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बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोटबंदी पर एक नज़र



8 नवंबर 2016 को हज़ार और पाँच सौ के नोटों को बंद कर दिया गया। देश एकबारगी सकते में आ गया। प्रारंभ में बहुत से लोगों को समझ नहीं आया कि हुआ क्या? धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि यह एक प्रयास है, काला धन समाप्त करने, नकली नोटों के व्यापार को ठप्प करने, धन छुपाने वालों को हमेशा के लिये नेस्त-नाबूद करने, आतंकी एवं अतिवादियों के धन को ठिकाने लगाने और हवाला धन को समाप्त करने आदि का।  

देशव्यापी चर्चायें आरंभ हो गयीं। नेता, अफ़सर, मीडिया सभी वाद-विवाद में उलझ गये। नोटबंदी के समर्थन में और विरोध में बातें होने लगीं। आम जनता कतारों में उलझ गयी और प्रतिदिन कुछ न कुछ ऐसा होने लगा कि आम आदमी के लिये समझना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में आज पन्द्रह दिनों के बाद क्या स्थिति बनी है, इस पर विचार आवश्यक हो जाता है।


आज से पूर्व भी लगभग अड़तीस साल पहले 1978 में नोटबंदी हुई थी। तब भी आम जनता को परेशानी हुई थी, लेकिन तब मीडिया इतना सक्रिय नहीं था। लोग बहुत सी बातें जान नहीं पाते थे, लेकिन आज मिनटों में ही ख़बर हमारे सामने होती है, अतः परिस्थितियाँ भिन्न हैं।


एक बात जो सर्वप्रथम सामने आयी कि कालाधन कितना प्रतिशत है? अत्यधिक है, किन्तु देश में नहीं, बल्कि विदेशों में। कहते हैं कि विदेशी बैंकों में भारत का इतना काला धन है, जो सभी देशों के काला धन से भी अधिक निकलता है। स्वर्ण पदक भारत का होता यदि ओलम्पिक होता। ख़ैर भारत में कितना है? इस पर सवाल उठ रहें हैं और सहमति नहीं है। नोटबंदी के कारण 14 लाख करोड़ धन बेकार हो गया। इसका यदि 2 प्रतिशत भी काला धन भारत में है, तो 2.80 लाख करोड़ काला धन समाप्त हो जायेगा। यदि यह अधिक है, तो हम अनुमान लगा सकते हैं।


उधर यह भी सुनने में आ रहा है कि इन काला धन वालों ने अनेक तिकड़म लगाकर अपने धन को सुरक्षित कर लिया है। किसी ने अपने सगे-संबंधियों के नाम पर, तो किसी ने अपने मजदूरों के नाम पर तो किसी ने ऐसे ही अनेक लोगों के नाम पर धन बैंक में जमा करवाये। किसी ने रेल टिकट लिया तो किसी ने हवाई जहाज का, जिसे कल रद्द करके उन्हें सफेद किया जा सकेगा। किसी ने संपत्ति खरीद ली तो किसी ने सोना खरीद लिया। फिर कितना प्रतिशत काला धन उजागर होगा, यह भी प्रश्नचिह्न ही है।


सभी जानते हैं हर छोटा-बड़ा व्यापारी नगद में ही व्यापार करता है और देश के कर की चोरी भी करता है। उसके लिये तो समय रुक गया है मानो। ठीक है वह बैंक में पैसे जमा कर अपने पैसे बचा सकता है, किन्तु उन्हें झटका आवश्य लगेगा। हाँ इस प्रकार देश की आमदनी बढ़ेगी और देश समृद्ध होगा। इसी के साथ नगद व्यापार का पत्ता भी साफ हो जायेगा और देश कैशलेस समाज की ओर क़दम बढ़ायेगा। यह एक बहुत ही सुन्दर और लाभकारी क़दम माना जाना चाहिए।


एक प्रश्न जो सभी को चिंतित कर रहा है कि कालाबाज़ारी रोकने के लिये 500 और 1000 के नोट बंद करने पड़े, तो 2000 के नोट लागू करने से इस पर किस प्रकार रोक लगायी जा सकती है? क्या कुछ समय बाद इसे पुनः बंद करने का विचार है? पुनः 500 के भी नये नोट आये, तो 1000 के भी नोट आते तो क्या होता? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं। समय ही बता पायेगा कि सरकार की मंशा क्या थी!


कल मैं विशाखापट्टणम् के एक एटीएम में गया, कोई भीड़ नहीं थी। पहली बार 2000 के दर्शन किये। तब मैंने लोगों से पूछा कि हर जगह हल्ला है कि इतनी भीड़ है कि लोग पैसे नहीं निकाल पा रहे, जबकि यहाँ तो मामला ही उल्टा है। तब वे कहने लगे कि पैसे लेने वालों की भीड़ नहीं है, बल्कि पैसे बदलवाने वालों की भीेड़ है, बैंक में। उधर उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति एटीएम के बाहर कुचल कर मर गया। अजीब माहौल है। सच्चाई पर अभी भी परदा पड़ा है। क्या सच में लोग परेशान हैं अथवा परेशानी का बहाना कर रहे हैं। क्या कुछ वृद्धों की मृत्यु बीमारी के कारण नहीं होती है? क्या यह इतनी बड़ी बात है कि उछाला जाये?

कतार में कुछ लोगों की मौत, किसी बड़े उद्यमी का कतार में न खड़ा होना, ग़रीब जनता की दुहाई देना, चंद राजनीतिक पार्टियों द्वारा नकारात्मक कथन देना, सोशल मीडिया में दुष्प्रचार आदि न जाने कितने सवाल हम सभी के समक्ष हैं और कुछ बातें डर उत्पन्न कर रही हैं, जैसे आज एक आतंकवादी के पास से 2000 के नोट का मिलना, एटीएम में पैसे रखने वालों के द्वारा लाखों की चोरी (अभी पता चला है कि जो एजेंसी एटीएम में पैसे रखती है, उनके आदमी एटीएम में पूरा पैसा नहीं रखते और अपने पास जमा करके उससे पैसे बना रहे हैं। अभी आन्ध्र प्रदेश में ऐसे ही व्यक्तियों से दो केस में 15.50 लाख एवं 19.50 लाख बरामद हूआ है।) उधर किसी एक व्यक्ति के पास से 16.50 लाख का 2000 का नया नोट मिलना आदि। ये सभी कुछ संकेत दे रहे हैं।

उधर एक बात समझ नहीं आयी कि मात्र 2000 रुपये से एक आम आदमी का कार्य कैसे चलेगा? एक बड़े शहर में कोई व्यक्ति पच्चीस-तीस हज़ार से कम में महीना नहीं बिता सकता, तब प्रतिदिन कम से कम एक हज़ार बैठता है। दूध वाला, सब्ज़ी वाला, पेपर वाला, कूड़े वाला सभी पैसे की माँग करेंगे। बिजली-पानी का बिल और अनेक प्रकार की बातें हैं। तब इतना कम धन कैसे कार्य कर पायेगा?
 

इसके बाद भी जनता सरकार के साथ दिख रही है, क्योंकि वह तंग है। उसे देश को बदलने की इच्छा है। वह चाहती है कि कड़े से कड़े क़दम उठाये जायें, ताकि कालाबाज़ारी आदि पर रोक लगे। लेकिन इसके बाद भी कुछ प्रश्न सामने खड़े हैं।

क्या निर्णय शीघ्रता में लिया गया? क्या सरकार की तैयारी में कमी रही? क्या यह उचित लाभ लायेगा? क्या देश का भविष्य सुधरेगा? और ऐसे ही अनेक प्रश्न भी समक्ष हैं।

सादर
सपन

रविवार, 18 सितंबर 2016

आस्था

क्या बिना आस्था के जीवन संभव नहीं?

बहुत ही सुन्दर एवं दार्शनिक प्रश्न है। आस्था अथवा कोई भी विचार वातावरण से प्रेरित होता है। पृथ्वी पर अनेक ऐसे समाज हैं, जहाँ ईश्वर की मान्यता नहीं है। तब आस्था का भी प्रश्न नहीं उठता। यदि हम केवल ईश्वरीय आस्था की ही बात करें तो। अतः जीवन तब भी संभव है। फिर इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? 


मानवीय भावनाओं को सहज ही नियंत्रित करना कठिन होता है। इसके लिये अनेक उपाय किये जाते रहे हैं। इसके नियंत्रण हेतु एक उपाय आस्था भी है, ताकि जीवन की कठिनाइयों का सामना उचित तरीके से किया जा सके। आस्था मानव को एक विश्वास देता है और ऊँची चढ़ाइयों को भी आसानी से पार करने में सक्षम हो जाता है। 


ऐसा देखा गया है कि बड़े से बड़े भक्त भी मुसीबत आने पर, शारीरिक अथवा मानसिक परेशानियाँ आने पर तत्काल ही दोष उसी ईश्वर पर डाल देते हैं, जिनकी पूजा वे वर्षों से करते चले आ रहे हैं। यह आस्था की असमझ ही है। न केवल बुरा करना, बल्कि बुरी सोच का मन में आना भी वर्जित है, तब कर्म-फल को उस समय कैसे भूला जा सकता है? स्वयं श्रीकृष्ण एवं श्रीराम को भी मानवीय अवतार के समय संतापों से गुज़रना पड़ा था, तब हम मनुष्य की बिसात ही कितनी है?
किसी भी आपात स्थिति में हमारी आस्था डगमगाने लगती है। ऐसा इसलिये क्योंकि हमारी आस्था की डोर निर्बल होती है। साथ ही उसमें स्वार्थ भी शामिल होता है और इसलिये जब तक हमारे लिये अच्छा होता है, हमारी आस्था बनी रहती है। जैसे ही कुछ बुरा हुआ, तो हम उन्हें दोष देने लगते हैं। यह आस्था नहीं है। अर्थात् आस्था निःस्वार्थ हो, तो टूटती नहीं है, बल्कि इसको यूँ कहें कि आस्था में स्वार्थ की भावना आई तो वह आस्था रहेगी ही नहीं।


वैचारिक मनुष्य जीवन को उथले स्तर पर न जी सकता है और ही निर्वाह कर सकता है। अतः दर्शन की उत्पत्ति हुई। आस्था में स्वार्थ छिपा है तो वह आस्था नहीं रही। यह अलग बात है कि स्वार्थ क्या है, इसे भी परिभाषित किया गया है। प्रस्तुत विषय में यदि झाँकें, तो स्पष्ट है कि विकट परिस्थितियों में मानव-मन सहसा विकार-युक्त हो जाता है, जो मानवीय दुर्बलता है। अतः दोष आस्था की भावना अथवा आस्था का नहीं, बल्कि मानवीय दुर्बलता का है कि वह यह नहीं समझ पाता कि जो हो रहा है, वैसा होना निश्चित है और होकर रहेगा। किसी पर दोष देने से टलेगा नहीं। 


हाँ पूजा-पाठ आदि का संबंध डर से है। प्रकृति की पूजा का मन में प्रवेश उनसे होने वाली हानि का डर भी था और उनसे मिलने वाले लाभ के कारण भी। वह आज भी है कि यदि आपने कुछ अनुचित किया तो ईश्वर दण्ड देंगे। यह हमारे मन में रहता है और आज का समाज अधिक कर्मकाण्डों में चला गया है, अधिक पूजा होने लगी है, अधिक मंदिर-मस्जिद बनने लगे हैं। जहाँ एक ओर प्रतियोगिता का भाव है, वहीं दूसरी ओर अनुचित कर्म के फल का डर भी है।


मेरा व्यक्तिगत मत है कि आस्था के कभी क्षीण होने का प्रश्न ही नहीं है। यदि नियति ने कुछ लिखा है, तो उसका कारण अवश्य है और उसे होना ही है। हम अपने अच्छे आचरण एवं कर्मों से कुछ भरपाई अवश्य कर सकते हैं और कुछ हद तक आने वाली मुसीबतों से छुटकारा भी पा सकते हैं, किन्तु नियति को बदलने का निर्णय मात्र परमपिता परमेश्वर का ही होता है। अतः जो हो रहा है, वह किसी अच्छे के लिये ही हो रहा है, इसी विश्वास के साथ अपनी आस्था की डोर को मजबूती से पकड़े रहना चाहिये।


मानवीय जीवन में मृत्यु एक सत्य है। जो भी प्राणी अथवा वस्तु जन्म लेगा, उसकी मृत्यु अटल है। मात्र यह पता नहीं कि कब और कैसे? इस ज्ञान का होना आवश्यक है, ताकि आस्था की डोर कच्ची न रह पाये। सांसारिक व्यवस्था में मृत्यु का डर अथवा कठिनाइयों की मार हमारी आस्था की डोर को निर्बल बनाती है। कोई भी प्राणी मृत्युंजय नहीं बन सकता, तब किसी अन्य पर दोष डालना ही अनुचित है। संवेदनशीलता अलग वस्तु है, उसे जीवन-सत्य के ज्ञान से जोड़ना भूल है। वैचारिक मन को स्थिरता देना मानवीय कर्तव्य है। इसी स्थिरता से आस्था यथावत् बनी रहती है। 


यह सत्य है कि जीवन वह नहीं है, जो किताबों में वर्णित है। यह एक कठिन कला है और इसे सुचारु रूप से चलाने के लिये मन को स्थिर करना पड़ता है। आस्था हो अथवा विश्वास - कभी न कभी बिखरता है, क्योंकि हम मानव हैं और मानवीय संवेदनाओं के अधीन हैं। यदि नहीं होते तो स्वजन की मृत्यु पर दुःख कदापि नहीं होता। अतः सोच को जागृत करने की आवश्यकता है कि क्या है और क्यों है?

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विश्वजीत ‘सपन’

रविवार, 26 जून 2016

अलंकार का साहित्य में महत्त्व


-----------------------------------------विश्वजीत ‘सपन’



‘‘अलंकरोति इति अलंकारः’’ अथवा ‘‘अलंक्रियते अनेन सः अलंकारः’’ अर्थात् अलंकार शोभा बढ़ाने का कार्य करता है अथवा जिसके द्वारा शोभा बढ़ाये जाने का कार्य सम्पादित होता है, वह अलंकार है। ‘‘काव्यादर्श’’ नामक सुप्रसिद्ध काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ के रचयिता आचार्य दण्डी ने अलंकार की परिभाषा देते हुए कहा है - ‘‘काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते’’। कहने का तात्पर्य यह है कि काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म ही अलंकार होते हैं। 
 

काव्य में अलंकारों के महत्त्व को लेकर अत्यधिक चर्चायें हुई हैं और मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि इस संदर्भ में आज भी विवाद हो रहे हैं कि अलंकारों का काव्य में क्या स्थान है अथवा इसकी क्या महत्ता है। कुछ विद्वान् इसे काव्य का नित्यधर्म मानते हैं और कुछ अनित्यधर्म। इसको नित्यधर्म मानने वाले भगवान् व्यास देव ने ‘‘अग्निपुराण’’ में कहा - ‘‘अर्थालंकार-रहिता विधवैव सरस्वती।’’ अर्थात् अर्थालंकारों के बिना सरस्वती विधवा के समान है।
 

इस पर आगे चर्चा की जायेगी, किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अलंकार काव्य के लिये यदि अपरिहार्य नहीं हैं, तो भी एक अत्यन्त ही आवश्यक तत्त्व अवश्य ठहरते हैं। जिस प्रकार आभूषण धारण करने से किसी रमणी की शोभा बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार अलंकारों से काव्य की शोभा बढ़ जाती है।
 

काव्य में अलंकारों का उपयुक्त स्थान निर्धारित करने में तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है -
 

(1) अलंकारों का प्रयोग शोभा बढ़ाने का साधन है, साध्य नहीं। तात्पर्य यह कि अलंकारों का प्रयोग करना कवि का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। केवल इस कारण प्रयुक्त अंलकार बोझिल, क्लिष्ट और अस्पष्ट वाणी बन जाते हैं।
(2) अलंकार प्रकृति सौन्दर्य की ही शोभा बढ़ाते हैं। तात्पर्य यह कि यदि काव्य स्वयं काव्यगुण से रहित हों, तो अलंकार उसकी शोभा नहीं बढ़ा सकते। अंग-भंग अथवा शारीरिक सौन्दर्य के अभाव में आभूषण रमणी की शोभा नहीं बढ़ा सकते।
(3) अलंकार का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। कृत्रिम या अस्वाभाविक रूप से प्रयुक्त अलंकार काव्य की शोभा नहीं बढ़ा सकते।
 

तात्पर्य यह है कि काव्य में अलंकारों का महत्त्व उसी सीमा तक है, जब तक अलंकार काव्य के प्रकृत सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक हों। यदि काव्य में अंलकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होता है, तो यह काव्य के सौन्दर्य और प्रभाव में वृद्धि करता है। यह स्वाभाविक क्या है? स्वाभाविक रूप से कहने के तात्पर्य को समझना होगा। यह साधारण स्वाभाविक रूप नहीं है, अपितु काव्य की शैली में स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त के लिये है। जब कोई काव्य रचना करता है, तो कहन की महत्ता होती है, काव्य-गुणों की महत्ता होती है। एक युद्ध की विभीषिका का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण स्वाभाविक होता है और तभी पाठक पर प्रभाव छोड़ता है। प्रिया के मुख की चाँद से उपमा कोमल भावों को उत्पन्न करती है। पाठक के मन को हर्षित करती है यह उपमा। यह स्वाभाविक प्रयोग ही होता है।
 

‘‘हिन्दी रीति साहित्य’’ नामक पुस्तक में जो राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली एवं पटना द्वारा प्रकाशित है, उसमें डॉ भगीरथ मिश्र अच्छी व्याख्या करते हैं और कई बातों को संक्षेप में समेट लेते हैं कि आचार्य दण्डी और आचार्य भामह ने अलंकार को अत्यधिक महत्त्व दिया है। दण्डी का यह कहना कि ‘‘काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते’’ अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले सभी धर्म अलंकार हैं, न केवल उन्होंने उक्ति चमत्कार को बल्कि काव्य के समस्त सौन्दर्य को इसमें समेट लिया है, अतः रसादि भी इसके अन्तर्गत हैं और स्वभावोक्ति भी। गुण और अलंकार का भेद दण्डी ने नहीं किया। इसका भेद स्पष्ट करने वाले आचार्य वामन हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘‘काव्यालंकार सूत्र’’ में लिखा है - ‘‘काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्माः गुणाः। तदतिशय हेतवत्स्वलंकाराः।।’’ तात्पर्य यह कि आचार्य वामन ने गुण और अलंकार में भेद माना कि गुण काव्य शोभा के उत्पादक धर्म होते हैं और अलंकार उसको बढ़ाने वाले होते हैं। यहाँ इसके कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि एक रूपवान् रमणी आभूषण पहनती है तो उसका सौन्दर्य और बढ़ जाता है, जबकि यदि कोई कुरूप या वृद्ध या अंग-भंग वाली रमणी आभूषण पहनती है, तो हँसी का पात्र बनती है। कहने का तात्पर्य यह है कि काव्य गुण से विहीन नहीं हो सकता, चाहे वह अलंकार से विहीन हो जाये। अर्थात् काव्य के लिये उसके गुणों का होना आवश्यक है।
 

कालक्रम से इसके बाद काव्य के गुण एवं अलंकार पर कहने वाले आचार्य दण्डी, आचार्य भामह और आचार्य वामन के बाद एक आचार्य आते हैं - भट्टोद्भट। वैसे इनकी कोई कृति प्राप्त नहीं होती, किन्तु अनेक स्थानों पर इनका उद्धरण मिल जाता है। रुय्यक ने ‘‘अलंकार सर्वस्व’’ में लिखा कि ‘‘उद्भट ने तो गुणों और अलंकारों का प्रायः साम्य ही बतलाया है। केवल विषय की दृष्टि से भेद किया गया है।’’ विश्वनाथ कृत ‘प्रतापरुद्र यशोभूषण’ की रत्नापण टीका में भी उद्भट का मत दिया गया है ‘‘चारुत्व होते हुए भी गुणों और अलंकारों का भी आश्रय भेद से भेद बतलाया जाता है। गुण संघटनारित होते हैं और अलंकार शब्द तथा अर्थ के आश्रित।’’ प्रथमतः तो उद्भट गुणों और अलंकारों में भेद मानते ही नहीं है, किन्तु यदि भेद करना ही अभीष्ट हो तो वे इतना भेद मानते हैं कि अलंकार या तो केवल शब्द के होते हैं या या केवल अर्थ के, जबकि गुण इन दोनों को मिलाकर होते हैं। अलंकारों को आश्रय केवल शब्द और अर्थ है जबकि गुणों का आश्रय संघटना है।
 

गुण और अलंकार के भेद में उद्भट के बाद आनन्दवर्धन का नाम आता है। इन्होंने ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना कर रस को काव्य आलोचना का मेरुदण्ड बना दिया। इन्होंने गुण एवं अलंकार का भेद भी रस की दृष्टि से किया। वे कहते ‘ध्वन्यालोक’’ में हैं -
 

तमर्थमवलम्बते येंऽगिनं ते गुणाः स्मृताः।
अंगाश्रितास्त्वलंकाराः विज्ञेया कटकादिवत्।।
 

अर्थात् गुण वे माने जाते हैं, जो रसरूप उस अंगी का आश्रय लेते हैं और अलंकार कटकादि के समान अंगाश्रित ही माने जाने चाहिए। वे कहते हैं कि गुण सीधे रसाश्रित होते हैं और अलंकार शब्द और अर्थ में सौन्दर्य का आधान कर रसोत्कर्ष में हेतु बनते हैं। इन्होंने गुण को काव्य की शोभा को माना और उसके लिये अलंकार माना।
 

अतः यहाँ आचार्य दण्डी का विरोध दिखाई देता है। विभिन्न सम्प्रदायों के विकास के बाद अलंकार का स्थान गौण हो गया। और आचार्य मम्मट ने तो काव्य की परिभाषा में ही ‘‘तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’’ कह कर काव्य से अलंकार की अनिवार्यता ही हटा दी। बाद में आचार्य मम्मट की इस परिभाषा का विरोध भी हुआ और जयदेव, अप्पय दीक्षित, विद्याधर आदि ने पुनः अलंकार की पुनः प्रतिष्ठा की। जयदेव ने ‘‘चन्द्रालोक’’ में स्पष्ट घोषित किया और अलंकार को काव्य का नित्यधर्म माना है।
 

अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।।
 

अर्थात् जो व्यक्ति काव्य को अलंकार से रहित स्वीकार करता है, वह अग्नि को उष्णतारहित क्यों नहीं कहता। तात्पर्य यह कि अलंकार काव्य का आधारभूत गुण है।
 

जबकि इसके विरोध में आनन्दवर्धन कहते हैं -
 

तमर्थमवलम्बते येंऽगिनं ते गुणाः स्मृताः।
अंगाश्रितास्त्वलंकाराः विज्ञेया कटकादिवत्।।
 

अर्थात् गुण वे माने जाते हैं, जो रसरूप उस अंगी का आश्रय लेते हैं और अलंकार कटकादि के समान अंगाश्रित ही माने जाने चाहिए। वे कहते हैं कि गुण सीधे रसाश्रित होते हैं और अलंकार शब्द और अर्थ में सौन्दर्य का आधान कर रसोत्कर्ष में हेतु बनते हैं।
 

किन्तु जयदेव की अलंकार की इस धारणा को बाद के रीति कवियों ने अपनाया। केशव की धारणा भी अलंकार के विषय में व्यापक थी।
 

उधर आचार्य हेमचन्द्र तथा आचार्य विश्वनाथ दोनों ने ही अलंकार को अंगाश्रित माना है।
 

हेमचन्द्र ने ‘‘अंगारितास्तवलंकाराः’’ कहा है, जबकि विश्वनाथ ने ‘‘शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशयिनः’’ कहकर अलंकार को अस्थिर धर्म बताया है और काव्य के लिये आवश्यक नहीं माना है।
 

इसमें कोई संदेह नहीं कि अलंकारों के काव्य में स्थान को लेकर विवाद होते रहे हैं। अनेक आचार्यों ने काव्यशरीर, उसके नित्यधर्म तथा बहिरंग उपकारक का विचार करते हुए अलंकार के महत्त्व को देखने का प्रयास किया है। अतः गुण, रस, ध्वनि आदि के प्रसंग में विचार किया जाता है। कुछ लोग इसे काव्य के नित्यधर्म के रूप में देखते हैं, तो कुछ लोग अनित्यधर्म के रूप में। विशेषकर रस को काव्य की आत्मा मानने वाले अलंकार को गौण मानते हुए अनित्यधर्म मानते हैं।
 

एक विशेष बात पर गौर करना होगा कि किस प्रकार दण्डी एवं मम्मट के मत में विरोध झलकता है। काव्यप्रकाश का प्रथम सूत्र है - ‘‘तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’’ आचार्य मम्मट के अनुसार यह काव्य का लक्षण है। इसमें सबसे पहली बात यह है कि शब्द और अर्थ दोनों की समष्टि को काव्य कहते हैं। इसमें ‘शब्दार्थौ’’ शब्द के तीन विशेषण लक्षण में प्रस्तुत किये गये हैं - 1. अदोषौ, 2. सगुणौ एवं 3. अलंकृती पुनः क्वापि। अर्थात् पहली बात है कि वे शब्द और अर्थ दोषरहित हों, दूसरी बात है कि वे ‘सगुण’ यानी माधुर्य आदि गुणों सहित हों और तीसरी बात यह कि साधारणतः वे अलंकार सहित हों, किन्तु जब रसादि की प्रतीति हो रही हो तो अलंकार न भी हो, तो काम चल सकता है। यदि इसे दण्डी की अलंकार की परिभाषा के साथ तुलना करें तो दण्डी कहते हैं ‘‘काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते’’ अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले सभी धर्म अलंकार हैं। यहाँ यही अंतर है कि जहाँ दण्डी अलंकार को काव्य का नित्य धर्म मानते हैं और आवश्यक मानते हैं, वहीं मम्मट उसे अनित्य धर्म मानते हैं यानी आवश्यक नहीं।
 

अलंकार के स्थान को लेकर वाद-विवाद पर एक दृष्टि डालें, तो एक ओर दण्डी, व्यास, वामन आदि थे, तो दूसरी ओर मम्मट, रुय्यक, उद्भट आदि। फिर रीतिकालीन कवि आये और ध्वनिवादी भी। इसके बाद भी मुझे यह कहते हुए संदेह नहीं होता कि अलंकार की आवश्यकता काव्य में अनिवार्य ही दिखती है। जब काव्यप्रकाश में आचार्य मम्मट ने एक उदाहरण दिया कि उक्त श्लोक में कोई अलंकार नहीं है, तब आचार्य विश्वनाथ ने उसमें ‘विभावना’ एवं ‘विशेषोक्ति’ अलंकार को खोजने का प्रयास किया। अब यह किसी दुर्भावना से था अथवा नहीं इस पर विवाद किया जा सकता है, किन्तु दर्शनीय बात यह है कि काव्य में अलंकार ढूँढे जा सकते हैं। अलंकारों की संख्या इतनी अधिक है कि कोई न कोई अलंकार लेखन में स्वतः आ जायें, यह संभव है। तब अलंकार का स्थान काव्य में स्वतःसिद्ध हो जाता है। ऐसा भी संभव है कि कहीं कोई अलंकार न हो, किन्तु अलंकार की संभावना ही अधिक दिखती है।
 

अलंकार के प्रेरक क्या होते हैं? इसे समझने के लिये अलंकार के कई अंगों को स्पर्श करना होगा। प्रथमतः अलंकार है क्या? जैसे मानव-शरीर स्वतः सुन्दर होता है, किन्तु उसके सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये आभूषणादि का प्रयोग किया जाता है, ठीक उसी प्रकार काव्य के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये ही अलंकारों का प्रयोग किया जाता है। तब काव्य में शोभा बढ़ाने वाले धर्मों का समावेश होता है या उनका प्रयोग होता है, तो वे कुछ मूल प्रेरणाओं पर आधारित होते हैं। जैसे
 

(1) आन्तरिक उत्साह की अभिव्यक्ति
(2) मनुष्य की चिरकाल से चली आ रही सौन्दर्य-प्रियता की भावना।
(3) एक ही बात को अनेक प्रकार से कहने का ढंग, जिसके द्वारा सुनने वाले के मन में चमत्कार की सृष्टि हो।
 

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि अलंकार काव्य की शोभा है। उचितानुचित का विचार करके काव्य में यदि अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से होता है, तो यह काव्य के सौन्दर्य और उसके प्रभाव में  वृद्धि करता है। यदि अस्वाभाविक रूप से अथवा केवल अलंकार देने की मंशा से अलंकार काव्य में ठूसे गये हों, तो वे बोझिल, क्लिष्ट और अस्पष्ट हो जाते हैं। इसे काव्य का अनिवार्यतः आवश्यक तत्त्व कहा जाये अथवा नहीं, इस पर विवाद बना रहेगा, किन्तु इसकी उपयोगिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है।
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विश्वजीत ‘सपन’

शनिवार, 18 जून 2016

एकल परिवार बनाम संयुक्त परिवार


विषय बहुत ही सुन्दर एवं प्रासंगिक है। भारत ग्राम-प्रधान देश रहा है और संयुक्त परिवार की अवधारणा प्रचीन काल से चली आ रही है। किन्तु आज का युग इच्छा-अनिच्छा से एकल परिवार का है। शहरी तो शहरी, यहाँ तक कि ग्रामीण वातावरण में भी संयुक्त परिवार विघटन के दौर से गुज़र रहा है। ऐसे में इनके गुणों एवं अवगुणों को देखने की आवश्यकता नज़र आती है। सर्वप्रथम हम एकल परिवार के गुणों को देखें और सकारात्मक सोच के साथ देखें, तो ये गुण हमारी दृष्टि में आते हैं - 


1.    यह इंसान को स्वावलंबी बनाता है।
2.    परिवार में अत्यन्त घनिष्ठता का बीज बोता है, जिसके कारण माता-पिता एवं बच्चों में भाव-बंधन बहुत गहरा होता है।
3.    यह बच्चों को भी स्वावलंबी बनने का अवसर प्रदान करता है।
4.    मुखिया को उत्तरदायित्व का भान जीवन के प्रारंभिक चरण में हो जाता है।
5.    विचारों की स्वतंत्रता रहती है और जीवन को अपनी शर्तों पर जीने का अवसर मिलता है।
6.    जीवन को व्यवस्थित करने का सुअवसर होता है।
7.    चुनौतियों को सामना करने के अवसर से व्यक्ति में जीवन के प्रति आत्म-विश्वास आता है।
8.    दूसरों पर निर्भरता कम होती है।
9.    पति-पत्नी के बीच में संबंध गहरा होता है और एक-दूसरे के प्रति समझ का अधिक अवसर रहता है। दोनों में एकजुटता से परिवार चलाने का अवसर होता है। छोटी-छोटी ख़ुशियों से आपस में गहरा संबंध बनने का अवसर रहता है।
10.    जीवन को देखने के दृष्टिकोण में बहुत बड़ा परिवर्तन आता है।


अब हम संयुक्त परिवार के लाभों की गणना करें, तो निश्चय ही हमें बहुत सारे गुणों को देखने को मिलता है।


1.    यह टीम भावना को जागृत करने का सुन्दर अवसर प्रदान करता है।
2.    आपसी मेल से चुनौतियों का सामना सरलता से संभव है।
3.    एक-दूसरे का बल और संरक्षण रहता है।
4.    बच्चों को अच्छे संस्कार मिलने के अधिक अवसर होते हैं।
5.    कभी एकाकी होने का अवसर नहीं होते, तो मानसिक रूप से बाधा आने के अवसर भी कम रहते हैं।
6.    अनुभवी वृद्धों से जीवन के अनुभवों को प्रारंभ से जाना-समझा जा सकता है।
7.    बच्चों का लालन-पालन सरल एवं सहज हो जाता है। उन पर दृष्टि रखने वाले अनेक लोगों के होने से उनके बिगड़ने का ख़तरा कम रहता है।
8.    एक-दूसरे से, परिवार के सदस्यों से, समाज आदि से सहयोग की भावना का विकास होता है।
9.    जीवन को सरलता से जीने का अवसर रहता है। एक-दूसरे के सहयोगी की आशा रहती है। कठिनाइयों को सहयोग से सामना करने का भरोसा रहता है।
10.    अनुभवों की सीखों से जीवन सरल हो जाता है।


आज के इस युग में एकल परिवार का सबसे बुरा प्रभाव माता-पिता पर पड़ता है। वे एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिये शापित हो जाते हैं। बेटा और उनका परिवार जीविका की तलाश में दूर कहीं चले जाते हैं और ये उनके साथ नये माहौल में रह नहीं पाते। दुःखद है, किन्तु युग की सच्चाई भी है।
एकल परिवार के कुछ अवगुणों की ओर चलना चाहता हूँ। बहुत हैं, किन्तु कुछ को रेखांकित करने का प्रयास करता हूँ।


1.    कठिनाइयों में एकाकीपन का बोझ गहरा होता है। कोई विचार साझा करने वाला भी नहीं होता। देखने वाले तो नहीं ही होते हैं।
2.    बच्चों की देखभाल में कमी रह जाती है। जैसा कि ऊपर भी बताया गया है, अतः इस अधिक कुछ नहीं कहूँगा।
3.    घर की सुरक्षा में छेद हो जाते हैं। हमें कभी भी पूरा घर बंदकर जाना पड़ता है। कोई रहने वाला नहीं होता।
4.    व्यक्ति सीमित और स्वार्थी हो जाता है। अपने परिवार के अलावा उसे कुछ नहीं सूझता है।
5.    सामाजिक जीवन न के बराबर रह जाता है। सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
6.    बच्चों के बिगड़ने का भय बढ़ जाता है। उनकी देखभाल प्रभावित होती है।
7.    अनेक कार्य अनुभव की कमी के कारण अधूरे अथवा उचित तरीके से पूरे नहीं हो पाते हैं।
8.    सहायक हाथों की कमी से जीवन में कठिनता आती है। शिथिलता आती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
9.    पति-पत्नी यदि समझदारी से काम न लें, तो कलह को जन्म देते हैं और आपसी मतभेद बच्चों पर बुरा असर करते हैं।
10.    स्वतंत्रता, स्वच्छंता में परिवर्तित होते हैं और जीवन को अनुचित दिशा में ले जाते हैं।


एकल परिवार में लाख बुराइयाँ हों, किन्तु यदि वह आज की आवश्यकता अथवा विवशता है, तो उसे सकारात्मक लेने में ही भलाई है। भारतीय बहिर्मुखी होता है और वह सहजता से मित्रता कर लेता है। ये मित्र ही संयुक्त परिवार की भूमिका निभा सकते हैं और निभाते भी हैं। आवश्यकता है, परिस्थिति के अनुसार हमें ढल जाने की।


विश्वजीत 'सपन'

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

शस्त्रविहीन योद्धा किस काम का


हम सभी जानते हैं कि एक योद्धा के लिये अस्त्र-शस्त्र का कितना महत्त्व होता है। युद्धभूमि में बिना अस्त्र-शस्त्र के योद्धा का होना न होना समान ही कहा जायेगा। उसकी हार निश्चित है। उसका उपहास भी निश्चित है। ठीक उसी प्रकार मानव-जीवन में भी इसके महत्त्व को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। शस्त्र का तात्पर्य उन उपयोगी माध्यमों से है, जिनसे युक्त होकर ही कोई विजय प्राप्त कर सकता है, उस युद्धभूमि में टिक सकता है, जहाँ उसने खेमा गाड़ा हुआ है, जैसे एक कवि के लिये छंदशास्त्र की जानकारी होना, एक विचारक के लिये पठन-पाठन किया जाना, एक वकील के लिये विधि की जानकारी होना, एक वैद्य के लिये न केवल बीमारियों की जानकारी होना बल्कि उसके उपचार के लिये यंत्रादि के साथ दवा आदि का होना। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जिस भी क्षेत्र में हम अपने हाथ आजमाते हैं वहाँ के शस्त्रों की जानकारी होना परमावश्यक होता है।

हम साहित्य की ही बात करें, तो देखा जाता है कि आजकल लोग साहित्यकार बन जाया करते हैं, किन्तु साहित्य के बारे में उन्हें क, ख भी नहीं आता। जानकारी न होने पर भी बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं और दम्भ भी किया जाता है। तब यह उपहास का कारण बनता है। ठीक उसी प्रकार जैसे बिना विधि-नियमों की जानकारी वाले वकील की किसी न्यायालय में परिस्थिति होती है। आवश्यकता है कि हमें स्वयं को उस योग्य बनाना होगा कि लोग स्वयं कहें कि आप वो हैं, जो आप दिखना अथवा बनना चाहते हैं। स्वयंभू होना अथवा कहलवाना उचित नहीं है। 


जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिये उस क्षेत्र के शस्त्रों की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। बिना इन उपयोगी जानकारियों के हम शस्त्रविहीन योद्धा ही माने जायेंगे और उपहास के पात्र बनेंगे। अतः आवश्यकता है स्वयं को उन शस्त्रों से लैश करना। जानकारियाँ इकट्ठा करना। स्वयं को उस योग्य बनाना कि हर बात में तर्क हो, बातें उपयोगी हों, जो लोगों को सटीक लगें। 


यह मंथन का विषय है, किसी पर न आक्षेप है और न ही इस मंथन का ऐसा कोई उद्देश्य है। कई बार देखा गया कि लोग अपनी बात रखने से डरते हैं अथवा परहेज करते हैं अथवा रुचि नहीं लेते हैं। उनसे यही कहना है कि मंथन से लाभ ही होता है हानि कदापि नहीं। हमारे शस्त्रों की बढ़ोतरी होती रहती है। जानकारियाँ बढ़ती रहती हैं और हम युद्धभूमि में जाने में सक्षमता को हासिल करते जाते हैं। आइये आज भी हम इस बात पर मंथन करें कि ‘‘शस्त्रविहीन योद्धा किस काम का’’ - यह विषय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिये उतना ही उचित है, जितना कि युद्ध के लिये। अतः आप सभी के विचार आमंत्रित हैं।


विश्वजीत 'सपन'

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

निदा फ़ाज़ली



मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को हुआ था। उनका असली नाम मुक़्तादा हसन था। वे निदा फ़ाज़ली के नाम से लिखते थे। उन्हें बचपन से ही लेखन में रुचि थी। उनके पिता मुर्तुज़ा हसन भी शायर थे। कहते हैं कि जब वे ग्वालियर में पढ़ाई कर रहे थे, तब एक लड़की उनके सामने की पंक्ति में बैठा करती थी, जिससे वे अनजान रिश्ता बना गये थे। प्रतिदिन उसे देखना और लिखना उनकी आदत बन गयी थी। फिर एक दिन उस लड़की का निधन एक दुर्घटना में हो गया। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया। वे इस दुःख को अभिव्यक्ति देने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहे थे। फिर एक दिन एक मंदिर के सामने से गुज़रते समय उन्होंने सूरदास की पंक्तियाँ सुनी - ‘‘मधुबन तुम क्यों रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुन्दर के ठाढ़े क्यों न जरे?’’। इन पंक्तियों ने उन्हें अत्यन्त प्रेरित किया कि भाषा जितनी सरल हो, लोगों तक उतनी ही अधिक पहुँचती है। उनकी शैली में यही बात दिखाई देती है।

साम्प्रदायिक दंगों के कारण इनके माता-पिता पाकिस्तान चले गये, लेकिन इन्होंने भारत में ही रहना तय किया। वे अपने आरम्भिक जीवन में संघर्ष करते रहे और फिर उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में लिखने का अवसर मिला। बाद में वे फिल्मी दुनिया में पहुँचे और उन्होंने कई यादगार गीत भारतीय जनता को दिये। उनके कुछ गीत और कुछ शायरी आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं - 


(1) कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मी तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता 


(2) तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है
जहाँ भी जाऊँ ये लगता है तेरी महफिल है


(3) आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे
दिल हुआ किसका गिरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे


(4) दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाये तो सोना है 


(5) हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी


उनके कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए और उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। साहित्य अकादमी का पुरस्कार उन्हें ‘खोया हुआ सा कुछ’ पर मिला और 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। उन्होंने हमेशा ही अमन-चैन के लिये अपनी ज़िन्दगी जी और आज अमर होकर हम सभी के दिल में बस गये हैं। उनकी कई ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने लोगों के मध्य बहुत प्रसिद्ध किया। यह नाम भारतीय सिनेमा जगत और साहित्य के आकाश में हमेशा चमकता रहेगा।
विश्वजीत ‘सपन’

रविवार, 24 जनवरी 2016

भारतीय काव्यशास्त्र में रस

 
आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में काव्य को परिभाषित किया है - ‘‘वाक्यं रसत्मकं काव्यम्’’ अर्थात् रसात्मक वाक्य ही काव्य है। काव्य के आस्वाद को ही रस कहते हैं। काव्य का आनन्द ही रस है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि किसी काव्य को पढ़ने, सुनने में अथवा नाटकादि को देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक आदि को जो असाधारण और अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त होता है, उसे ‘रस’ कहते हैं।

    जब हम कभी रस का अर्थ ग्रहण करते हैं, जीवन के सामान्य प्रसंगों में तो प्रायः इसका अर्थ होता है - आनन्द, सुख। हम कहते सुनते हैं कि आज बड़ा रस आया, जब कभी कोई रमणीक स्थल आदि देखते हैं, कौतूहल वाली वस्तु देखते या पढ़ते हैं या चमत्कारपूर्ण बातों को देखते अथवा सुनते हैं। नाटक, सिनेमा आदि में भी रस होते हैं। पठन-पाठन में भी रस मिलता है।


भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही रस शब्द का प्रयोग होता रहा है। वैसे तो सोमरस के रूप में भी ‘रस’ का प्रयोग हुआ है, किन्तु इसका प्रयोग आनन्द के रूप में भी हुआ है। वह चाहे अलौकिक आनन्द हो अथवा आध्यात्मिक आनन्द। तैत्तिरीय उपनिषद् में रस का उल्लेख कुछ इस प्रकार से हुआ है - ‘‘रसौ वै सः रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।’’ अर्थात् रस वह ईश्वरीय अनुभूति है, जिसे प्राप्त करके आत्मा आनन्दी हो जाता है। साहित्य शास्त्र में रस के बारे में ऊपर कथन दिया गया है भरत मुनि का एवं आचार्य विश्वनाथ का। यदि हम देखें तो भारतीय साहित्य शास्त्र में काव्य का मूल प्रयोजन इसी रस-रूप आनन्द की प्राप्ति है। रस को काव्य की आत्मा कहा गया है। इसे कुछ इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं कि किसी कविता, कहानी, उपन्यास आदि को पढ़ने-सुनने अथवा नाटकादि आदि के पढ़ने-सुनने से पाठक, श्रोता अथवा दर्शक को जिस चमत्कारपूर्ण असाधारण आनन्द की प्राप्ति होती है, उसे ही रस कहते हैं। 


     भरत मुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ ग्रन्थ में रस की विवेचना इस प्रकार की है - ‘‘विभावानुभाव व्यवभिचारि संयोगद्रसनिष्पत्तिः’’ अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यवभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। आचार्य विश्वनाथ ने चार प्रकार के भावों का उल्लेख किया और कहा - ‘‘विभावानुभावेन व्यक्तः संचारिणा तथा। रसतामेति रत्यादिः स्थायी भावः सचेतसाम्।।’’ अर्थात् सहृदयों के हृदय का स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है, तो रस-रूप में निष्पन्न हो जाता है।
प्राचीन जानकारी के अनुसार नौ स्थायी भाव हैं - रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय और निर्वेद। इन्हीं स्थायी भावों के अनुसार नौ रस की निष्पत्ति हुई। कालान्तर में ‘वत्सल’ एवं ‘मधुर अथवा भक्ति’ नामक स्थायी भाव भी माने गये हैं। 


विभाव इन स्थायी भावों के कारण हैं। इन्हीं कारणों से ये स्थायी भाव जाग्रत होते हैं। विभाव के दो भेद होते हैं। आलम्बन और उद्दीपन।
आलम्बन विभाव वे कारण हैं, जैसे नाटकादि के वे पात्र जिन्हें देखकर अथवा पढ़कर किसी के हृदय में रति आदि स्थायी भाव रस-रूप में अभिव्यक्त होते हैं। इस आलम्बन विभाव के भी दो भेद होते हैं - विषय एवं आश्रय। जिस पात्र के प्रति किसी पात्र के भाव जागृत होते हैं, वह विषय है। जिसमें यह जागृत होता है, वह आश्रय है। जैसे पद्मावती को देखकर राजा उदयन के हृदय में रति भाव उत्पन्न होता है, तो पद्मावती विषय है, जबकि राजा उदयन आश्रय हैं। 


उद्दीपन विभाव स्थायी भावों को उद्दीप्त करके आस्वादन योग्य बनाते हैं। जैसे वीर रस के स्थायी भाव उत्साह के साथ सामने खड़ा शत्रु आलम्बन विभाव है, जबकि उसकी सेना, गर्जना, दर्पोक्ति आदि उद्दीपन विभाव हैं। इसके भी दो भेद होते हैं - आलम्बनगत या विषयगत एवं बाह्य या बहिर्गत। 


अनुभाव - रति आदि स्थायी भावों को व्यक्त करने वाली आश्रय की चेष्टायें अनुभाव कहलाती हैं। ये चेष्टायें भाव-जागृति के उपरान्त आश्रय में उत्पन्न होती हैं, अतः इन्हें अनुभाव कहा जाता है। विरह से व्याकुल नायक अथवा नायिका द्वारा सिसकियाँ भरना, क्रोध से कठोर वाणी बोलना, मिलन के भावावेश में आँसू, स्वेद निकलना आदि अनुभाव हैं। इसके चार भेद कहे गये हैं - (1) आंगिक (2) वाचिक (3) आहार्य एवं (4) सात्त्विक। इनमें सात्त्विक अनुभाव आठ माने गये हैं - (1) स्तम्भ (2) स्वेद (3) रोमांच (4) स्वरभंग (5) वेपथु (6) वैवर्ण्य (7) अश्रु एवं (8) प्रलय। 


संचारी भाव या व्यभिचारी भाव - जो भाव हृदय में नित्य विद्यमान होते हैं, वे स्थायी भाव हैं, किन्तु कुछ भाव थोड़ी देर के लिये आते हैं और स्थायी भाव को पुष्ट करके चले जाते हैं, वे संचारी भाव कहलाते हैं। ये किसी एक रस में बँधे नहीं होते, अतः इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। इनकी संख्या 33 मानी गयी है, किन्तु कालान्तर में आचार्य भानुगुप्त तथा कवि देव ने ‘छल’ को चौतीसवाँ संचारी भाव माना और पुनः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘चकपकाहट’ को पैंतीसवाँ संचारी भाव माना, किन्तु ये मान्य नहीं हो सके।
 

रस भेद
   
यदि हम रस के प्रकारों पर विचार करें, तो शास्त्रीय मत के अनुसार नौ स्थायी भाव माने जाते हैं और उन्हीं के अनुकूल उनके रस-रूप को प्राप्त करने वाले नौ रस माने गये हैं। ये नौ रस इस प्रकार हैं -


(1) शृंगार रस
(2) वीर रस
(3) करुण रस
(4) रौद्र रस
(5) भयानक रस
(6) अद्भुत रस
(7) वीभत्स रस
(8) शान्त रस एवं
(9) हास्य रस


ये सभी संस्कृत के अनुसार एवं शास्त्रीय दृष्टि से कहे गये हैं। कालान्तर में आचार्य विश्वनाथ ने ‘वात्सल्य’ को दसवाँ रस माना और उनके बाद रूपगोस्वामी ने ‘मधुर’ रस नामक ग्यारहवें रस को माना, जिसे बाद में ‘भक्ति रस’ के नाम से जाना गया।
   
(1) शृंगार रस - नर-नारी का पारस्परिक आकर्षण शृंगार रस का आधार है, जिसे काव्यशास्त्र में ‘रति’ कहा जाता है। जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रति नामक स्थायी भाव का आस्वाद प्राप्त होता है, तो उसे शृंगार रस कहते हैं। इसके दो भेद हैं - संयोग या सम्भोग एवं वियोग या विप्रलम्भ। संयोग मिलन का द्योतक है, जबकि वियोग विरह का। वियोग के भी चार भेद कहे गये हैं - (1) पूर्वराग (2) मान, (3) प्रवास एवं (4) करुण।


(2) वीर रस - काव्यादि में शत्रु के पराक्रम, आक्रमण, किसी की दीनता, दुर्दशा आदि को देखकर, पढ़कर या सुनकर चित्त में जो उत्साह उत्पन्न होता है, वह विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाप में परिपुष्ट होकर आस्वादन के योग्य हो जाता है, वहाँ वीर रस होता है। वीर रस के चार भेद किये गये हैं - (1) युद्धवीर, (2) दयावीर, (3) धर्मवीर एवं (4) दानवीर। शृंगार के बाद वीर रस की ही प्रधानता मानी गयी है। 


(3) करुण रस - प्रेमपात्र के चिर-वियोग में पीड़ित होने, इष्ट वस्तु की हानि, अप्रिय की प्राप्ति, अपमान, पराजय, विपत्ति आदि से उत्पन्न हुए क्लेश की व्यंजना से जो शोक नामक स्थायी भाव पुष्ट होता है वही करुण रस में परिणत होता है। 


(4) रौद्र रस - अहितकारी शत्रु की धृष्ट चेष्टाओं द्वारा किये गये अपमान, अपकार आदि से उत्पन्न क्रोध से रौद्र रस की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ वीर रस और रौद्र रस में जो अंतर है उनको समझ लेना चाहिए क्योंकि एक का स्थायी भाव उत्साह है और दूसरे का क्रोध।


(5) भयानक रस - भयदायक वस्तु को देखने अथवा सुनने से अथवा प्रबल शत्रुओं के कारण उत्पन्न हृदय में स्थित ‘भय’ का स्थायी भाव जब विभावादि से पुष्ट होता है, तो भयानक रस की अभिव्यक्ति होती है।

 
(6) अद्भुत रस - किसी विचित्र, अभूतपूर्व, अश्रुतपूर्व अथवा असाधारण वस्तु को देखने अथवा सुनने से हृदय में जो आश्चर्य का भाव उत्पन्न होता है, उसी का वर्णन अद्भुत रस कहा जाता है।


(7) वीभत्स रस - अरुचिकर, घृणित वस्तुओं के वर्णन से जहाँ जुगुप्सा या घृणा उत्पन्न हो और वे विभावादि की सहायता से परिपुष्ट हों, तो उस रस को वीभत्स रस कहा जाता है।


(8) शांत रस - संसार की नश्वरता एवं परमात्मा के रूप का ज्ञान होने से संसार के प्रति जो विरक्ति की भावना उत्पन्न होती है, उसे निर्वेद कहा जाता है। इसी स्थायी भाव के उत्पन्न होने पर जब विभावादि द्वारा पुष्ट होते हैं, तो शान्त रस की अभिव्यक्ति होती है।


(9) हास्य रस - किसी वस्तु या व्यक्ति की साधारण से विपरीत विचित्र या विकृत आकृति, विकृत वेशभूषा, अटपटी वाणी, कुछ हँसी उत्पन्न करने वाला बातचीत का ढंग आदि चेष्टायें देखकर या पढ़कर या सुनकर मन में विनोद का भाव उत्पन्न होता है, जिसे हास कहते हैं। जब ये बाह्य कारणों विभावादि की सहायता से जागृत होते हैं, तो जो अभिव्यक्ति होती है, वह ‘हास्य रस’ है। इसके छः भेद हैं - (1) स्मित (2) हसित (3) विहसित (4) अबहसित (5) अपहसित एवं (6) अतिहसित।


(10) वात्सल्य रस - संस्कृत की काव्य परम्परा में वात्सल्य को शृंगार रस के अर्न्तगत माना है। किन्तु शृंगार का स्थायी भाव ‘रति’ है, जबकि वात्सल्य माता-पिता का संतान के प्रति स्नेह है और उससे पुष्ट भाव है। अतः इसे भी मान्यता मिली है।


(11) भक्ति रस - इसे शान्त रस में माना गया है। किन्तु शान्त रस में निर्वेद की स्थिति होती है, जो विरागात्मक है, जबकि भक्ति रागात्मक है। इसका स्थायी भाव ईश्वर-विषयक प्रेम होता है। इसे भी एक रस के रूप में मान्यता मिली है।

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विश्वजीत 'सपन'