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सोमवार, 3 जून 2013

मृत्यु के बाद का सच और भ्रम (आलेख)

मृत्यु अटल है। गीता में कहा गया है कि जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु अनिवार्य है और जिसकी मृत्यु होती है उसका जन्म लेना अनिवार्य है। इसी कारण से मृत्यु एवं उसके बाद के बारे में हमारी उत्सुकता हमेशा से बनी रही है। मृत्यु के बाद क्या होता है? हम कहाँ जाते हैं? कहीं जाते भी हैं या नहीं? क्या मृत्यु के बाद कोई अन्य जीवन है? यदि हाँ तो वह क्या है और यदि नहीं तो फिर मृत्यु के उपरान्त आत्मा का क्या होता है? ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए मनीषियों ने सदियों से प्रयास किए हैं और आज भी प्रयास किए जा रहे हैं। किन्तु सबसे पहले हमें यह जानने की आवश्यकता है कि मृत्यु क्या है।

मृत्यु को परिभाषित करना एक चुनौती रही है और आज के इस वैज्ञानिक युग में इसकी परिभाषा और भी जटिल हो गई है। वस्तुतः एक सामान्य प्रकार से देखें तो जब जीवन का अंत हो जाता है तो उसे मृत्यु कहते हैं। किन्तु मृत्यु कब होती है इसके बारे में जानने के लिए अवधारणात्मक रूप में हमें जीवन एवं मृत्यु के मध्य में एक रेखा खींचने की आवश्यकता है क्योंकि हम जीवन को चेतना से परिभाषित कर सकते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जब कोई जीव चेतना-शून्य हो जाता है तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इसके बावजूद इसे भी पूर्ण निरपवाद परिभाषा नहीं कह सकते क्योंकि कई ऐसे एकल-ऊतकीय प्राणी हैं, जो संभवतः जीवित हैं, किन्तु उनमें चेतना नहीं देखी गई है। फिर चेतना स्वयं ही अनेक प्रकार से परिभाषित की गई है और अनेक समाजशास्त्रियों एवं दार्शनिकों में इसकी परिभाषा को लेकर मतभेद है। स्वास्थ्य विज्ञान में इसकी परिभाषा और भी जटिल हो गई है क्योंकि चेतना, अर्द्ध-चेतना, सुसुप्तावस्था, मस्तिष्क मृत्यु (ब्रेन डेथ) या जीव-वैज्ञानिक मृत्यु आदि अनेक परिभाषाओं ने अपने स्थान बना लिए हैं। कई संस्कृतियों में तो मृत्यु को एक घटना के बजाय एक प्रक्रिया माना गया है जिसका अर्थ होता है एक आध्यात्मिक स्तर से दूसरे आध्यात्मिक स्तर की ओर प्रस्थान करना।


 सन् 1991 में अटलांटा के एक निवासी पैम रेनाल्ड को मृत्यु का आभासित अनुभव प्राप्त हुआ। उन्हें मस्तिष्क की ऐसी बीमारी थी कि चिकित्सकों को शल्य चिकित्सा करने के लिए उनके मस्तिष्क के समस्त रक्त को बाहर निकालना था। इस प्रकार रेनाल्ड को पूरे पैंतालीस मिनटों तक मस्तिष्कीय रूप से मृत रखा गया। जब उन्हें पुनः जीवनदान दिया गया तो उन्होंने मृत्यु की अवस्था के अनुभवों को बताया। उन्होंने यह भी बताया कि उस अवस्था में उन्होंने अपने मृत संबंधियों से बातें कीं। इस प्रकार एक तथ्य जो सामने उभरकर आया कि मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं। समस्त प्रकार के ग्रंथों में इसके वर्णन किए गए हैं, किन्तु उस जीवन में प्रवेश करने वालों ने इसके बारे में बहुत ही कम बताया है। इसके बावजूद इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि ऐसा अनुभव भी बहुत ही कम लोगों को हुआ है या होता है। अनेक शोध करने के बाद भी यह नहीं साबित किया जा सका है कि जो कोई भी इस अवस्था में जाता है उसे मृत्यु के निकट जाने का अनुभव प्राप्त होता है। वास्तव में इनका प्रतिशत बहुत कम रहा है। तो क्या यह केवल एक विशेष प्रकार के लोगों के लिए ही है अथवा इससे भी बड़ा कोई सच है जो हमसे अभी भी परे है?


हमारी पौराणिक व्याख्या कहती है कि जब हम मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो हमारा देह भूलोक पर ही रह जाता है, किन्तु प्राणशक्ति ब्रह्माण्ड में एक ऊर्जा के रूप में चली जाती है और वह अपने कर्मों के अनुसार स्वर्गलोक, भूलोक अथवा नरक में जाती है। इस तरह तीन प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। यदि आप पूर्णतः आध्यात्मिक हैं, आपने स्वयं के अहं का त्याग कर जीवन यापन किया है और आप सांसारिक मोह-माया से दूर रहे हैं तो आपको स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जिसके बाद आपको पुनः जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। किन्तु यदि आपके कर्म ऐसे नहीं होते हैं तो आपको पुनः भूलोक पर जन्म लेकर पुनः अपने कर्मों को सुधारने का अवसर प्रदान किया जाता है। किन्तु जो दुष्कर्मी या पापी होते हैं उन्हें नरक के दण्ड भुगतने पड़ते हैं। हम इस तथ्य से परिचित हैं कि हमारे शरीर में तीन गुणों का समावेश होता है - सत्त्व, रज और तम। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हम इन तीन गुणों में से जिसे अपना कर अपना जीवन यापन करते हैं, उसी के अनुसार मृत्यु के बाद हमारे जीवन की संभावना होती है। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि मृत्यु के समय हमारी मानसिक अवस्था एवं मानसिकता का भी अत्यधिक महत्त्व होता है। जैसे यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय ईश्वर की आराधना करता है, प्रभु को स्मरण करता है तो उसके स्वर्ग लोक में जाने की संभावना बढ़ जाती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि पापी को भी स्वर्ग लोक की प्राप्ति हो जाएगी क्योंकि मृत्यु के समय उसने ईश्वर के नाम का जाप किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि यह अवश्य ही कुछ सहायक होता है, किन्तु कर्म ही निर्णायक होते हैं। लगभग सभी प्रकार के धर्मों में कुछ इसी प्रकार की मिलती-जुलती व्याख्याएँ प्राप्त होती हैं। 


एक कहानी के माध्यम से इस तथ्य को बताया जा सकता है कि मनुष्य की आस्था किस प्रकार मृत्यु के बाद के जीवन को मानता रहा है। एक बार की बात है एक रोगी मरणासन्न अवस्था में अस्पताल लाया गया। चिकित्सकों ने उपचार कर उसे होश में ला दिया। लेकिन वह रोगी अभी भी इस बात से निश्चिंत नहीं हुआ था कि वह जी पाएगा। उसने चिकित्सक से कहा - ‘मैं मरना नहीं चाहता।’ 

चिकित्सक ने उसे ढाढस बँधाया तो उसने पूछा - ‘क्या आप बता सकते हैं कि दूसरी ओर क्या है?’


चिकित्सक ने कहा - ‘मुझे नहीं मालूम।’


तब उस रोगी ने कहा कि तुम आस्तिक हो और इतना भी नहीं जानते कि दूसरी ओर क्या है। क्या तुम जानते हो कि उस दरवाजे के दूसरी ओर क्या है?’ उस चिकित्सक का हाथ दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा हुआ था, जिसे देखकर उस रोगी ने पूछा। तब चिकित्सक ने कहा कि वह नहीं जानता है कि उस दरवाजे के बाहर क्या है। बाहर से खरोचने की आवाजें आ रही थीं और जैसे ही उस चिकित्सक ने दरवाजा खोला तो एक कुत्ता तेजी से अन्दर घुसा और उस रोगी के बिस्तर पर चढ़कर उसे चाटने लगा।


उसके बाद उस रोगी ने चिकित्सक से कहा - ‘क्या तुमने मेरे कुत्ते की एक बात पर ध्यान दिया। उसने कभी भी इस कमरे को नहीं देखा था। वह यह भी नहीं जानता था कि इसमें क्या था। वह केवल इतना ही जानता था कि उसका मालिक यहाँ है। जब दरवाजा खुला तो वह बिना किसी भय के अन्दर उछल कर आ गया। मृत्यु के बाद के बारे में मुझे बहुत ही कम पता है, लेकिन मुझे इतना पता है कि मेरा मालिक वहाँ है और मेरे लिए इतना जानना ही बहुत है।’


इस कथा से इस बात का प्रमाण मिलता है कि इस बात में हमारी आस्था है कि मृत्यु के बाद जीवन होता है, चाहे हमें उसके बारे में कुछ भी पता न हो। और आस्था बड़ी शक्तिशाली होती है।


इसी कड़ी में मान्यताओं को देखें तो पुनर्जन्म की बात को भी कई बार माना गया है। अपने पुराने जीवन की बातों को याद करते हुए भी कई व्यक्ति इसका दावा कर चुके हैं। विशेषकर हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख आदि धर्मों में इसकी मान्यता रही है। कहते हैं कि यदि इंसान की इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं तो वह पुनः जन्म लेने के लिए बाध्य होता है। इस तथ्य को एक कथा के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

एक बार की बात है। धरती पर एक वृद्ध दंपत्ति रहते थे। वे अत्यंत दुःखी थे। उनकी इस स्थिति को देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि उनको मुक्ति दे दें। तब भगवान् शिव ने कहा कि ऐसा संभव नहीं है क्योंकि वह दंपत्ति अभी भी इच्छा-मुक्त नहीं हुई है। किन्तु माता पार्वती के बार-बार अनुरोध करने पर भगवान् शिव ने उस दंपत्ति को दर्शन दिया और पूछा - ‘बोलो, तुम्हें क्या वरदान दूँ?’

 वृद्धा ने तत्काल कहा कि उसे सोलह साल की एक सुन्दर युवति बना दें। भगवान् शिव ने तथास्तु कहकर यह वरदान दे दिया और वह वृद्धा एक सुन्दर स्त्री में परिवर्तित हो गई।

इस पर उस वृद्ध ने कहा - ‘मैं जानता था कि तुम मुझे कभी भी प्रेम नहीं करती थी। तुम हमेशा मुझे त्यागने का विचार करती रही थी। इसलिए तुम एक सुन्दर स्त्री बनना चाहती थी।’

उस स्त्री ने कहा - ‘तुम्हें भी एक वर माँगने का अधिकार है, तुम भी अपना मनचाहा वरदान माँग लो।’


तब उस वृद्ध ने भगवान् शिव से वरदान के रूप में उस स्त्री को एक पशु बना देने का वरदान माँगा। यह देखकर उसके पुत्र को बहुत कष्ट हुआ और उसने भगवान् शिव से वरदान माँगा कि उन्हें पुनः पहले जैसा कर दें।


तब भगवान् शिव ने पार्वती को इसके संदर्भ में बताते हुए कहा कि जब इंसान की इच्छाओं का अंत नहीं होता है तो उन्हें मुक्ति नहीं मिल पाती है। वृद्धावस्था के कारण यदि नश्वर शरीर नष्ट भी हो जाता है, तब भी उसे पुनः जन्म लेकर उन इच्छाओं की पूर्ति करने की आवश्यकता होती है।

 
इस पर कई विचारकों ने अपने-अपने मत दिए हैं। एक ने तो यहाँ तक कहा कि मृत्यु के बाद जीवन है और नरक नाम की कोई वस्तु नहीं है। तब सबकुछ सुन्दर होता है। हम केवल स्वर्ग में ही जाते हैं क्योंकि तब हम सभी प्रकार की मोह-माया से छुटकारा पाकर एक अन्य जीवन में प्रवेश करते हैं। वहाँ हम कुछ लेकर नहीं जाते और केवल हमारी आत्मा ही जाती है, जो नश्वर नहीं है। एक गुरु ने कहा कि तुम मृत्यु के बारे में क्यों सोचते हो? यह उचित नहीं है। ईश्वर ने हमें जीवन दिया है और हमें उस जीवन का भरपूर आनंद उठाना चाहिए। अच्छे कर्म करने चाहिए और लोगों का भला करना चाहिए। 

                                                                विश्वजीत 'सपन' 03.06.2013  
(प्रिय मित्रों, यह आलेख VL Media Solution, Delhi, Lucknow से प्रकाशित "आनंद" पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)