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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

मैं क्यों लिखता हूँ? (कहानी)

   मैं क्यों लिखता हूँ?

     'आप बार-बार यही प्रश्न क्यों करते हैं?' उस दिन मैंने पूछ ही लिया।
     'आपकी उम्र निकल गई अफ़साने लिखते-लिखते, लेकिन अंजाम तक कोई नहीं पहुँचा, इसलिए।'
     ये थे शर्मा जी, मेरे पड़ोसी और मेरे अभिन्न मित्र। पूरा नाम - शिव कुमार शर्मा। हम साथ-साथ पले-बढ़े और साथ ही पढ़े भी थे। नौकरी के समय पत्र एवं दूरभाष से संपर्क में रहे। सेवानिवृत्त होकर अगल-बगल बस गए कि अब साथ तभी छूटेगा जब शरीर से आत्मा छूटेगी। अब हम प्रतिदिन टहला करते हैं और एक-दूसरे का आवश्यक सहारा भी बनते हैं। शर्मा जी बड़े व्यावहारिक हैं। सादा जीवन जीते हैं और मज़े में रहते हैं। हँसी-ख़ुशी में जीवन गुज़ारने में उन्हें पैसे की कठिनाई आड़े आया करती थी। लेकिन तब वे युवा थे। सपने बड़े और अधिक थे। अब कोई ग़म नहीं रहा था। उम्र के साथ-साथ वे अजनबी लालसाएँ भी मर-खप गई थीं। मेरे भी हालात कुछ-कुछ उनकी ही तरह के थे और पैसों की हमेशा ही किल्लत रही थी। इसके बावजूद मुझे कभी ज़िन्दगी से कोई ख़ास शिकायत नहीं रही थी। हम साथ-साथ अगल-बगल ही रहा करते थे तो हमारे बीच विवाद भी हमेशा बना रहा था। कभी दफ़्तरों के मुद्दे पर तो कभी आम मुद्दे पर। शुक्र है कि हमारे विवाद कभी झगड़े का कारण नहीं बने थे क्योंकि सारे विवाद मात्र विवाद भर ही थे। असल में इन विवादों का एक धनात्मक पहलू भी था। यह हमें ख़ुशी के साथ-साथ बहुत सारी बातें करने के अवसर प्रदान करते थे। अब भी हमारे विवादों का सिलसिला हमें जीवन्त कर देता है। असली ज़िन्दगी में हम मित्र थे, सघन मित्र। ऐसे मित्र कि एक-दूसरे के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।
     स्कूल के समय से ही मुझे लिखने का शौक था। कालेज के दिनों में कुछ रचनाएँ छ्पी भी, लेकिन अधिकतर सखेद वापस आ गई थीं। फिर भी लिखता रहा था, शौक़ के तौर पर और इसलिए भी कि आशा बनी हुई थी कि आज न कल वे रचनाएँ पाठकों के पास अवश्य पहुँचेंगीं और लोग उन्हें सराहेंगे भी। एक बार सरकारी दफ़्तर की नौकरी मिल जाने के बाद वक़्त कम था। वहाँ वही काम करता नज़र आता था जो करना चाहता था, जो नहीं करना चाहता था उसे न कोई पूछता था और न ही कोई काम ही देता था। वो कहते हैं न कि काम करने वाले काम घर ले जाते हैं और काम न करने वाले वेतन घर ले जाते हैं। मैं उन चंद काम करने वालों में से एक था। तो काम का बोझ उठा कर घर तक पहुँच जाता था। इसके बावजूद शौक़ जीवित रहा था। कई डायरियाँ भर गई थीं। दोस्तों के बीच कभी कोई कहानी तो कभी ग़ज़लें बात-चीत के विषय बनते रहे थे। लेकिन उन रचनाओं की कोई किताब न बन पाई थी और वे डायरियों में ही सिमट कर रह गई थीं। जीवन एक अनथक प्रयास है। मैं प्रयासरत रहा था। अब भी हूँ। शर्मा जी इसे नहीं मानते। उन्हें प्रयास का फल भी चाहिए। इसलिए प्रश्न कर बैठते हैं।
     मैं क्यों लिखता हूँ?
     यह मात्र एक प्रश्न नहीं है, उनके लिए यह एक अनबूझ पहेली है। मैंने कई बार उनसे कहा कि इस "क्यों" के उत्तर ढूँढ्ने का प्रयास करें क्योंकि मैं भी कई बार नहीं जानता था कि इस "क्यों" का उत्तर क्या था। मन करता था, तो लिखता था। आत्मा झिंझोड़ती थी, तो लिखता था। रूह काँप उठती थी, तो लिखता था। किसी गिरे हुए इंसान को देखता था, तो लिखता था। किसी अबला नारी को बिलखते देखता था, तो लिखता था। किसी मासूम की रोटी छिनते देखता था, तो लिखता था। पता नहीं कितने ही ऐसे कारण थे कि लिखता था और बस लिखता ही जाता था। फिर भी शर्मा जी की बात कई बार कचोटती थी। तब सोचने का प्रयास करता था कि उनके "क्यों" का उत्तर क्या है या होगा ?
     "क्यों" महत्त्वपूर्ण होता है। यह सभी जानते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते हैं कि इसका उत्तर ढूँढने में ऋषि-मुनियों ने अपनी सारी उम्र गँवा दी। सदियों तक लोग उत्तर पाने की चाह में न जाने कितने प्रकार से श्रम करते रहे हैं। किसी को सही उत्तर नहीं मिल सका है। जिसको मिला भी, तो आधा-अधूरा सा, एक टुकड़ा या कुछ छोटे-छोटे टुकड़े। बाकी कभी न मिल पाया। संभवतः इसी जद्दोजहद में दर्शन का आविर्भाव हुआ है। फिर भी सभी टुकड़े न मिल पाए और न कभी जुड़ पाए हैं। तब भला मैं इस प्रश्न का उत्तर क्या दे सकता था। इसका उत्तर तो केवल परमपिता परमेश्वर ही दे सकता था या फिर वह जो ब्रह्म हो, जो ब्रह्म में लीन हो, तल्लीन हो अथवा ब्रह्मस्वरूप हो।
     'यह दर्शन नहीं व्यवहार का प्रश्न है।' शर्मा जी अक्सर कहा करते थे।
     शर्मा जी का कहना उचित था। किन्तु मैं व्यवहार में रहा ही कब? अन्यथा इस शौक़ से निजात पा गया होता। लेखक न केवल समाज को एक अलग नज़रिये से देखता है, बल्कि अपने अंतर्मन में झाँक कर उसकी बारीकियों को पहचानने की कोशिश भी करता है। पाठकों को उन्हीं बारीकियों से पहचान करवाना चाहता है। पहचान आवश्यक होती है। आत्मीयता में सहायक होती है। मेरा प्रयास भी कुछ ऐसा ही था। क्या हुआ अगर वे पाठकों तक नहीं पहुँच पाईं। प्रयास कभी बेकार नहीं जाता। इसलिए लिखता रहा, इस आशा में कि आज न कल पाठक तो मिल ही जायेंगे।
     'अब तक नहीं मिला तो अब कब मिलेगा?' शर्मा जी पूर्ववत् प्रश्नागत हो जाते थे।
     नहीं भी मिला तो भी कोई मलाल नहीं। इस विधा में जीवित रहा मैं और मेरा अंतर्मन। इसलिए लोगों की परेशानियों, दुःख-दर्द को पहचान पाता हूँ। कल देखा नहीं आपने, आपके सामने ही उस रेड़ी वाले ने रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाई थी। आपने कितनी सहजता से कह दिया था कि अब नगर निगम वाले नहीं सुन रहे तो हम क्या कर सकते हैं ? और उस बेचारे को उसके हाल पर छोड़ कर अपने घर चले गए थे। मैं उसकी व्यथा से परेशान रहा और उसे लेकर निगम गया। यह अलग बात है कि मैं गिड़गिड़ाया, तर्क पर तर्क दिए, लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी। उसकी रेड़ी उसे नहीं मिली, लेकिन मुझे इस बात का संतोष रहा कि मैंने अपनी ओर से भरसक प्रयास किया। इसी प्रयास का प्रेरणास्रोत है लेखन। यह प्रयास कि मानव, मानव बन जाए, इस कारण से लिखता रहा। यह चाहे और कुछ न हो, सहायक तो है ही।
     'नेता बनो, अफ़सर बनो, पैसे वाले बनो, तभी ऐसे लोगों की सहायता कर पाओगे। वरना तूतीखाने में नगाड़ों की आवाज़ दब ही जाती है।' एक व्यावहारिक व्यक्ति की व्यावहारिक सोच के साथ शर्मा जी मुझसे मुखातिब होते।
     कुछ भी बन जाने से कुछ नहीं होता है। सबसे पहले मानव बनना पड़ता है। मानवता सीखनी और अपनानी पड़ती है। कल का अख़बार पढ़ा नहीं आपने। ईराक में चवालीस लोग मौत के घाट उतार दिए गए। फिलीपीन्स में तीन बम विस्फोटों में सात लोग मरे गए और बीसियों घायल हो गए। अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, रूस, स्वीडन, जर्मनी, न्यूयार्क, लंदन, ब्रुसेल्स, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, कश्मीर, नार्थ-ईस्ट सभी जल रहे हैं। मानवता का पतन हो रहा है और हम आने वाले दहशत को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना कर रहे हैं। डर-डर कर जीने को बाध्य हो रहे हैं। मात्र इसलिए कि हम अपने अंतर्मन में झाँकने की प्रथा भूल गए हैं। बाहर की गंदगी से प्रभावित हो रहे हैं और उसे ही सच मान कर दुविधा दूर करने का संकल्प ले रहे हैं।
     'तो लेखक क्या कर लेगा ?' चुनौती भरा सवाल।
     कुछ नहीं। वह कुछ करता नहीं, देखता है। सोचता है। विचार करता है। गड्ड-मड्ड हुए विचारों का संकलन करता है। उसे सही दिशा देता है और लोगों को बताता है कि क्या सही है और क्या ग़लत। कलम की ताक़त पर शंका न तब थी, न अब है। अब माओवाद को ही देख लो। इसी लेखन की उपज है। लेखन उद्बोधन देती है, सजग बनाती है, सतर्क करती है, इसलिए कई बार प्रतिक्रियात्मक भी बना डालती है। अणु शक्ति हमें बिजली और ऊर्जा देती है, वहीं लोगों को हताहत भी करती है।
     'तब इसे अपना कर हम कौन-सा नेक काम कर रहे हैं?'
     किसी भी वस्तु की अति हमेशा नुकसानदेह होती है। खान-पान से लेकर रहन-सहन तक हमें हर जगह अति से बचना चाहिए - "अति सर्वत्र वर्जेयत"। यही सार है। जिसे समझ जाना ही आधी से अधिक समस्याओं का निदान है।
     उस दिन के बाद शर्मा जी का प्रश्न काटता नहीं था क्योंकि मुझे मेरे कई सवालों के उत्तर मिल गए थे। उनके लिए अभी भी यह एक अनबूझ पहेली थी कि मैं क्यों लिखता था। और सच तो यह है कि मुझे ऐसा लगता था कि संभवतः मुझे भी पूरा-पूरा पता नहीं था कि मैं क्यों लिखता हूँ।
     और फिर उस दिन सुबह शर्मा जी टहलने न आ सके। मुझे चिंता हुई। उनके घर के पास पहुँचा तो कुछ लोग दिखाई पड़े। कुछ लोग क्या मानो भीड़ ही थी। चिंता आशंका में बदल गई। बेटा-बेटी कोई साथ नहीं रहते थे। पत्नी पहले ही चल बसी थी। अब वे भी नहीं रहे थे। मुझे अकेला कर गए थे। दूसरे दिन बेटा आया। उनके सामानों को बाहर निकाल कर कबाड़ियों को दे दिया गया। मैं मना करना चाहता था। उनकी निशानियों को रखवाना चाहता था, लेकिन कर नहीं पाया। शर्मा जी होते तो मेरी बात नहीं उठती, लेकिन अब भरोसा नहीं था। इसलिए मन मसोस कर रह गया। कबाड़ी ज़रूरी समान रख कर बाक़ी की पोटरी बनाने लगा तो मेरी नज़र एक डयरी पर पड़ी। मैंने कबाड़ी से पूछ कर उसे उठा ली। वह कबाड़ी के किसी काम की नहीं थी। मैं उसे धन्यवाद् देकर जाने लगा तो वह अजनबी नज़रों से मुझे देखने लगा। मैंने थोड़ी दूर जाकर उस डायरी के पन्ने पलटे तो शर्मा जी के लेखन के साक्षात् दर्शन हो गए। उनके लिखे अंतिम शब्द मेरे मन-मस्तिष्क में सदा के लिए अंकित हो गए - "लेखन मरता नहीं, लेखक मरता नहीं"।
     उसके बाद अकेले टहलना कम होता गया। उम्र बढ़ती गई और देखने, सुनने एवं समझने की क्षमता पर असर होता गया। मुझ पर कुछ अधिक ही हो चुका था। बचपन से इस प्रकार देखते रहने से शायद प्रभाव अधिक गहरा गया था। डाक्टरों का कहना था कि मैं अपने मन को थोड़ा विश्राम दूँ। मैंने अपनी डायरियों को सहेज कर रख दिया। शायद उन्हें मेरे से अधिक विश्राम की ज़रूरत थी। किन्तु मन नहीं मानता था। कई महीने बीत गए। बचता रहा था अब तक, लेकिन एक दिन मन नहीं माना। रचनाकार का दिल है। रचना के प्रति मोह से भर गया। धूल की गर्द से उन्हें निकाला तो देखा कि दीमकों ने उनके कई शब्द चाट डाले थे। लेखनी के कई शब्द अर्थहीन होकर विलग हो गए थे। क्या यही सच्चाई थी? मैं अवाक् रह गया कि क्या लेखनी भी विमुख हो सकती है?

विश्वजीत 'सपन'


   

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