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शनिवार, 20 सितंबर 2014

दूषित अहं ही अहंकार है


स्थितप्रज्ञ की परिभाषा बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो न हीन-ग्रंथि (Inferiority Complex) से पीड़ित हो और न स्व को अतिशय समझने में भाव-ग्रंथि (Superiority Complex) से उद्भ्रांत हो, वही स्थितप्रज्ञ है। इस प्रकार जो मन:प्रसादयुक्त, शांत, धीर, कर्तव्यनिष्ठ, विनम्र, सब का शुभेच्छु, सत्कर्म करने वाला पुरुष है वही कर्मयोगी है। असल में अहं का शुद्ध बोध अध्यात्म है, जबकि अहंकार भौतिक वस्तुओं के अपच का परिणाम है। अहंकार रुग्न मानसिकता का जनक है। अहं को ईश्वरार्पित करके एवं अहंकार का निरसन करके व्यक्ति अपना एवं समाज दोनों का ही परम हित कर सकता है। आज के इस भौतिक युग में अहंकार का बोलबाला है, जिससे हमें बचना चाहिए एवं ईश्वर में रमना चाहिए। यही श्री कृष्ण का उपदेश है और यही उनकी वाणी है।

न त्वहं कामये राज्यं न च भोगं न जीवितम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।। (महाभारत)


अर्थात् दूषित अहं ही अहंकार है। यह अहंकार भौतिक वस्तुओं पर अनाधिकार गर्व करने और इतराने के कारण होता है। मनुष्य को इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि अन्न हेय नहीं है और न ही उसका ग्रहण करना त्याज्य है। अनुचित तो है उसका अपच होना। ठीक उसी प्रकार भौतिक सम्पदाएँ, मान-प्रतिष्ठा, अधिकार, सत्ता आदि हेय नहीं है अपितु हेय है उसका न पच पाना। उपलब्धियों पर असंतुलित हो जाना ही इस अपच का लक्षण है।

कृष्ण वासुदेवाय नमः।
कृष्ण वासुदेवाय नमः।
कृष्ण वासुदेवाय नमः।


विश्वजीत 'सपन'

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