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बुधवार, 7 मार्च 2012

एक लेखक की दास्तान


एक लेखक की दास्तान
प्रामाणिकता की जंग




भारत देश में लेखकों की कमी है। यह बात मुझे तब पता चली, जब हूबहू मेरी ही रचना एक प्रतिष्ठित पत्रिका में किसी और के नाम से छपी। आश्चर्यमिश्रित सदमे से मैं बेहाल हो गया। सोचने-समझने की शक्ति का बुरा हाल हो गया। दरअसल बहुत दिन हो चुके थे। मैं लगभग भूल ही चुका था कि मैंने वह रचना उस प्रतिष्ठित पत्रिका को कब भेजी थी। किन्तु पढ़ते ही आँखों के रेटीनी परदे पर स्पष्ट चित्र उभर आए। कंप्यूटर खोलकर देखा। पता चला कि आठ महीने पहले भेजी थी इस आस में कि संभवतः संपादक जी को पसंद आ जाए। उन्हें पसंद भी आई। जिसकी खुशी थी, किन्तु रचनाकार की जगह अपना नाम न देखकर सदमा गहरा लगा। सौभाग्य से स्वास्थ्य अभी अच्छे हाल में था, अन्यथा दिल का दौरा पड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती।

असल में इस बेतरतीबी के इस युग में सबकुछ उलट-पुलट हो चुका है। समय ही नहीं है किसी के पास। विशेषकर दूसरों के लिए और दूसरों की समस्याओं के लिए। फिर बड़ी और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और विशेषकर उनके संपादकों के पास तो और भी नहीं। पहले यानी कुछ दशक पहले जब कोई रचना अस्वीकार की जाती थी तो वह सखेदवापस अवश्य की जाती थी। मेरे साथ भी ऐसा हो चुका था। एक बार नहीं अनेक बार। दुःख होता था, परन्तु सदमा नहीं लगता था। आजकल यह प्रथा बंद कर दी गई है। अब आप रचना भेजकर आराम से भूल जाइए और इंतज़ार करते-करते अपनी उम्र बढ़ा लीजिए। छपने के आसार तो कम ही होते हैं, सखेद वापस आने का तो है ही नहीं क्योंकि प्रथा ही मिट गई है। मैं भी इसी भूल में बैठा हुआ था कि चाहे वह वापस आए न आए लेकिन रचना तो मेरी ही है और एक ईमानदार लेखक की भाँति आशावान् बना रहा था। कभी न कभी संपादक जी की उड़ती-उड़ती नज़र तो पड़ेगी ही। और इसी कारण किसी अन्य पत्र-पत्रिकाओं में नहीं भेज सका था।

किन्तु, यह घटना असह्य थी। मेरा अनुभव मुझे ही काटने आ रहा था। क्या ऐसा भी हो सकता है? यह प्रश्न मेरे दिलो-दिमाग पर ऐसे-ऐसे प्रहार कर रहा था कि जैसे सैंकड़ों छुरियाँ बार-बार उन्हें खुरच रही हों। मैं सोचने-विचारने पर मजबूर था कि अब क्या किया जाए? रचना तो मेरी है, लेकिन किसी और के नाम से छपी है। तो फिर कैसे अपनी रचना को अपनी कहा जाए? समस्या गंभीर थी, लेकिन अनूठी थी।



वैसे इस दुर्घटना से दो बातें सर्वथा प्रमाणित थीं। एक तो अच्छी रचना की कद्र अभी भी बाकी थी। गो कि मैं एक अच्छा रचनाकार प्रमाणित हो गया था। दूसरे किसी रचना का महत्त्व नहीं होता है, बल्कि रचनाकार का होता है। रचनाकार बड़ा तो रचना बड़ी, वरना सुन्दर रचना भी अरचना। अर्थात् रचनाकार का सुरीला नाम होना चाहिए, चाहे रचना बेसुरी ही क्यों न हो। इन दोनों ही प्रामाणिकता में मैं कहीं भी फिट नहीं बैठता था। इसलिए अपनी रचना को अपनी कहने की तरकीब सोचने पर विवश था। यह निकला मेरी गहरी सोच का निष्कर्ष। लेकिन निष्कर्ष निकालना और उसे प्रमाणित करना दो अलग बातें होती हैं। मेरी समस्या दुर्लभ थी। मेरे लिए और साहित्य जगत् के लिए भी। मैं अब अक्सर सोचों में गुम रहा करता था। घर-बार सबसे खिन्न रहा करता था। कर्ता-धर्ता परेशान तो सभी बेहाल हो ही जाते हैं। असंतोष की आग ने मुझे और मेरे घर को जला डाला था।

मेरे इस समुद्र के तल की तरह गहरे दुःख को देखकर मेरा एक प्रिय मित्र मेरे घर आया। उसे मुझसे सहानुभूति थी। मेरे घावों में मरहम लगाते हुए बोला - मित्र, आपकी तो एक छोटी-सी रचना का अपहरण हुआ है, इतना दुःख मत करो। लोग तो अपहरणों की बाढ़ से पीड़ित हैं।

रचना का अपहरण?’

मैं चौंक गया था। पहली बार सुना था।

चौंको नहीं मित्र। मेरे पास तो पूरी किताबों तक के अपहरण के मामले हैं। एक नहीं बल्कि अनेक ऐसे मामले हैं। कई प्रकाशक इसे एक उद्योग की तरह चलाते हैं।

क्या?’

अब तुमसे क्या छुपाना मित्र। तुम भी पीड़ितों में शामिल हो गए हो तो तुम्हें इन मामलों के बारे में जानने का अधिकार प्राप्त हो गया है। मेरठ के एक प्रकाशक हैं। उनकी गाथा का वर्णन करता हूँ।

मैं अवाक् अपने प्रिय मित्र का व्याख्यान सुन रहा था।

इनकी विशेषता यह है कि ये महाशय रचनाएँ मँगाते हैं और कई बार लोग अपनी रचना लेकर इनके पास जाते हैं। समय बीतता जाता है यह सुनते-सुनते कि उनके परीक्षण दल के सदस्य उनके परीक्षण कर रहे हैं। महीनों और सालों बीत जाते हैं। बेचारा रचनाकार आख़िरकार अपनी रचना के बारे में भूल जाता है और फिर ये प्रकाशक महोदय उस रचना को अपने परिवार के किसी एक सदस्य के नाम पर उसका शीर्षक बदलकर छाप लेते हैं। यह कई दशकों से चल रहा है। अब उनके परिवार के चार सदस्य स्थापित लेखक बन चुके हैं। वैसे कभी-कभार वे दूसरों की रचनाओं का प्रकाशन भी कर लेते हैं ताकि प्रकाशक के तौर पर उनकी विश्वसनीयता बरक़रार रहे।

यह तो सरासर धोखाधड़ी है।

अब इसे जो कहना चाहो कह लो। ऐसा केवल मेरठ में होता हो, कोई एक प्रकाशक करता हो, तो भी कोई बात नहीं होती। अब तो यह उद्योग की भाँति पनप चुका है। सारे देश में ऐसा ही होता है।

मुझे आश्चर्य भी हुआ और डर भी लगा कि मैंने तो कई रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं को प्रेषित की हुई हैं। अब अगर मेरे साथ भी हुआ तो क्या होगा?

मेरा सोचना गलत साबित नहीं हुआ क्योंकि उसके बाद जो कुछ हुआ वह लगभग वैसा ही था जो मेरे प्रिय मित्र ने कहा था। धड़ाधड़ मेरी कई रचनायें और छपीं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने बखूबी स्थान बनाईं। कभी पूरी की पूरी तो कभी बेतरह काट-छाँटकर और कभी उसकी आत्मा का हननकर। भाषा भी कुछ मेरी और कुछ किसी अन्य की। किन्तु, मेरे नाम का नामोनिशाँ कहीं नहीं था। संताप एवं अत्यंत पीड़ा के बादल फट पड़े। अपनी रचना के लिए दिल फूट-फूटकर रो पड़ा। मेरी रचना पराई होकर इठलाती तो दिल पर सैकड़ों सर्प लोटने लगते। वे जो भी थे आनन्दित हो रहे थे और मैं अपने आपको पहचानने के प्रयास में खुद को भूलने लगा था। फिर मैंने निश्चय किया कि एक नवोदित और उदीयमान लेखक की पदवी से सँवारने का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। स्वयं को लेखक बनाने की होड़ से बाहर नहीं होने देना चाहिए। इसलिए कोल्हू के बैल की तरह जुटा रहा अपनी इस अजीबो-गरीब लड़ाई में।

रचना जगत् में असांसारिकता की परम्परा सर्वथा विकराल और भयावह है, जहाँ हम जैसे उदीयमान लेखकों के मर्म को कोई नहीं समझता। वहाँ नाम और केवल नाम का ही बोलबाला होता है। और चोरी की रचना का तो समझिए कि एक गिरोह ही पलता है। ऐसे में मेरी खुद की प्रामाणिकता प्रश्नचिन्ह हो गई थी। असल में मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह साबित कर सकता था कि वो सब मेरी रचनायें थीं। प्राचीन काल में पाण्डुलिपियाँ अपने हाथों से लिखी जाती थीं। अब इस कंप्यूटर के युग में वे दुर्लभ हो गई हैं। वैसे पाण्डुलिपियों की प्रामाणिकता पर भी कच्ची मुहर ही होती है। लेकिन इसमें से तो मुहर ही गायब हो चुकी थी। फिर भी मैं एक सच्चे और ईमानदार लेखक की तरह लिखता गया और पत्र-पत्रिकाओं में भेजता गया। यह सोचकर कि ऊपरवाला सबको देखता है। वह मेरी ओर भी देखेगा। मेरी भी सुनेगा और एक दिन न्याय का पलड़ा अवश्य भारी होगा।

समय बीतता गया। इस दु:ख के साथ जीने की आदत-सी पड़ गई थी। इस बीच समय के साथ मेरी ईमानदारी में भी दरार आ गई। और मैं अपनी एक रचना को कई पत्र-पत्रिकाओं में भेजने लगा। असफलताओं के अंबार लगा दो, सफलता अवश्य कदम चूमेगीकिसी ने कहा था। यही मेरा मूलमंत्र बन गया था। अब मेरी रचनायें भी छपने लगीं थी। कहीं दस रचनाओं के बाद तो कहीं पन्द्रह रचनाओं के बाद। ख़ैर, जो भी हो अब मैं रचनाकार तो बन ही गया था। चाहे छोटा-मोटा ही। फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मेरी एक रचना दो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में एक साथ छपीं। एक मेरे नाम से और दूसरी किसी नामी-गिरामी रचनाकार के नाम से। यह तो कभी न कभी होना ही था। सो हो गया था।

बस फिर क्या था? प्रामाणिकता की जंग छिड़ गई। मुकदमे दायर हो गए। मुझ पर नकल करने का आरोप लग गया। किसी रचनाकार के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती थी कि उसे अपनी ही रचना की प्रामाणिकता साबित करनी थी। मैं जी-जान से जुट गया। वकीलों के लिए यह अनोखी बात थी। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। वे चुस्कियाँ लेकर हमसे प्रमाण पूछते थे और मज़ा लेकर मेरी रचनाओं का आनंद उठाते थे। आज तक जितनी रचनाएँ छपी थीं, कहीं भेजी थीं, मेरे पास उपलब्ध थीं, वे सब की सब बाहर निकल चुकी थीं। विचार, कथ्य, शैली, विषयवस्तु, प्रवाह आदि- इत्यादि सबों पर विचार-विमर्श हुए। जिरह ऐसे हो रहा था जैसे दो भेड़िये शिकार को हड़पने के लिए चीर-फाड़ कर रहे हों। पत्र-पत्रिकाओ, अख़बारों, टी.वी. चैनलों सभी प्रकार के मीडिया और आम जनता के लिए खासा मनोरंजक विषय था।
बरसों न्यायालयों की देहरी पर कानून, इज़्ज़त, लेखक, रचना और साहित्य की धज्जियाँ उड़ाई गईं। आख़िरकार फैसले का दिन भी आ गया। प्रतिष्ठित पत्रिका और प्रतिष्ठित रचनाकार की बात सहर्ष स्वीकार कर ली गई। मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक साक्ष्य को अपर्याप्त माना गया और मैं नकलची प्रमाणित हो गया। मुझे अपनी ही रचना को नकलकर छापने के जुर्म में तीन हज़ार रुपये का जुर्माना और छह साल की कैदे-बामुशक्कत की सज़ा सुना दी गई। पहले से ही एक अदना लेखक और ऊपर से वकीलों एवं न्यायालयों के चक्कर ने मेरी हालत और भी पस्त कर दी थी। इसलिए जुर्माने की तीन हज़ार की राशि जुटा नहीं पाया तो अदालत ने मेरी माली हालत पर तरस खाकर मेरी सज़ा दस महीने में तब्दील कर दी। तब से अब तक जेल में बैठा लेखन का कार्य कर रहा हूँ क्योंकि लेखन मेरा जीवन है, मेरा सबकुछ है। साहित्य मेरी कमजोरी है और साहित्य सेवा मेरा धर्म। यह अलग बात है कि न्यायालय को ऐसा कुछ भी प्रतीत नहीं हो सका था। वह तो प्रमाण पर अपनी नौका पार करती है और प्रमाण शक्तिशालियों की बपौती होती है। चाहे वह रचनाकार ही क्यों न हो।

यह बताते-बताते मेरी आँखों से धाराप्रवाह आँसू बहने लगे। इस गंगा-जमुनी धारा से द्रवित होकर वह पत्रकार जो मेरा साक्षात्कार लेने आया था, अपने कलमभरे हाथों से आँसू पोंछने पर विवश हो गया। मुझे ख़ुशी हुई कि उसे मुझसे सहानुभूति थी। फिर वह मेरी बात जनता को पहुँचाने का प्रयास कर रहा था। जो मेरे लिए एक नई आशा की किरण के सम्मान था। मुझे ऐसा लगा कि वह भी मेरी ही जैसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहा है। वरना आज के इस युग में सहानुभूति की फसल ही कहाँ उपजती है। तो मुझसे रहा नहीं गया।

एक बात औरमैंने कहा - आप मेरे दुःख में ऐसे शरीक हुए जैसे आँख और हाथ। जब हाथ कुछ करने को होता है तो आँख उसे बताती है और जब आँख दुःख में रोते हैं तो हाथ आँसू पोंछते हैं। आप भी इसी प्रकार मेरे आँसू पोछने आए हैं। अतः आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्। आपसे इतना ही अनुरोध है कि इस ख़बर को अपने आँसू समझकर छापियेगा। ईश्वर आपका भला करेगा। साथ ही मेरी ओर से यह अपील ज़रूर कीजिएगा कि जो भी इसे पढ़े, वह सहानुभूति में दो आँसू ज़रूर बहाए। मैं समझ लूँगा कि साहित्य सेवा की कीमत मुझे मिल गई।

यह कहकर मैंने अपने आपको पुनः उस कालकोठरी की चाहरदीवारी में हमेशा के लिए कैद कर लिया, जहाँ मेरी प्रामाणिकता के सबूत धुल-धुलकर पूरी तरह नष्ट हो गए थे।
विश्वजीत 'सपन'

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