलादेश - ओनिल, ओग्नि, निशा, गिरि, हेलेन, छोपोला, आक्खी, फोनी
भारत - अग्नि, आकाश, बिजली, जल, लहर, मेघ, सागर, वायु
मलदीव - हिबरू, गोनू, एैला, कैला, मदी, रुआनु, मेकुनु, हिका
म्यांमार - प्यार, ये-मयिन, फ्यान, थाने, न-नौक, क्यांत, दये, क्यार
ओमान - बाज़, सिद्र, वर्द, मरजान, हुदहुद, न’नदा, ल’लुबन, म’मह
पाकिस्तान - फनूस, नरगिस, लैला, निलम, निलोफर, वर्दा, तितली, बुलबुल
श्रीलंका - माला, रश्मि, बंदु, वियारु, अशोबा, मारुथा, गज, पवन
थाइलैण्ड - मुकदर, कैमुक, पेट, फेलिन, कोमेन, मोरा, पे-ति, अमपन


विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

Pustak Sameeksha



(मित्रों, निकट भविष्य में आने वाले मेरे कहानी-संग्रह पर प्रिय श्री आनंदवर्धन ओझा जी की भूमिका - उनका हृदय के गहन तल से आभार)
श्रीविश्वजीत सपन की पंद्रह कहानियों का अनूठा संग्रह है--'आदि-अनंत'। लेखक की ये कहानियाँ किसी स्वप्न-जगत से नहीं उपजतीं,बल्कि जीवन और जगत के खट्टे-मीठे अनुभवों से आकार पाती हैं। प्रवाहमयी भाषा में लिखी हुई इन कहानियों में आज के युग का सत्य मुखरित हुआ है--जिसका केंद्रीय पात्र मूलतः मनुष्य है। मनुष्य के मनःलोक की जटिलताएं, कुंठाएँ, व्यग्रता, विवशता, संत्रास और समस्याएँ इन कहानियों में मूर्त्त हुई हैं।
कथा-लेखक अपनी कथा-रचना के लिए भूमि तलाशता अथवा उस भूमि को उर्वर बनाने की सायास चेष्टा करता नहीं दीखता, वह सामान्य जीवन के किसी एक पक्ष को कथा का सूत्र बनाता है और कथा-क्रम को अपनी लेखनी की सहज धारा में बहा ले चलता है। लेखक की कहानियाँ सीधी राह चलती हैं, उसमें अवांतर कथायें सम्मिलित नहीं होतीं। लेखक के मूल कथन में कोई भटकाव या बिखराव नहीं होता। वह कथा के समानांतर नहीं चलता, बल्कि कथा के साथ-साथ चलता है और पाठकों को भी उसी कथा-सूत्र में बाँधे रखता है।
संग्रह की अलग-अलग कहानियों में नए-नए चित्र उभरते हैं, जीवनानुभूतियों के अनेक वातायन खुलते हैं, पात्रों के साथ परिवेश बदलते हैं और एक नयी कथा, नया परिधान पहनकर पाठकों के सम्मुख आती है।
संग्रह की पहली कहानी 'कालचक्र' पीढ़ियों के टकराव और उनके चिंतन-वैषम्य को प्रकट करती है। यह कहानी बुढ़ापे की लाठी के टूटने की पीड़ा को अभियक्त करती है और हार-थककर वृद्धाश्रम की राह जानेवाले जीवन की कारुणिक व्याख्या करती है--"वाणी की चोट ह्रदय में बड़ी गहराई तक धँस जाती है। शब्दों के कलेवर उसे असह्य बना देते हैं। इस 'अहंकार' शब्द के धारदार नश्तर ने हरिचरण बाबू के दिल में अनगिनत छेद बना दिए। कोई और कहता तो शायद इतनी नहीं चुभती। अपना बेटा, अपना खून कह रहा था।..." संग्रह की तमाम कहानियों में ऐसे उद्धरणों की कमी नहीं है, जो ह्रदय-विदारक, मारक तो हैं ही, प्रेरक भी हैं।
'खंड-खंड जीवन' नामक कहानी समानांतर नारी चरित्रों को सामने लाती है और प्रताड़ना की चरम दशा में वेदना साकार हो उठती है। 'अपना पता' एक मार्मिक कहानी है, जो नई बुनावट में रची गई है। यह बेघरों की बेबसी और रंगीन सपनों की अनूठी दास्तान है, जिसमें सपने कांच के गिलास के तरह क्षण-भर में चकनाचूर हो जाते हैं और संघर्षों का तपता रेगिस्तान फिर सामने आ खड़ा होता है। 'नयी शुरूआत' पारस्परिक संबंधों में सामंजस्य स्थापित करती हुई, समस्याओं का सहज और ठोस समाधान ढूँढती जीवन-कथा है, जिसमें पारिवारिक छोटे-छोटे विवाद कैसे विघटन की सुरसा को सम्मुख ला खड़ा करते हैं और स्नेह का हल्का-सा स्पर्श कैसे जीवन-सरोवर में नए रंग भर देता है--यही दिखाया गया है। यह सुख-शान्ति का मार्ग तलाशती एक प्रेरक कथा है। कच्ची उम्र की प्रेम-कुंठा और विश्वासघात की वेधशाला में पकते मैत्री-संबंधों की करुण कथा पाठकों के सामने रखती है कहानी--'शेफाली वेड्स...'! इस कहानी में तीन पात्रों के माध्यम से लेखक ने युवाओं के बीच बदलते समीकरणों और तुर्श होते संबंधों का रोचक वर्णन किया है।
'प्रेम का बंधन' नामक कहानी में कथाकार ने बड़ी कुशलता से असफल प्रेम की मनोवेदना  को लोक-कल्याण की मंगल-कामना का स्वरूप दिया है, जागतिक प्रेम को स्वार्थ से ऊपर उठाकर उसे ईश्वर-प्रेम के तल पर प्रतिष्ठित कर दिया है। 'कलाकार' नामक कहानी सपनों की मौत का बड़ा भयावह और मर्मान्तक चित्र प्रस्तुत करती है, जिसमें प्रतिभा कैसे कुंठित होकर महानगरों में पिस जाती है और उत्साह-उमंगों से भरे हसीन सपने कैसे दम तोड़ देते हैं--इसे लेखक ने बड़ी कुशलता से उकेरा है...!
संग्रह 'आदि-अनंत' की अन्य सभी कहानियों में ऐसे ही  वास्तविक से लगानेवाले पात्र परिदृश्यों, घटनाओं और स्थितियों की संरचना करते हैं तथा लेखक के अभीष्ट को साकार करने में सफल होते हैं।
नए प्रतीक और नव्य विधान से रची गई 'नयी कहानियों' की पारिभाषिक सीमा-रेखा में श्रीसपन की कहानियाँ बंधी हुई नहीं हैं, न लेखक इस व्यामोह में पड़ा दीखता है। ये कहानियाँ कथानक को नयापन देने, प्रतीकों-बिम्बों से सजाने और नव्य प्रयोगों की हठधर्मिता से सर्वथा मुक्त हैं। कथा के माध्यम से, जो मूल कथ्य है, उसे यथारूप सम्प्रेषित कर और भावोद्वेलन की पराकाष्ठा पर पाठकों को पहुँचाकर लेखक कथा का समापन करता है। कथा-लेखन की यही विशेषता इन कहानियों को विशिष्ट बनाती है।

--आनंदवर्धन ओझा.