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मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

मैं आस्तिक कैसे बना? (हास्य-व्यंग)


      मैं आस्तिक कैसे बना ?

यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मैं आस्तिक हूँ। लेकिन मैं आस्तिक कैसे बना यह कोई छोटी-मोटी कथा अथवा कहानी नहीं, बल्कि एक दास्तान है। अब आप पूछेंगे कि मैं पहेलियाँ क्यों बुझा रहा हूँ, तो मुझे अपनी दुःखभरी विपदा का बयान करना ही पड़ेगा। आख़िर मैं भी तो इंसान हूँ और अपनी वेदना प्रकट किए बगैर चैन नहीं पा सकता।

     मैं आस्तिक यूँ ही नहीं बन गया। न मैंने वेद व पुराण पढ़े और न ही रामायण या महाभारत। न मुझे ईश्वर के साक्षात् दर्शन हुए और न ही सपने में उन्होंने मुझसे कुछ कहा। फिर यह उपाधि ? नहीं-नहीं आप भ्रम में न पड़ें। इसे मैंने हासिल नहीं की, बल्कि यह सब हुआ टेलीविजन की बदौलत। अब आप कहेंगे कि यह क्या बुझौवल है। इसलिए मुझे अपनी आप-बीती सुनानी ही पड़ेगी। यह सच्चाई है, चाहे जग के लिए हँसाई ही क्यों न हो। अच्छा लगे तो मेरे दुःख में शरीक होकर दो बूँद आँसू ज़रूर बहाइएगा। मुझे अच्छा लगेगा।

     बात उन दिनों की है, जब श्रीयुत् रामानन्द सागर कृत रामायण सीरियल का आगाज़ हुआ था। तब कभी इसकी वजह से झगड़े का निपटारा होता था तो कभी बच्चों की तीर चलाने से मृत्यु। कभी राम नाम का राजनीतिक दुरुपयोग होता था तो कभी अंधे भक्तों पर बम-विस्पफोट। तब कॉलेज, मैदान, बाज़ार, शहर, देहात, पत्रिका, अख़बार हर जगह रामायण का रोग छूत की बीमारी की तरह फैल रहा था।

     यदि रामायण सीरियल देखने के बहाने लोग अपने पाप धोने का स्वांग रचते थे अथवा उसके माध्यम से स्वयं को कलयुग में सतयुगी अवतार समझते थे, तो इसमें उनका क्या नफा-नुकसान था इसका इल्म मुझे नहीं था। परन्तु इतना अवश्य पता था कि इससे टीवी कंपनी वालों की चाँदी ही चाँदी ही थी। ऐसी बिक्री का अंदाज़ा संभवतः भगवान् श्रीराम को भी नहीं होगा। बस धड़ाधड़ बिक रहे थे टीवी सेट्स। जहाँ सिवाय जनसंख्या बढ़ाने के अलावा और कोई मनोरंजन का साधन ही नहीं होता था, उन झुग्गी-झोपड़ियों में भी इसने अपने पैर जमा लिए थे। तो इससे बड़ा उदाहरण हो ही नहीं सकता था। लेकिन जिस तरह हर शेर सवा सेर नहीं होता, ठीक उसी तरह सभी गाँव या शहर दिल्ली नहीं होता। नतीजा बिजली महाशय के दर्शन प्रायः दुर्लभ ही होते थे। तब एक टीवी कंपनी वाले ने पोर्टेबुल टीवी के साथ-साथ बैटरी भी मुफ़्त में देना शुरू कर दिया।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

मैं क्यों लिखता हूँ? (कहानी)

   मैं क्यों लिखता हूँ?

     'आप बार-बार यही प्रश्न क्यों करते हैं?' उस दिन मैंने पूछ ही लिया।
     'आपकी उम्र निकल गई अफ़साने लिखते-लिखते, लेकिन अंजाम तक कोई नहीं पहुँचा, इसलिए।'
     ये थे शर्मा जी, मेरे पड़ोसी और मेरे अभिन्न मित्र। पूरा नाम - शिव कुमार शर्मा। हम साथ-साथ पले-बढ़े और साथ ही पढ़े भी थे। नौकरी के समय पत्र एवं दूरभाष से संपर्क में रहे। सेवानिवृत्त होकर अगल-बगल बस गए कि अब साथ तभी छूटेगा जब शरीर से आत्मा छूटेगी। अब हम प्रतिदिन टहला करते हैं और एक-दूसरे का आवश्यक सहारा भी बनते हैं। शर्मा जी बड़े व्यावहारिक हैं। सादा जीवन जीते हैं और मज़े में रहते हैं। हँसी-ख़ुशी में जीवन गुज़ारने में उन्हें पैसे की कठिनाई आड़े आया करती थी। लेकिन तब वे युवा थे। सपने बड़े और अधिक थे। अब कोई ग़म नहीं रहा था। उम्र के साथ-साथ वे अजनबी लालसाएँ भी मर-खप गई थीं। मेरे भी हालात कुछ-कुछ उनकी ही तरह के थे और पैसों की हमेशा ही किल्लत रही थी। इसके बावजूद मुझे कभी ज़िन्दगी से कोई ख़ास शिकायत नहीं रही थी। हम साथ-साथ अगल-बगल ही रहा करते थे तो हमारे बीच विवाद भी हमेशा बना रहा था। कभी दफ़्तरों के मुद्दे पर तो कभी आम मुद्दे पर। शुक्र है कि हमारे विवाद कभी झगड़े का कारण नहीं बने थे क्योंकि सारे विवाद मात्र विवाद भर ही थे। असल में इन विवादों का एक धनात्मक पहलू भी था। यह हमें ख़ुशी के साथ-साथ बहुत सारी बातें करने के अवसर प्रदान करते थे। अब भी हमारे विवादों का सिलसिला हमें जीवन्त कर देता है। असली ज़िन्दगी में हम मित्र थे, सघन मित्र। ऐसे मित्र कि एक-दूसरे के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।
     स्कूल के समय से ही मुझे लिखने का शौक था। कालेज के दिनों में कुछ रचनाएँ छ्पी भी, लेकिन अधिकतर सखेद वापस आ गई थीं। फिर भी लिखता रहा था, शौक़ के तौर पर और इसलिए भी कि आशा बनी हुई थी कि आज न कल वे रचनाएँ पाठकों के पास अवश्य पहुँचेंगीं और लोग उन्हें सराहेंगे भी। एक बार सरकारी दफ़्तर की नौकरी मिल जाने के बाद वक़्त कम था। वहाँ वही काम करता नज़र आता था जो करना चाहता था, जो नहीं करना चाहता था उसे न कोई पूछता था और न ही कोई काम ही देता था। वो कहते हैं न कि काम करने वाले काम घर ले जाते हैं और काम न करने वाले वेतन घर ले जाते हैं। मैं उन चंद काम करने वालों में से एक था। तो काम का बोझ उठा कर घर तक पहुँच जाता था। इसके बावजूद शौक़ जीवित रहा था। कई डायरियाँ भर गई थीं। दोस्तों के बीच कभी कोई कहानी तो कभी ग़ज़लें बात-चीत के विषय बनते रहे थे। लेकिन उन रचनाओं की कोई किताब न बन पाई थी और वे डायरियों में ही सिमट कर रह गई थीं। जीवन एक अनथक प्रयास है। मैं प्रयासरत रहा था। अब भी हूँ। शर्मा जी इसे नहीं मानते। उन्हें प्रयास का फल भी चाहिए। इसलिए प्रश्न कर बैठते हैं।
     मैं क्यों लिखता हूँ?
     यह मात्र एक प्रश्न नहीं है, उनके लिए यह एक अनबूझ पहेली है। मैंने कई बार उनसे कहा कि इस "क्यों" के उत्तर ढूँढ्ने का प्रयास करें क्योंकि मैं भी कई बार नहीं जानता था कि इस "क्यों" का उत्तर क्या था। मन करता था, तो लिखता था। आत्मा झिंझोड़ती थी, तो लिखता था। रूह काँप उठती थी, तो लिखता था। किसी गिरे हुए इंसान को देखता था, तो लिखता था। किसी अबला नारी को बिलखते देखता था, तो लिखता था। किसी मासूम की रोटी छिनते देखता था, तो लिखता था। पता नहीं कितने ही ऐसे कारण थे कि लिखता था और बस लिखता ही जाता था। फिर भी शर्मा जी की बात कई बार कचोटती थी। तब सोचने का प्रयास करता था कि उनके "क्यों" का उत्तर क्या है या होगा ?
     "क्यों" महत्त्वपूर्ण होता है। यह सभी जानते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते हैं कि इसका उत्तर ढूँढने में ऋषि-मुनियों ने अपनी सारी उम्र गँवा दी। सदियों तक लोग उत्तर पाने की चाह में न जाने कितने प्रकार से श्रम करते रहे हैं। किसी को सही उत्तर नहीं मिल सका है। जिसको मिला भी, तो आधा-अधूरा सा, एक टुकड़ा या कुछ छोटे-छोटे टुकड़े। बाकी कभी न मिल पाया। संभवतः इसी जद्दोजहद में दर्शन का आविर्भाव हुआ है। फिर भी सभी टुकड़े न मिल पाए और न कभी जुड़ पाए हैं। तब भला मैं इस प्रश्न का उत्तर क्या दे सकता था। इसका उत्तर तो केवल परमपिता परमेश्वर ही दे सकता था या फिर वह जो ब्रह्म हो, जो ब्रह्म में लीन हो, तल्लीन हो अथवा ब्रह्मस्वरूप हो।
     'यह दर्शन नहीं व्यवहार का प्रश्न है।' शर्मा जी अक्सर कहा करते थे।
     शर्मा जी का कहना उचित था। किन्तु मैं व्यवहार में रहा ही कब? अन्यथा इस शौक़ से निजात पा गया होता। लेखक न केवल समाज को एक अलग नज़रिये से देखता है, बल्कि अपने अंतर्मन में झाँक कर उसकी बारीकियों को पहचानने की कोशिश भी करता है। पाठकों को उन्हीं बारीकियों से पहचान करवाना चाहता है। पहचान आवश्यक होती है। आत्मीयता में सहायक होती है। मेरा प्रयास भी कुछ ऐसा ही था। क्या हुआ अगर वे पाठकों तक नहीं पहुँच पाईं। प्रयास कभी बेकार नहीं जाता। इसलिए लिखता रहा, इस आशा में कि आज न कल पाठक तो मिल ही जायेंगे।
     'अब तक नहीं मिला तो अब कब मिलेगा?' शर्मा जी पूर्ववत् प्रश्नागत हो जाते थे।
     नहीं भी मिला तो भी कोई मलाल नहीं। इस विधा में जीवित रहा मैं और मेरा अंतर्मन। इसलिए लोगों की परेशानियों, दुःख-दर्द को पहचान पाता हूँ। कल देखा नहीं आपने, आपके सामने ही उस रेड़ी वाले ने रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाई थी। आपने कितनी सहजता से कह दिया था कि अब नगर निगम वाले नहीं सुन रहे तो हम क्या कर सकते हैं ? और उस बेचारे को उसके हाल पर छोड़ कर अपने घर चले गए थे। मैं उसकी व्यथा से परेशान रहा और उसे लेकर निगम गया। यह अलग बात है कि मैं गिड़गिड़ाया, तर्क पर तर्क दिए, लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी। उसकी रेड़ी उसे नहीं मिली, लेकिन मुझे इस बात का संतोष रहा कि मैंने अपनी ओर से भरसक प्रयास किया। इसी प्रयास का प्रेरणास्रोत है लेखन। यह प्रयास कि मानव, मानव बन जाए, इस कारण से लिखता रहा। यह चाहे और कुछ न हो, सहायक तो है ही।
     'नेता बनो, अफ़सर बनो, पैसे वाले बनो, तभी ऐसे लोगों की सहायता कर पाओगे। वरना तूतीखाने में नगाड़ों की आवाज़ दब ही जाती है।' एक व्यावहारिक व्यक्ति की व्यावहारिक सोच के साथ शर्मा जी मुझसे मुखातिब होते।
     कुछ भी बन जाने से कुछ नहीं होता है। सबसे पहले मानव बनना पड़ता है। मानवता सीखनी और अपनानी पड़ती है। कल का अख़बार पढ़ा नहीं आपने। ईराक में चवालीस लोग मौत के घाट उतार दिए गए। फिलीपीन्स में तीन बम विस्फोटों में सात लोग मरे गए और बीसियों घायल हो गए। अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, रूस, स्वीडन, जर्मनी, न्यूयार्क, लंदन, ब्रुसेल्स, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, कश्मीर, नार्थ-ईस्ट सभी जल रहे हैं। मानवता का पतन हो रहा है और हम आने वाले दहशत को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना कर रहे हैं। डर-डर कर जीने को बाध्य हो रहे हैं। मात्र इसलिए कि हम अपने अंतर्मन में झाँकने की प्रथा भूल गए हैं। बाहर की गंदगी से प्रभावित हो रहे हैं और उसे ही सच मान कर दुविधा दूर करने का संकल्प ले रहे हैं।
     'तो लेखक क्या कर लेगा ?' चुनौती भरा सवाल।
     कुछ नहीं। वह कुछ करता नहीं, देखता है। सोचता है। विचार करता है। गड्ड-मड्ड हुए विचारों का संकलन करता है। उसे सही दिशा देता है और लोगों को बताता है कि क्या सही है और क्या ग़लत। कलम की ताक़त पर शंका न तब थी, न अब है। अब माओवाद को ही देख लो। इसी लेखन की उपज है। लेखन उद्बोधन देती है, सजग बनाती है, सतर्क करती है, इसलिए कई बार प्रतिक्रियात्मक भी बना डालती है। अणु शक्ति हमें बिजली और ऊर्जा देती है, वहीं लोगों को हताहत भी करती है।
     'तब इसे अपना कर हम कौन-सा नेक काम कर रहे हैं?'
     किसी भी वस्तु की अति हमेशा नुकसानदेह होती है। खान-पान से लेकर रहन-सहन तक हमें हर जगह अति से बचना चाहिए - "अति सर्वत्र वर्जेयत"। यही सार है। जिसे समझ जाना ही आधी से अधिक समस्याओं का निदान है।
     उस दिन के बाद शर्मा जी का प्रश्न काटता नहीं था क्योंकि मुझे मेरे कई सवालों के उत्तर मिल गए थे। उनके लिए अभी भी यह एक अनबूझ पहेली थी कि मैं क्यों लिखता था। और सच तो यह है कि मुझे ऐसा लगता था कि संभवतः मुझे भी पूरा-पूरा पता नहीं था कि मैं क्यों लिखता हूँ।
     और फिर उस दिन सुबह शर्मा जी टहलने न आ सके। मुझे चिंता हुई। उनके घर के पास पहुँचा तो कुछ लोग दिखाई पड़े। कुछ लोग क्या मानो भीड़ ही थी। चिंता आशंका में बदल गई। बेटा-बेटी कोई साथ नहीं रहते थे। पत्नी पहले ही चल बसी थी। अब वे भी नहीं रहे थे। मुझे अकेला कर गए थे। दूसरे दिन बेटा आया। उनके सामानों को बाहर निकाल कर कबाड़ियों को दे दिया गया। मैं मना करना चाहता था। उनकी निशानियों को रखवाना चाहता था, लेकिन कर नहीं पाया। शर्मा जी होते तो मेरी बात नहीं उठती, लेकिन अब भरोसा नहीं था। इसलिए मन मसोस कर रह गया। कबाड़ी ज़रूरी समान रख कर बाक़ी की पोटरी बनाने लगा तो मेरी नज़र एक डयरी पर पड़ी। मैंने कबाड़ी से पूछ कर उसे उठा ली। वह कबाड़ी के किसी काम की नहीं थी। मैं उसे धन्यवाद् देकर जाने लगा तो वह अजनबी नज़रों से मुझे देखने लगा। मैंने थोड़ी दूर जाकर उस डायरी के पन्ने पलटे तो शर्मा जी के लेखन के साक्षात् दर्शन हो गए। उनके लिखे अंतिम शब्द मेरे मन-मस्तिष्क में सदा के लिए अंकित हो गए - "लेखन मरता नहीं, लेखक मरता नहीं"।
     उसके बाद अकेले टहलना कम होता गया। उम्र बढ़ती गई और देखने, सुनने एवं समझने की क्षमता पर असर होता गया। मुझ पर कुछ अधिक ही हो चुका था। बचपन से इस प्रकार देखते रहने से शायद प्रभाव अधिक गहरा गया था। डाक्टरों का कहना था कि मैं अपने मन को थोड़ा विश्राम दूँ। मैंने अपनी डायरियों को सहेज कर रख दिया। शायद उन्हें मेरे से अधिक विश्राम की ज़रूरत थी। किन्तु मन नहीं मानता था। कई महीने बीत गए। बचता रहा था अब तक, लेकिन एक दिन मन नहीं माना। रचनाकार का दिल है। रचना के प्रति मोह से भर गया। धूल की गर्द से उन्हें निकाला तो देखा कि दीमकों ने उनके कई शब्द चाट डाले थे। लेखनी के कई शब्द अर्थहीन होकर विलग हो गए थे। क्या यही सच्चाई थी? मैं अवाक् रह गया कि क्या लेखनी भी विमुख हो सकती है?

विश्वजीत 'सपन'


   

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

जूते की महिमा (हास्य-व्यंग)

आप सबों को पता ही होगा कि किसी ज़माने में एक कहावत हुआ करती थी कि जूते से आदमी की पहचान होती है। आपने कैसे जूते पहन रखे हैं ? वे सलीके के हैं अथवा नहीं ? उनमें ठीक तरीके से पालिश की गई है अथवा नहीं ? वे पुराने और फटे हुए तो नहीं हैं ? आदि-इत्यादि से आदमी को सभ्य या असभ्य समझा जाता था।

   लेकिन आज कल लोग जूते से महान बनते हैं। कुछ नहीं तो जूते फेंक कर जूते की महानता का प्रदर्शन करते हैं। इससे दोनों का लाभ होता है, एक जूते फेंकने वाले का और दूसरा जिस पर जूता फेंका गया हो, क्योंकि दोनों ही महानता की मंज़िल तक सीढ़ी चढ़ने में सफल हो जाते हैं। क्षण भर में ही अख़बारों एवं टीवी चैनलों पर महानायक बन कर उभर जाते हैं।

   आपको संभवतः पता हो अथवा न हो, किन्तु यह सत्य है कि इसी सदी के महान् राष्ट्रनायक श्रीयुत् जार्ज बुश ने इस आदरणीय एवं सुशोभनीय परम्परा का शुभारम्भ किया था। (अब करवाया था या किया था, इस पर शोध किया जा सकता है) तब वे ईराक में आम जन का गुस्सा झेल रहे थे। वह जूता फेंकने वाला अत्यधिक महान हो चुका है और उसे कई सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। अतः इस परम्परा में जुड़ने के लिए लोग निरन्तर परिश्रमरत हैं। अतः अब इस कड़ी में लगातार नाम जुड़ते चले जा रहे हैं। आप तो समझ ही गए होंगे कि मैं माननीय गृहमंत्री चिदंबरम् महोदय और नवीन जिंदल जी, उद्योगपति जी की बात कर रह हूँ। वैसे अभी तो यह फ़िल्म का ट्रेलर ही है, आगे-आगे देखते जाइए क्योंकि फ़िल्म अभी बाक़ी है। अब देखिए तो सही कि कुछ समय तक तो जूता फेंकने वाले सभी बाहर वाले थे, किन्तु चिरन्तन सत्य की भाँति सदैव भावी प्रधानमंत्री रहे श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के लिए तो उनके घरवाले ने ही यह कारनामा कर दिखाया था। बात यहीं नहीं रुकी और कांग्रेस के एक बड़े नेता पर तो एक पत्रकार ने भी जूते दिखाने का घनघोर प्रदर्शन कर डाला। अब तो पत्रकार बंधु भी इस कला प्रदर्शन में रम गए से प्रतीत होते हैं। तो फिर हम तो बस इतना ही कह सकते हैं कि जैसी प्रभु की इच्छा। साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि यह सरल-सुलभ परम्परा सदैव इसी भाँति सुचारु रूप से चलती रहे, ऐसी हमारी भी आकांक्षा है क्योंकि आवश्यक रूप से यह परम्परा जगत का भला करने वाला प्रतीत होता है।

   अब तो आपको हमारे वक्तव्य पर संदेह नहीं होना चाहिए कि हम श्रीमान जूते जी का भजन क्यों गा रहें हैं और हमें श्रीमान जूते जी से इतना गहरा लगाव क्यों हो गया है। यह वैसे भी बड़े काम की चीज़ होती है। संभवतः जूते खाना इसी कारण से एक मुहावरा भी है। कभी यह किसी की ऊँचाई बढ़ाने के काम आता है तो कभी किसी की पिटाई के। इसने समाजवाद को भी काफी बढ़ावा दिया है क्योंकि ऐन मौके पर बाज़ार में या फिर कहीं भी अचानक ही फट जाता है या टूट जाता है और जूते सिलने वालों अर्थात् चर्मकारों को काम देता है। बूट पालिश करने वालों के पेट भरता है। फ़िल्मों को प्लाट देता है। तब चाहे बूट पालिस नामक फ़िल्म ही क्यों न हो अथवा जूते को पालिश करने वाला का सबसे बड़ा गैंगस्टर बन जाना ही क्यों न हो। सच में इसकी महिमाओं के गुण गाने में आदमी अपनी शान समझता है, और इसीलिए इसे पहनने वाला दूसरों को जूते की नोंक पर रखता है।

   आज कल इसने राजनीति में अपनी कहर बरसाई हुई है। इसलिए लोग इसे फेंक कर अपने गुस्से का इज़हार कर रहे हैं। चूँकि यह आम आदमी को नसीब नहीं होता है, अतः इसके महत्त्व को आसानी से समझा जा सकता है। राजनीति में इसका महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि तब ही पता चल पाता है कि किसी सभा में कितने आम आदमी थे और कितने ख़ास। जो भी हो, इतना तो तय है कि आम आदमी इसे फेंक अवश्य सकता है, किन्तु इसकी मार से बच नहीं सकता है। वैसे ख़ुदा-न-ख़स्ता वह बच भी जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं होती है क्योंकि अख़बार वालों के लिए वह आम बात हो जाती है।

   और आज कल बाज़ार में तरह-तरह के जूते बिक रहे हैं। सौ रुपये से लेकर बीस-तीस हज़ार तक के जूते उपलब्ध हैं। क्या आपको इसकी सुपीरियटी काम्प्लैक्स का बोध नहीं हो रहा है। अगर नहीं हो रहा है तो शौक से बाज़ार का भ्रमण कीजिए और आजमा आइए। चारों खाने चित न हों तो जूता पहनना छोड़ दूँगा। भ्रम में मत रहिए, अब कुछ ऐसी ही भाषाओं एवं परिभाषाओं के दौर चलने वाले हैं, जहाँ हर समय जूतम-पैजार की ही महिमा गाई जाएगी। अब आपसे क्या छुपाना, हमारे लोकतंत्र की आन, बान और शान संसद और विधानसभाओं में इसने पहले से ही अपनी अच्छी-खासी पैठ जमा रखी थी। यह तो बेचारे चैनल वालों और अख़बार वालों को समझ नहीं थी। अब समझ आई है तो ब्रेकिंग न्यूज़ के तहत स्लो मोशन से लेकर अनेक प्रकार के ग्राफिक्स के साथ इन्हें बार-बार दिखाया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे कि यह भावी प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हो गया हो। वैसे वह दिन भी दूर नहीं है, यह हम कहे देते हैं, जब यह कोई न कोई मंत्री-शंत्री अवश्य बन जाएगा क्योंकि वैश्विक स्तर पर जूता फेंकने वालों को सम्मान दिया जा रहा है। फेंके गए जूतों को संग्रहालयों में स्थान दिया जा रहा है। यह सब कुछ आनन-फानन में नहीं हो रहा है। सब कुछ सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है। इसमें किसी न किसी विदेशी शक्ति का हाथ है, अब कोई संदेह नहीं रह गया है। यदि आपको है तो कृपया ऐसे ही किसी जूते का इन्टरोगेशन कर लें।

   अब एक विशेष सूचना जूतातंत्र, ज़िन्दाबाद !

विश्वजीत 'सपन'

रविवार, 27 नवंबर 2011

हड़ताल (व्यंग)

गाय, बैल, गधा, कुत्ता, मुर्गी, घोड़ा सभी ने एक आवाज़ में कहा – ‘ह…ड़…ता…ल’। अख़बार वाले, टीवी वाले, पत्रिका वाले सब के सब खचाखच भरे हुए थे। बस नेता जी के आने की देर थी। फटाफट फोटो उतारे जा रहे थे। कहीं मोबाइल पर प्रत्यक्ष प्रसारण का वाचन चल रहा था तो कहीं टीवी पर साक्षात् प्रत्यक्ष प्रसारण। ख़बर बड़ी थी और अनोखी भी। अद्भुत नज़ारा था। सारे शहर के पालतू जानवरों ने हड़ताल करने का फैसला किया था और वे मुख्य सड़क पर आ गए थे। सारा शहर बेकाबू हो रहा था। कोई कहीं नहीं जा पा रहा था। सब के सब जहाँ थे वहीं क़ैद हो गए थे। पालतू जानवरों को मानव जाति से बेहतर व्यवहार की उम्मीद थी, जबकि वे उनसे अमानुषिक व्यवहार करते हैं, ऐसा उनका कहना था।

    ‘वाह री दुनियाँ ! अब तक तो बस की हड़ताल, आटो की हड़ताल, डाक्टरों की हड़ताल, पानी की हड़ताल, सब्ज़ी की हड़ताल, प्याज की हड़ताल आदि-इत्यादि की हड़ताल से दु:खी थे, अब पालतू जानवरों की हड़ताल में क्या होगा भगवान् ही जाने।’ एक बुज़ुर्ग ने आशंका ज़ाहिर की।

    ‘होना क्या है ? वही होगा जो अब तक होता आया है। सबकुछ बंद। कामकाज ठप्प। लोगों का चलना मुहाल। सब्ज़ी और ज़रूरी सामानों की किल्लत। रेलगाड़ियों और बसों का चक्का जाम। वीआईपी खुशहाल। आम आदमी बेहाल।’ दूसरे बुज़ुर्ग ने तत्क्षण उत्तर दिया।

    अब यह रटी-रटाई बात हो गई है। भला हो गाँधी जी का जिन्होंने यह अचूक रास्ता निकाला था और देश को एक नई दिशा दी थी। असहयोग तब था और आज हड़ताल है। हमें अपने अतीत पर बहुत गर्व है, इसलिए उसे पकड़कर अपने आहाते में रख लेते हैं। फिर छोड़ते नहीं क्योंकि उसके अलावा अपना कहने को कुछ है ही नहीं।

    और नेता जी पधारे। सारा हुजूम उनकी तरफ़ लपका, जैसे वे इंसान नहीं लड्डू हों और प्रसाद की तरह बिक रहे हों। शांत हो जाइए, शांत हो जाइए। नेता जी ने दोनों हाथ फैलाकर प्रसाद बाँटा, लेकिन न लोग मान रहे थे और न जानवर। सब के सब एक समान अपनी-अपनी सुनने-सुनाने को बेताब थे। संगम था जानवरों और इंसानों का जिसमें हर चीज़ की समानता थी। आचार-व्यवहार, चाल-चलन और सबसे अहम् – हड़ताल।

    किसी प्रकार नेता जी को माइक मिल ही गई। बोले – ‘भाइयो एवं बहनो !’ और चारों तरफ़ तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। नेता जी विवेकानंद से भी बड़े हो गए। उन्होंने दूसरे देश के लोगों को भाई-बहन माना था और नेता जी ने पालतू जानवरों को भी मान लिया। वाह जी नेताई ! तेरे रंग हज़ार, तेरे रूप अनेक। टीवी वालों ने जुमला फेंका और फिर भाषण शुरू हुआ। कुछ खास नहीं। जो अक्सर होता है, माइक पर चीखना-चिल्लाना और बहकी-बहकी बातें करना। सबों को भड़काना और ख़ुद को मसीहा बताना। जो भी हो हड़ताल की शुरुआत तो हो गई और सबकुछ बंद हो गया।

    नेता जी की जय-जयकार में कुत्तों की भौं-भौं, गधे का ढेंचू-ढेंचू, मुर्गे की कुकड़ुमकू, बिल्ली की म्याऊँ-म्याऊँ भी शामिल हो गई। नेता जी का विस्तार हो गया। मानव-जगत् के साथ-साथ पशु-जगत् पर भी एकाधिकार छा गया। नेता जी खुश हुए और बोले – ‘आज मैं सफ़ल हुआ। इंसान तो क्या जानवरों को भी मात दे गया।’

    परेशानी तब शुरू हुई जब भाषण समाप्त कर नीचे उतरने लगे। कहीं से भी रास्ता नहीं था। आदमी होते तो शायद जगह मिल जाती। जानवर जहाँ थे वहाँ से टस से मस नहीं हो रहे थे। मंच पर उठ रही गंध से बेहाल तो थे ही, भाषण जल्द समाप्त कर भागे, मगर जायें तो जायें कहाँ की धुन मन में बजी। कहीं लीद थी तो कहीं गोबर्। कहीं कुत्ता तो कहीं बिल्ली की… । नाक पर हाथ रखकर किसी तरह उछ्ल-कूदकर मंच से नीचे तो आ ही गए। राम-राम अब नहीं, नेता जी ने कहा। लेकिन अब क्या, जो होना था हो गया ‘ह…ड़…ता…ल’। चलने को जगह नहीं थी। हर तरफ़ जानवर नहीं तो टीवी वाले, पत्रकार, अधिकारी, भिखारी और तरह-तरग के इंसान थे। चलने को सूत भर भी जगह नहीं थी। बिगड़ पड़े – ‘यह क्या मज़ाक है ? हमें तो जाने दो !’

    गधे ने आत्मीयता से कहा – ‘नेता जी, क्षमा करें। यह आदमी की नहीं, जानवरों की हड़ताल है। यहाँ सबके लिए एक-सा हाल है। वे तो न जाने क्यों तरजीह देकर निकाल देते हैं। हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता। सब फँसे हैं, आप भी लुत्फ उठाइए।’