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गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

मित्रता

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण,
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्धभिन्ना,
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।नी.श.59।।


अन्वय - खल-सज्जनानाम् मैत्री दिनस्य पूर्वार्द्ध-परार्ध भिन्ना छाया इव आरम्भगुर्वी, क्रमेण क्षयिणी, पुरा लघ्वी, पश्चात् च वृद्धमती (भवति)।


अर्थ - दुष्ट एवं सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध में भिन्न छाया के समान होती है। दुष्ट की आरम्भ में वृद्धि वाली और क्रमशः छोटी होने वाली, जबकि सज्जनों की प्रारम्भ में छोटी और बाद में वृद्धि होने वाली होती है।


असल में दुष्ट व्यक्ति किसी प्रयोजनवश मित्रता करता है और इसी कारण से बड़ी शीघ्रता से निकट आता है और प्रयोजन पूर्ण होने के बाद उतनी ही शीघ्रता से दूर चला जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रातःकालीन किसी वस्तु की छाया बड़ी होती है किन्तु मध्याह्न होते-होते छोटी होती चली जाती है।


इसके विपरीत सज्जनों की मित्रता मध्याह्न के बाद की किसी वस्तु की छाया के समान होती है, जो प्रारम्भ में छोटी होती है, किन्तु धीरे-धीरे बड़ी होती जाती है। इसका कारण यह है कि सज्जन की मित्रता स्वार्थ से रहित होती है, अतः निःस्वार्थ होती है। अतः वह सभी प्रकार से परखने के बाद ही मित्रता करता है, जो परख के बाद शनैः-शनैः बढ़ती जाती है। छाया के बढ़ने और छोटे होने की उपमा के साथ दुष्ट एवं सज्जन की मित्रता को बड़ी सुन्दरता से इस श्लोक में बताया गया है और संदेश दिया गया है कि मित्रता करने से पूर्व मित्र का परीक्षण बहुत आवश्यक होता है।

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प्रस्तुति एवं व्याख्या
विश्वजीत ‘सपन’

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

नीति

लोभेश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः,
सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं निजैः सुपहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः,
सद्-विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना।।नी.श. 54।।

 
अर्थात् यदि लोभ है, तो दुर्गुणों से क्या? यदि चुगलखोरी है तो पाप से क्या? यदि सत्य है तो तपस्या से क्या? यदि पवित्र मन है तो तीर्थों से क्या? यदि सज्जनता है तो आत्मीयों से क्या? यदि सुयश है तो आभूषणों से क्या? यदि श्रेष्ठ विद्या है तो धनों से क्या? यदि अपयश है तो मृत्यु से क्या?


तात्पर्य यह कि लोभ व्यक्ति का सबसे बड़ा दुर्गण है, यदि किसी व्यक्ति के पास यह दुर्गण है, तो फिर किसी अन्य दुर्गुण की आवश्यकता ही नहीं है। चुगलखोरी सबसे बड़ा पाप है। यह कोई करता है, तो उसे किसी दूसरे पाप करने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सत्य बोलता है, तो उसे तपस्या की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि सत्य-वाचन सबसे बड़ी तपस्या है। यदि मन पवित्र है, तो तीर्थों की आवश्यकता नहीं, क्योंकि पवित्र-मन ही श्रेष्ठ तीर्थ है।


यदि कोई व्यक्ति सज्जन है, तो उसे आत्मीयों की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसके स्वभाव के कारण सभी लोग उसके अपने हो जाते हैं। सुयश वाले व्यक्तियों को किसी आभूषण की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि सुकीर्ति ही सबसे बड़ा आभूषण है। विद्यावान् को धन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्। जिनके पास अपयश होता है, वह तो जीवित होते हुए भी मृत के समान ही होता है।

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सादर
सपन

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

अज्ञः सुखं आराध्यः

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति।।नीति.4।।


(अज्ञः सुखं आराध्यः, विशेषज्ञः सुखतरं आराध्यते, ज्ञानलवदुर्विदग्धं च तं नरं अपि न रञ्जयति)

अर्थात् अज्ञानी को सरलता से समझाया जा सकता है, ज्ञानी को और भी अधिक सरलता से समझाया जा सकता है। जिसे आधा-अधूरा ज्ञान हो और वह स्वयं को विद्वान् माने, तो उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते।

इस संसार में तीन प्रकार के प्राणी होते हैं, एक अज्ञानी, दूसरा ज्ञानी यानी विशेषज्ञ और तीसरा अधकचरे ज्ञान से स्वयं को पण्डित मानने वाला। जो लोग अज्ञानी होते हैं, जिन्हें कुछ पता नहीं होता, उन्हें आप किसी बात को सरलता से समझा सकते हैं, क्योंकि अज्ञानता के कारण वह आपकी बात को एक अच्छे शिष्य की भाँति स्वीकार कर लेता है। जो ज्ञानी होते हैं, वे संकेतमात्र से ही किसी बात को सरलता से समझ लेते हैं। अतः उन्हें समझाने में कठिनाई नहीं होती। किन्तु अल्पज्ञानी जब स्वयं को विद्वान् मानने लगे, तो यदि उसे स्वयं ब्रह्मा भी कुछ समझाने का प्रयत्न करें, तो असफल हो जाते हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति का अहंकार उसे किसी भी विषय की समझ में बाधा उत्पन्न करता है। वह मात्र अपनी बात को ही प्रमाणित करने का प्रयास करता है और उसकी किसी दूसरे की बात को समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। दूसरे के प्रति वह श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं कर पाता है। अतः ऐसे व्यक्ति को समझाने का प्रयत्न व्यर्थ है।
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विश्वजीत सपन

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

एकाग्रचित्त

एको देवः केशवो वा शिवो वा,
एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।।नी.श.72।।

अर्थात् एक ही देवता हो, केशव चाहे शिव हो। एक ही मित्र, चाहे वह राजा हो या संन्यासी। एक ही निवास हो, चाहे वह नगर में या वन में। एक ही नारी हो, चाहे वह सुन्दरी हो अथवा कुरूप।

तात्पर्य यह कि व्यक्ति को स्थिर चित्त होना चाहिए और एक में ही मन को रमाना चाहिए। मन को कभी भटकने नहीं देना चाहिए। किसी एक ही देवता में मन रमाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। मित्रता स्थाई होनी चाहिए तब चाहे वह किसी सम्पन्न के साथ हो अथवा नहीं। साथ ही व्यक्ति को निवास का एक स्थान निश्चित करना चाहिए और एक ही स्त्री से सम्पर्क करना चाहिए। वस्तुतः यही चित्त की एकाग्रता है और मानव के लिये यही उचित माना गया है। भटकाव के अनेक साधन हैं, किन्तु प्रयास कर इन भटकावों से दूरी बनानी चाहिए।
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सादर नमन

शनिवार, 5 सितंबर 2015

हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व


    त्योहार का शब्दिक अर्थ है, जिस दिन कोई धार्मिक अथवा जातीय उत्सव मनाया जाये। इसके लिये पर्व शब्द का भी प्रयोग होता है। पर्व शब्द का सम्बन्ध शुभ मुहुर्तों, लग्नों अथवा क्षणों के योग से है। एकादशी, चतुर्दशी, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि पर्व कहे गये हैं। ऐसे अवसरों पर नदी स्नान, उपवास, पूजा आदि किये जाते हैं। उत्सव शब्द का अर्थ है ‘‘आनंद का अतिरेक’’। इस समय सामूहिक आनंद का अतिरेक देखा जाता है। तीज शब्द भी त्योहार का द्योतक बन गया है।

आदिकाल से ही भारतवर्ष में त्योहारों का महत्त्व रहा है। नाना प्रकार के त्योहारों से समाज की धार्मिक मान्यताओं का भी पता चलता है। ये त्योहार यूँ ही नहीं मनाये जाते, बल्कि इनके पीछे भी पौराणिक कथाओं की महत्ता रही है। एक समय था, जब ये जीवन का एक हिस्सा होते थे और मनोरंजन के साधन भी, किन्तु आज इस स्थिति में गिरावट की प्रतीति होती है, क्योंकि ढकोसलों, बाह्याडम्बरों ने इन्हें प्रभावित किया है। मानसिकता में भी परिवर्तन आये हैं और आस्था भी अर्थ-प्रधान होती दिखाई देती है। इसके बाद भी आज भी त्योहारों के हमारे जीवन में महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।


भारतवर्ष को त्योहारों का देश कहा जाता है। इसके पीछे दार्शनिक कारण छुपा हुआ है। असल में मानव दुःख अधिक पालता है और सुख के क्षणों को शीघ्र ही भूल जाता है। जब त्योहार आते हैं, तो मानव के जीवन में सुख के क्षण आते हैं। वह इस समय सारे दुःखों को भुलाकर आनंद की ओर उन्मुख होता है, जिस कारण उसके जीवन में सुख और प्रसन्नता का वातावरण आता है। अतः इस वातावरण को उनके जीवन में बारम्बार लाने के लिये ही अनेक त्योहारों की अवधारणा विकसित की गयी है। सभी त्योहार मानव-जीवन से सम्बधित हैं और हमारे जीवन में इनका सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व रहा है।


इन त्योहारों को हम निम्न वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।


1) धार्मिक त्योहार - शिवरात्रि, जन्माष्टमी, दीपावली, दशहरा, ईद, बकरीद आदि
2) सांस्कृतिक त्योहार - बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, होली, भाईदूज आदि
3) राष्ट्रीय त्योहार - स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती, एकता दिवस आदि
4) यादगार त्योहार - गाँधी पुण्यतिथि, राणा प्रताप जयन्ती, नेहरू जयन्ती, वाल्मीकि जयन्ती आदि।


विजयादशमी का दिन आपने काम-क्रोध आदि आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाने का दिन माना जाता है। दीवाली खुशियों का त्योहार है। भारतीय जीवन में नये संवत्सर का प्रारंभ चैत्र महीने से होता है और इसी दिन होली का त्योहार मनाया जाता है। सामाजिक दृष्टि से होली का अर्थ बीत गई बात से है और इसलिए इस आनंद का अनुभव किया जाता है, नयी शुरुआत के साथ। जन्माष्टमी और रामनवमी जैसे त्योहार श्रीकृष्ण और श्रीराम से जुड़े हैं। वहीं बसंत पंचमी में प्रकृति ऋतु को पावन कर सँवारती है। अनेक प्रकार के त्योहार हमारे जीवन में अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

  
ये सभी त्योहार हमारे जीवन का अंग हैं। ये न केवल हमारे जीवन को प्रेरित करते हैं, बल्कि हमें हमारे कर्तव्यों की याद भी दिलाते हैं। हमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा देते हैं। साथ ही हमें सुख प्रदान करते हैं। असल में ये हमारी परम्परायें हैं, जो हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को एक दिशा प्रदान करते हैं। इनका संदेश भाईचारा ही है। इनका संदेश ख़ुशी ही है।


विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 8 अगस्त 2015

प्रेम


‘‘प्रेम’’ एक साधारण शब्द है, किन्तु इसका प्रभाव मानव-जीवन में अत्यधिक है। प्रेम क्या है, इसे समझना आम मानव के वश की बात नहीं है, क्योंकि यह बहुत कुछ है और मानव जीवन के अंग-अंग में इसकी भूमिका रहती है। अनेक भावनायें हैं, जो इससे जुड़ी होती हैं। प्रेम का जीवन में कितना महत्त्व है, इस पर कहते-कहते जीवन बीत जायेगा। यही साध्य है और यही साधक भी। मानवीय एवं सांसारिक प्रेम से उठकर ईश्वरीय प्रेम तक का जीवन ही अपेक्षित है, किन्तु क्या यह संभव है? है तो कैसे? 

सर्वप्रथम तो जानने का प्रयास होगा कि प्रेम क्या है? यह मन में उपजा एक भाव है, जो समस्त प्राणियों के लिये होता है। इसमें ममता, स्नेह, दया आदि का मिश्रण स्वयमेव हो जाता है। इस प्रेम की कोई एक परिभाषा संभव नहीं। हर व्यक्ति इसे अपने ढंग से देखता है और समझता है। यह सुन्दर मानवीय गुणों में से एक माना जाता है, जिस पर सुखमय संसार की नींव टिकी होती है। इस प्रेम की व्याख्या सहज ही कठिन है, किन्तु समस्त साहित्य इसके संदर्भ में पटा पड़ा है।


आसक्तिगत प्रेम पर चर्चा की जाये, तो यह सच्चाई है कि चाहे कोई भी प्रेम हो, उसमें चाहना, कोई इच्छा अवश्य होती है। निःस्वार्थ प्रेम तो कुछ होता ही नहीं। ईश्वर से प्रेम में भी मुक्ति की आशा छुपी होती है। बात यही है कि साध्य क्या है? क्या वह सत्य-मार्ग स्थापित जन अथवा स्व-कल्याण है? क्या उससे किसी की कोई हानि तो नहीं हो रही है? यदि नहीं तो वह साध्य श्रेयस्कर है।


जीवन में और प्रकृति में प्रेम की महत्ता सर्वविदित है। पशु-पक्षी सभी प्रेम के भूखे होते हैं। आजकल का प्रेम नहीं, बल्कि वह प्रेम जो आदर्श है। वैसे आदर्श प्रेम भी एक कहन मात्र ही है। आदर्शता छुई नहीं जा सकती, उसके निकट पहुँचने का आग्रह अवश्य किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार आदर्श प्रेम का भी आग्रह अवश्य होना चाहिये। उसके निकट रहने और पहुँचने का प्रयास अवश्य करना चाहिये। समस्त प्राणियों को एक समान जानकर और मानकर यदि इस प्रेम का प्रदर्शन हो, तो यही आदर्श प्रेम की सीढ़ी है और उसके निकट जाने का सरल उपाय है। वह भी दिल से, बाह्यतः नहीं। कौन कितना लक्ष्य हासिल कर पाता है, यह व्यक्तिगत है, किन्तु प्रयास सभी को करना चाहिये। यही आज अपेक्षित है, इस समाज में, पूरे विश्व-समुदाय में। 

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विश्वजीत ‘सपन’

मंगलवार, 23 जून 2015

लघुकथा

उसकी आँखों का दर्द

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, जब उसने मेरी ओर मुड़कर नहीं देखा। झुंझलाहट में मैंने पैर पटके और लोकल ट्रेन के डिब्बे में चढ़ गया। मुझ पर झुँझलाहट इस भाँति हावी थी कि उस समय कोई भी कुछ कहता, तो संभवतः मैं झगड़ पड़ता। रास्ते भर उस घटना की सोच से उबर नहीं सका। घर पहुँचते ही अपनी पत्नी को सारी बातें बताई और अपने क्रोध को येन-केन-प्रकारेण शांत किया। शान्त मन आत्म-परीक्षण में सहायक होता है। तत्काल ही उसका निर्दोष मुखमण्डल मेरे समक्ष आ खड़ा हुआ।

‘बाबूजी, दो दिन से भूखा हूँ। एक दाना भी पेट में नहीं है।’ उसने गिड़गिड़ाकर मुझसे कहा था।


मुझे दया आ गई, परन्तु मैं अपनी आदर्शता से भटक न पाया। मैंने कभी यह निश्चय किया था कि किसी भी भिखारी को कभी पैसे नहीं दूँगा, बल्कि कुछ काम दूँगा और उस काम के बदले उसका मेहनताना उसे दूँगा।


‘काम करोगे?’ पूछा था मैंने।


‘कैसा काम?’ उसका मासूम चेहरा उतर गया।


‘काम के बदले, पैसे मिलेंगे। ऐसे नहीं।’ मैं तटस्थ था। मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के बाद उसका रहा-सहा उत्साह भी जाता रहा।


‘भीख क्यों माँगते हो? कुछ काम करो और अपनी मेहनत की कमाई खाओ।’ मेरे विचार को सुनकर वह बोला, ‘काम कौन देगा साहब? हम जैसों के लिये कोई काम नहीं होता।’


‘क्यों नहीं होता? चलो मेरे घर चलो। मेरे बगान में काम करो और दिन का पूरा मेहनताना लो, साथ में दो समय का खाना भी।’


उसने निराशा से मेरी ओर देखा। मैं अपने कथन पर अडिग था। वह कार्य नहीं करना चाहता था। उसके चेहरे से स्पष्ट था।


‘काम क्यों नहीं करना चाहते हो?’ पूछा मैंने, ‘काम तो पूजा है। कोई भी काम बुरा नहीं होता। यही समस्या है तुम लोगों की, भीख माँगने की लत-सी पड़ गई है। मुफ़्त में रोटी तोड़ने की आदत हो गई है। काम करो, पैसे पाओ और सिर उठाकर जीओ। इसमें क्या बुराई है?’


वह अब भी अविश्वास की दृष्टि से मुझे घूर रहा था। उसके मन में कोई बात अवश्य थी, जिसका उत्तर वह तलाश रहा था। मैं समझ गया कि वह काम करने को राजी नहीं होगा। अतः मैंने उसे जीवन के बारे में बहुत कुछ समझाया। पता नहीं उसे कितनी समझ आई, किन्तु मुझे लगा कि वह कुछ-कुछ विश्वास करने लगा था, किन्तु पूर्ण-विश्वास की कमी थी। मैं उस पर अपना क्रोध दिखाकर वहाँ से निकल पड़ा था।


दूसरे ही दिन मुझे मेरा मन भिन्ना गया। अखबार के प्रथम पृष्ठ पर ही एक ख़बर छपी थी कि एक व्यक्ति ने काम के बहाने अपने घर ले जाकर एक मासूम के साथ कुकर्म किया और उसे रात के अंधेरे में किसी अनजान स्थल पर छोड़ गया। पुलिस उस व्यक्ति की तलाश में है। शर्म से मेरा सिर झुक गया। मुझे अपने मानव होने पर ग्लानि होने लगी। उस मासूम की आँखों का दर्द मुझे स्वयं के दिल में महसूस हुआ। उसका अविश्वास सर्वथा उचित था। जब मानवीयता से विश्वास उठ जाये, तो किसी अनजान पर विश्वास कैसे होगा?


विश्वजीत ‘सपन’

बुधवार, 4 मार्च 2015

संयम




संयम

संयम अर्थात् स्व-नियंत्रण, हम सभी ने यह शब्द सुना है, किन्तु इसका अभाव अनेक लोगों में देखा जाता है। संयम खोने की स्थिति में ये पाँच प्रश्न हमारी सहायता कर सकते हैंः-

1.         क्या मैं क्रोधवश ऐसा कर रहा हूँ या किसी स्वाथ के वशीभूत अथवा किसी दवाब में?

2.         क्या मेरा निर्णय उचित एवं विधि-सम्मत है?

3.         क्या मेरे सगे-संबंधी इस कार्य से शर्मिन्दा होंगे?

4.         क्या मैं स्वयं को आइने में देखने के योग्य हूँ?

5.         आज से 20-30 वर्ष बाद मुझे पछतावा तो नहीं होगा?

संयम और आवेशित होना परस्पर विरोधी हैं। क्रोध संभावित संकट की प्रतिक्रिया ही है। यह बहुधा व्यक्ति की अपनी कुण्ठा के कारण होना संभावित है। यह कुण्ठा व्यक्तिगत प्रवृत्ति के कारण हो सकती है अथवा समाजगत, संस्थागत आदि कारणों से। व्यक्तिगत प्रकृति की कुण्ठा पुनः दो प्रकार की हो सकती है - स्व-घातक और पर-घातक।

इन कुण्ठाओं के अनेक कारक होते हैंः- अवेगशीलता, सामाजीकरण का अभाव, पूर्व में गाली-गलौच एवं आवेग का इतिहास, स्व-नियंत्रण का अभाव और बिखरे हुए सम्बन्ध आदि। अनेक विद्वानों ने और भी कारण बताये हैं और सच्चाई यही है कि ये सभी कारण हो सकते हैं, जैसे पावर, अहम्, दवाब, अभिवृत्ति, आत्म-सम्मान, चिंता, समस्या आदि।

स्व-नियंत्रण को उचित मात्रा में प्राप्त करने के लिये अनेक उपाय विद्वानों ने सुझाये हैं, परन्तु हम कुछ महत्त्वपूर्ण तकनीकों पर विचार कर सकते हैं।

1.         ध्यान-केन्द्रित करना - यह उपाय अत्यधिक सहायक सिद्ध होता है। यह मस्तिष्क को आराम देता है और शान्त करता है। शान्त मन स्वयंमेव स्व-नियंत्रण की ओर अग्रसर हो जाता है।

2.         अहम् का त्याग - अहम् मानव-व्यक्तित्व को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिसका त्याग स्व-नियंत्रण का एक सुन्दर मार्ग है।

3.         स्व-ज्ञान - स्वयं को अच्छी तरह से जानना। यह कठिन है, किन्तु सहायक है।

4.         नींद का ध्यान रखें - बहुधा हम कम नींद के शिकार होते हैं और यह हमारे व्यवहार को बदलने में सक्षम होता है।

5.         नियमित व्यायाम करें - व्यायाम से तन-मन दोनों की शुद्धि होती है और यह बहुत सहायक होता है।

6.         शौक़ या हॉबी - कुछ भी शौक़ हो, उसे न भूलें और अपना मन लगायें, जैसे गाना सुनना, लिखना-पढ़ना, बाग़वानी, खेल देखना-खेलना आदि।

7.         कारण-निदान - उन कारणों को जानना, जिनसे ऐसी परिस्थितियाँ बनती/आती हैं और उनके उपाय करना, स्वयमेव अथवा विशेषज्ञों की सहायता से।

8.         दवाब की परिस्थितियों से दूरी - अनेक बार कुछ विशेष परिस्थितियाँ कारण बनती हैं, तो उनसे यथासंभव दूरी बनाकर रखना।

उपाय भी अनेक हैं और कारण भी अनेक हैं, आवश्यकता है चाह की। जहाँ चाह वहाँ राह की उक्ति इस दिशा में सवोत्तम उपाय के रूप में मानें, तो अत्युत्तम होगा।
विश्वजीत ‘सपन’